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टॉयलेट तक से वंचित AES के शिकार परिवार, सरकारी योजनाएं नहीं पहुंचा पाई नीतीश सरकार

पीड़ित परिवार दलित या आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के लोग हैं और उन्हें केन्द्रीय और राज्य स्तर पर चल रहीं सरकारी योजनाओं में, राशन कार्ड को छोड़कर किसी अन्य सुविधा का कोई लाभ नहीं मिल रहा है।

Author मुजफ्फरपुर | June 25, 2019 8:59 AM
चमकी बुखार से अभी तक बिहार में 130 मौतें हो चुकी हैं। (EXPRESS PHOTO)

बिहार में इन दिनों दिमागी बुखार AES(Acute Encephalitis Syndrome) का कहर चल रहा है। इस बीमारी से अभी तक 130 मौतें हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार को इस मामले में रिपोर्ट मांगी है। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी एईएस से पीड़ित 12 परिवारों से बात की। इस बातचीत के दौरान पता चला है कि पीड़ित परिवार दलित या आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के लोग हैं और उन्हें केन्द्रीय और राज्य स्तर पर चल रहीं सरकारी योजनाओं में, राशन कार्ड को छोड़कर किसी अन्य सुविधा का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। हैरानी की बात ये है कि स्वच्छता अभियान को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों में से किसी के पास भी एक टॉयलेट तक नहीं है।

द इंडियन एक्सप्रेस ने वैशाली जिले के हरवंशपुर गांव में रहने वाले राजेश मांझी से बात की। राजेश मांझी की 7 साल की बेटी की हाल ही में दिमागी बुखार से मौत हुई है। बातचीत के दौरान राजेश मांझी ने बताया कि सरकारी योजनाओं के नाम पर उनके पास सिर्फ एक राशन कार्ड है। इसी तरह एक अन्य पीड़ित व्यक्ति राज किशोर राम के पास भी सरकार की तरफ से सिर्फ राशन कार्ड की सुविधा मिली हुई है। राशन कार्ड के तहत इन लोगों को सरकार की तरफ से प्रत्येक सदस्य को 5-5 किलो चावल या गेहूं और केरोसिन का तेल मिलता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उन्हें आयुष्मान भारत हेल्थ कार्ड भी मिला है, लेकिन उन्हें नहीं पता कि इसे इस्तेमाल कैसे करना है।

कौन-कौन सी योजनाएं चलाती है सरकार और क्या हैं उनके फायदेः यहां हम आपको केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा चलायी जाने वाले 10 अहम सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

राशन कार्डः जिन 12 परिवारों से द इंडियन एक्सप्रेस ने बातचीत की उनके सभी के पास राशन कार्ड हैं। राशन कार्ड में अन्तयोदय अन्न योजना के तहत लोगों को पीला कार्ड दिया जाता है। इस योजना में गरीब लोगों को 35 किलो अनाज, जो कि 5 किलो प्रति व्यक्ति के हिसाब से मिलता है।

पोषाहार योजनाः विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह से पोषण ना मिलने और शरीर में शुगर का लेवल नीचे जाने पर दिमागी बुखार (AES) से पीड़ित होने का खतरा बढ़ जाता है। साल 2015-16 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 4 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 5 साल से कम के 48% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। जबकि इंटीग्रेटिड चाइल्ड डेवलेपमेंट स्कीम के तहत 3-6 साल के बच्चों को खाना मुफ्त देने का प्रावधान है। इस खाने में बच्चों को खिचड़ी, पुलाव, दूध, हलवा, रसिया और अंडे दिए जाते हैं। लेकिन मुजफ्फरपुर के सराइया इलाके में रहने वाले दिमागी बुखार से पीड़ित परिवारों का कहना है कि उनके बच्चों को उपरोक्त खाने में से बहुत कम मिलता है। लोगों का कहना है कि उन्हें योजना के तहत खिचड़ी और पुलाव तो मिले हैं, लेकिन दूध और अंडे कभी नहीं मिले।

आयुष्मान भारतः सराइया इलाके में स्थित एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के कर्मचारी ने बताया कि सराइया ब्लॉक में 3.8 लाख लोग रहते हैं, लेकिन इनमें से से सिर्फ 28,000 के पास आयुष्मान भारत हेल्थ कार्ड है। बता दें कि आयुष्मान भारत योजना के तहत सरकार गरीबों का 5 लाख तक का इलाज मुफ्त कराएगी। लोगों का कहना है कि उनके पास कार्ड तो है, लेकिन इसे इस्तेमाल कैसे करना है, उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

कन्या उत्थान योजनाः इस योजना के तहत सरकार 2 साल की बच्चियों का पूरा वैक्सिनेशन कराने पर 2000 रुपए देती है, जो कि एक ही बार मिलते हैं। लेकिन दिमागी बुखार से पीड़ित अधिकतर परिवारों ने इस योजना के बारे में सुना तक नहीं है।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजनाः इस योजना के तहत सरकार गर्भवती महिलाओं को विभिन्न मेडिकल टेस्ट, डिलीवरी और बच्चे की वैक्सिनेशन के लिए 6000 रुपए की आर्थिक मदद देती है। इस योजना को लेकर लोगों का कहना है कि उन्होंने इसके बारे में सुना है, लेकिन बहुत कम लोगों को इसका फायदा मिला है। लोगों की शिकायत है कि यदि सरकार ऐसी योजनाएं लागू करती है तो उसे लोगों को इनके बारे में जागरुक भी करना चाहिए।

मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोषः इस योजना के तहत राज्य सरकार गंभीर रुप से बीमार बीपीएल परिवारों को एक निश्चित फंड मुहैया कराती है। बिहार की बात करें तो यहां कैंसर की सर्जरी के लिए 60,000 रुपए और बिना सर्जरी के 20,000 रुपए की सहायता मिलती है। हृदय संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए इस योजना के तहत 35,000-90,000 रुपए और किडनी की गंभीर बीमारी के लिए डेढ़ लाख रुपए तक मिलते हैं। लेकिन पीड़ित परिवारों में से किसी ने भी इस योजना के बारे में नहीं सुना है।

स्वच्छ भारत योजनाः बिहार सरकार ने अक्टूबर तक राज्य को खुले में शौच से मुक्त करने का वादा किया था। लेकिन ऐसी खबरें आयी हैं कि स्थानीय अधिकारियों द्वारा टॉयलेट बनवाने के लिए 2000 रुपए की मांग की जा रही है। लोगों की नाराजगी है कि सरकार पहले टॉयलेट बनाने को कहती है और फिर उसका खर्चा देने की बात करती है। लोगों का कहना है कि यदि हमारे पास टॉयलेट बनाने के पैसे होते तो फिर हमें सरकार की मदद की क्या जरुरत थी?

नल जल योजनाः इस योजना के तहत सरकार लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया करा रही है। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें इस योजना का लाभ मिला है, वहीं काफी लोग अभी तक इस योजना के लाभ से वंचित हैं।

मिड-डे मील योजनाः मिड-डे मील योजना देश के 75,000 स्कूलों में संचालित की जा रही है, जिससे देश के 2.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। सराइया के निवासी बिरेन्द्र साहनी ने बताया कि हमनें खाने की क्वालिटी को लेकर शिकायत की थी, लेकिन इन इलाकों में 5 रुपए में अच्छा खाना मिल भी नहीं सकता।

प्रधानमंत्री आवास योजनाः सभी पीड़ित परिवारों को इस योजना का कोई लाभ नहीं मिला है। पीड़ित परिवार अभी भी अपने जर्जर और पुराने मकानों में रह रहे हैं, जो कि मिट्टी और ईंटों से बने हैं। लोगों का कहना है कि उनके इलाके में कुछ लोगों को इस योजना का लाभ मिला है, लेकिन इस योजना के तहत बने मकानों की हालत कुछ सालों में ही बिगड़ने लगी है।

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