ताज़ा खबर
 

विशेष: विरोध और समर्थन का विरोधाभास

कारोबारी-रचनात्मक दुनिया जो भी कुछ परोसती है उससे माहौल के बिगाड़ या बनावट के नजरिए से कम, ब्रांड को हासिल ऊंचाई से ज्यादा तोला जाता है। उनके पैमाने यही हैं।

विज्ञापन विवाद पर सोशल मीडिया में समर्थन और विरोध के विरोधाभास सुर निकले।

जो इश्तेहार आपके अहसासों को छू लेता है, वो कामयाब माना जाता है। कहन के फन में माहिर रचनात्मक दुनिया को इस बात की फिक्र रहती है कि भीड़ में वो अलग खड़े नजर आएं। आधा मिनट से भी कम वक्त लेते हुए कोई ऐसी बात जो रोंगटे खड़े कर दे, कान खड़े कर दे या फिर दिलों को झकझोर दे। या फिर ऐसा कुछ जो तंज भी हो जाए और कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में चुटीलेपन के साथ कह दिया जाए। या फिर किसी शख्सियत से कुछ कहलवा दिया जाए। यानी अहसास भुनाने के लिए जो भी जुगत हो बस लोगों को उन अहसास और ब्रांड के बीच रिश्ता याद रहे क्योंकि वही असल मकसद है।

कारोबारी-रचनात्मक दुनिया जो भी कुछ परोसती है उससे माहौल के बिगाड़ या बनावट के नजरिए से कम, ब्रांड को हासिल ऊंचाई से ज्यादा तोला जाता है। उनके पैमाने यही हैं। मगर आम दुनिया का ताल्लुक उससे यह बन जाता है कि उसके सामने वो इश्तेहार बार-बार आता है, दोहराया जाता है इसलिए उस पर असर भी डालता है। उसे खींचता है, कभी अखर भी जाता है तो कभी दिलो-दिमाग उसे खारिज भी करता है।

हालांकि मजहबी दुनिया की उधड़न को जज्बात से पिरोने या उस पर तंज करने वाले ऐसे कई इश्तेहार हैं, जिन पर कई एतराज आए मगर कुछ ब्रांड ने इस खलबली को खूब भुनाया तो कुछ ने इससे होने वाले नुकसान का अंदाज लगाकर उन पर माफी भी मांगी या उनसे हाथ खींच लिए। ऐसे मामलों के लिए हमारे यहां एक एएससीआइ यानी विज्ञापन स्टैंडर्ड काउंसिल आफ इंडिया है, जो इश्तेहारों को उसके दायरे नहीं लांघने की हिदायत के लिए ही बनाई गई लेकिन न उसकी अब तक कोई शिनाख्त है न दमदार आवाज। रचनात्मक मामलों में दखल तो खैर वैसे भी पेचीदा मसला होता है।

पेन मीडिया फाउंडेशन ने अपनी एक रिपोर्ट में कुछ ऐसे विज्ञापनों का हवाला दिया है, जिन पर भारतीय आस्था के साथ खिलवाड़ का आरोप लगा है। कुछ वक्त पहले घरेलू हिंसा को लेकर बने एक इश्तेहार में हिंदू देवियों को हिंसा की शिकार महिलाओं के तौर पर दिखाना भी लोगों को भला नहीं लगा था। स्पेन में बर्गर किंग ने जब हिंदू देवी लक्ष्मी को बर्गर पर बैठा कर अपने उत्पाद को देवी जैसा पवित्र कहकर बेचना चाहा तो उस पर भी धार्मिक प्रतीकों की तौहीन करने की तोहमत लगी।

बाकी की दुनिया में तो सिर्फ मजहब ही नहीं बल्कि रंगभेद, महिलाओं के खिलाफ जाने वाली सोच और बच्चों की मासूमियत को भुनाने वाले इश्तेहार भी बर्दाश्त नहीं किए जाते। फिर वो जिलेट का ‘मीटू कैंपेन’ के दौरान जारी इश्तेहार हो या फेसबुक पर जारी यूनीलीवर कंपनी के डव साबुन का जिसमें एक श्यामवर्णी औरत को ‘गोरी सुंदरता’ में तब्दील होते दिखाने की हिमाकत करने वाली सोच को जबरदस्त गुस्सा सहना पड़ा और कंपनी को इसके लिए माफी भी मांगनी पड़ी।

इसी तरह बेनेटन कंपनी को अपनी युनाइटेड कलर्स के थीम के जरिए मजहबी नफरतों को रंगों से धोने की पेशकश भारी पड़ गई, जिसमें जुदा सोच वाले नेताओं को चुंबन करते दिखाया गया। खैर, कारोबारी-रचनात्मक दुनिया के लिए ये सबक तो है ही कि जेहन बदलने की जुर्रत भले करें मगर जरा फूंक-फूंक कर ही।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 पीड़ित परिवारों की आवाजों को दबाया जा रहा है यह कौन सा राजधर्म है? सोनिया गांधी ने पीएम मोदी पर उठाए सवाल
2 मोदी से नफरत करते-करते ये लोग देश से गद्दारी कर रहे हैं, बोले गौरव भाटिया तो शोएब जमई ने किया पलटवार
3 जवानी में ऐसे दिखते थे TATA Group के मालिक रतन टाटा, 4 बार हुआ था प्यार, पर हर बार रहे थे रिश्ता पक्का करने में ‘नाकाम’
IPL 2020 LIVE
X