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महान दृष्टा अद्वैतवाद : केवल एक ही सत्ता, ब्रह्म सत्ता

आचार्य शंकर का प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ जब सनातन समाज टूट कर अनेक शाखाओं और संप्रदायों में विभक्त हो गया था और धर्म के ठेकेदार अपना अपना अलग सिद्धांत प्रतिपादित करते थे। हर व्यक्ति दूसरे के सिद्धांत का घोर विरोधी हो गया था जबकि धर्म का पहला सूत्र है कि वह सबको जोड़ना है।

आदि गुरु शंकराचार्य।

राधिका नागरथ
अपने 32 साल के अल्पकाल में ही आदि गुरु शंकराचार्य ने स्वयं को भारत का एक धार्मिक योद्धा और दूरदर्शी आध्यात्मिक महापुरुष सिद्ध किया। इस देवदूत ने सारे भारत की पद यात्रा की और एक व्यवस्थित एवं अनुशासित संस्था द्वारा महान कार्यों का संपादन किया। वैदिक संस्कृति के पुरोधा आचार्य शंकर ने मठों की स्थापना कर मंदिरों का निर्माण कर और देव भाषा संस्कृत के उत्थान के लिए संस्कृत विद्यालयों की स्थापना की। साथ ही ऐसे धार्मिक नियम बनाए जिसके लिए पूरा विश्व उनका ऋणी रहेगा।

आचार्य शंकर का प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ जब सनातन समाज टूट कर अनेक शाखाओं और संप्रदायों में विभक्त हो गया था और धर्म के ठेकेदार अपना अपना अलग सिद्धांत प्रतिपादित करते थे। हर व्यक्ति दूसरे के सिद्धांत का घोर विरोधी हो गया था जबकि धर्म का पहला सूत्र है कि वह सबको जोड़ना है। ऐसे समय में जब बहुत से लोग बौद्ध धर्म को भी ग्रहण कर चुके थे तब आचार्य शंकर एक बड़े दृष्टा और अद्वैत सिद्धांत के पुरोधा बने।

ऐसे अस्त-व्यस्त बौद्धिक वातावरण में शंकराचार्य ने उपनिषदों का अद्वैत ब्रह्म सिद्धांत प्रतिपादित कर दुनिया को सर्वोत्तम ज्ञान सहज रूप में उपलब्ध कराया। उन्होंने अपने ऐसे शिष्य तैयार किए और एक अनुशासित संस्थापक के रूप में उभर कर शताब्दियों तक भटके इस मानव समाज को वेदों और उपनिषदों के मौलिक विचारों से अवगत कराया। शिव के ही अवतार कहे जाने वाले इस आचार्य शंकर ने कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की एवं उपनिषदों पर भाष्य लिखें और सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ भज गोविंदम लिखा जो आज भी गाया जाता है। इस ग्रंथ में वेदांत के मूल आधार की शिक्षा सरल गान में दी गई है।

श्लोकों की लय इतनी मधुर है कि बच्चे भी उसे आसानी से कंठस्थ कर गा सकते हैं और इससे सारे मोह नाश हो जाते हैं जो किसी भी प्रकार के दुख का मूल कारण हैं। इसीलिए इस ग्रंथ को मोह मुकदर ग्रंथ भी कहा जाता है।

एक बार काशी में जब शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे तो उन्होंने एक वृद्ध पंडित को संस्कृत के व्याकरण नियमों को दोहराते सुना। ऐसे बहुत से लोग उस समय व्याकरण में ही उलझे रहते थे और बुद्धि की निपुणता इसी में मानते थे कि वह शुद्ध उच्चारण एवं नियम सहित संस्कृत श्लोकों का पाठ कर सकें। तब शंकराचार्य ने कहा कि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम रक्षा नहीं कर सकेंगे। इस जीवन में पूर्णता और पवित्रता की अमर स्थिति का अनुभव करना यानी आत्मज्ञान पाना ही जीवन का लक्ष्य है और इसी के लिए व्यक्ति को यत्न करना चाहिए।

उनके काव्य ग्रंथ भज गोविंदम का पहला श्लोक इसी पर आधारित है। विवेक चूड़ामणि में भी आचार्य शंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर भी अगर कोई आत्मज्ञान में नहीं लगता है और स्वयं को नहीं जान पाता है कि मैं कौन हूं तो यह आत्महत्या के बराबर है।

आचार्य शंकर एक बहुत बड़े समन्वयवादी दार्शनिक थे जिन्होंने एक ओर सनातन धर्म के अद्वैतवाद को पुनर्जीवित किया और दूसरी ओर जन सामान्य में प्रचलित मूर्ति पूजा को शास्त्र सम्मत वैज्ञानिक आधार दिया। साथ ही उसका औचित्य सिद्ध किया। उनके अद्वैतवाद का सार यही है कि ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या अर्थात हर वस्तु या व्यक्ति ब्रह्म ही है केवल अज्ञानता के कारण वह विभिन्न विभिन्न नाम रूपों में भाषित होता है।

एक ही सत्ता-ब्रह्म सत्ता-विद्यमान है। उसके अलावा और कुछ नहीं है। वे एक बहुत सटीक उदाहरण देते हैं जो अक्सर वेदांतवादी लोग उद्धत करते हैं कि जिस तरह रस्सी में सांप आरोपित है, एक अंधेरे कमरे में पड़ी हुई रस्सी सांप की तरह भाषित होकर हमें डरा देती है पर वास्तव में वह एक रस्सी ही है, उसी तरह अज्ञानरूपी अंधकार में हमें यह जीव -जगत ब्रह्म से अलग भाषित होता है जबकि ज्ञानरूपी प्रकाश होने पर, वह ब्रह्म ही रूपांतरित हुआ दिखाई देता है। इस जगत में जितने भी नाम रूप वाली चीजें और व्यक्ति चर-अचर दिख रहे हैं वे कल्पित हैं। वास्तव में केवल एक ही सत्ता ब्रह्म सत्ता है और कुछ नहीं।

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