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हिंदी दिवस विशेष: अंग्रेजी में ‘अच्छे दिन’ और ‘घर वापसी’

अखबार के शब्दों पर सत्ता की भाषा का बहुत प्रभाव पड़ता है। पिछले कई दशकों तक हमारे देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री या लीडरान मीडिया या जनता के सामने अंग्रेजी में बोलते थे और हिंदी में उनकी भाषा अनुवाद...

Author नई दिल्ली | September 12, 2015 11:02 AM

अखबार के शब्दों पर सत्ता की भाषा का बहुत प्रभाव पड़ता है। पिछले कई दशकों तक हमारे देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री या लीडरान मीडिया या जनता के सामने अंग्रेजी में बोलते थे और हिंदी में उनकी भाषा अनुवाद के कारण मरी हुई सी नजर आती थी। पिछले साल लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने आक्रामक चुनाव प्रचार किया और वह भी आक्रामक हिंदी में। ‘अच्छे दिन आएंगे’, ‘बुर्के के पीछे छिपी सरकार’, ‘मां-बेटे’ की सरकार कुछ जुमले थे जो अखबारों की सुर्खियां बन रहे थे। हिंदी अखबारों के साथ अंग्रेजी अखबारों ने भी इन जुमलों को सुर्खियां बनाने के लिए इसे बिना अनुवाद किए ज्यों का त्यों लेना शुरू किया।

मोदी सरकार के साथ ही संघ परिवार भी सत्ता के केंद्र में आया और वह भी मीडिया को हिंदी में खरी-खरी सुनाने लगा। इसी के साथ अंग्रेजी अखबारों ने ‘घर वापसी’ को भी अपना लिया और ‘मन की बात’ हिंदी में कहने लगे। अब सरकार पर वार करने के लिए विपक्ष को भी हिंदी पर उतरना पड़ा और ज्यादातर जगहों पर अंग्रेजी बोलने वाले राहुल गांधी ‘सूट-बूट की सरकार’ लेकर आए और अंग्रेजी अखबारों ने इसे ज्यों का त्यों लिया। इन दिनों सत्ता और विपक्ष की आक्रामक भाषा में हुए वाद-विवाद को वैसा ही ‘सनसनीखेज’ रखने के लिए उनके बयानों को हिंदी में ही रखते हैं। अब चाहे मुलायम सिंह यादव के ‘लड़कों की गलती’ के बारे में हो या साध्वी प्राची के हर विरोधी को ‘पाकिस्तान भेजने’ की बात। इनकी जलती हुई भाषा का अनुवाद कर अंग्रेजी के अखबार इस पर पानी नहीं डालना चाहते।

भारत का शहरी मध्यमवर्ग हिंदी और अंग्रेजी को लेकर बाईलिंग्वल हो रहा है। अभी तो इस वर्ग की बोलचाल की भाषा हिंदी है लेकिन इसके बच्चों की पढ़ने-लिखने और हंसने-खेलने की भाषा अंग्रेजी हो रही है। इसलिए अब बोलचाल की भाषा में भी घालमेल है। और इसका असर देखें अंग्रेजी के फीचर पन्नों पर। अंग्रेजी के संपादकीय पन्नों को छोड़ें तो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले/देखे जाने वाले और विज्ञापित पन्ने ‘दिल्ली टाइम्स’ और ‘एचटी सिटी’ के ही होते हैं। इसलिए इसकी भाषा ऐसी रखी जाती है कि अंग्रेजी के वाक्य विन्यास समझने वाले लोगों को इसे समझने के लिए शब्दकोश नहीं देखना पड़े। ऐसे पन्नों की हेडिंग में हिंदी फिल्मों का प्रभाव भी बखूबी देखा जा सकता है।

मसलन ‘पीके है क्या’, ‘क्रेजी किया रे’, ‘धूम’, ‘मस्ती की पाठशाला’ जैसे शब्द अंग्रेजी में लिखी खबरों के शीर्षक बनते हैं। शाहरुख खान अभिनीत ‘चक दे इंडिया’ के बाद कई बार शीर्षकों में ‘चक दे’ का इस्तेमाल किया गया। अंग्रेजी अखबारों में खेल के पन्नों पर सुर्खियां बनाने के लिए ‘विराट’ और ‘शिखर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसी तरह घर का खाना, रोटी, मक्के दी रोटी, सरसों दा साग, लहंगा-चोली, चूड़ी, बिंदिया, झुमकी, चांद, व्रत, पूर्णिमा, अमावस्या, सावन, फुच्चा, अदरक वाली चाय, बाबूजी, शादी, सरपंच, गांव, देश, मंदिर, मस्जिद बिना अनुवाद के अंग्रेजी अखबारों के पन्नों पर मौजूद हैं।

पापड़, भेलपूरी से बढ़ा ऑक्सफोर्ड का स्वाद

चूड़ीदार, भेलपुरी, ‘अरे यार’ और ढाबा। ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल हो चुके हैं। हाल के दिनों में आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी में 500 नए शब्द शामिल किए गए हैं। खास बात है कि इनमें से 240 शब्द भारतीय भाषाओं के हैं। हाल ही में कीमा और पापड़ भी अंग्रेजी के शब्दकोश का जायका बढ़ा चुके हैं। चूड़ीदार को परिभाषित करते हुए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में कहा गया है, ‘यह एक ऐसी कसी हुई पतलून है जिसमें पांव के निचले हिस्से की तरफ बहुत ज्यादा कपड़ा लगता है और एड़ियों के पास सिकोड़ा जाता है, पारंपरिक रूप से यह दक्षिण एशिया की पोशाक है’।

वहीं ढाबा के बारे में कहा गया है, ‘सड़क किनारे बना फूड स्टॉल या रेस्टोरेंट’। यार को संज्ञा के रूप में परिभाषित करते हुए कहा गया है, ‘दोस्त या मित्र के लिए आमफहम शब्द’। मुंह में पानी लानेवाली चटपटी भेलपुरी की परिभाषा कुछ यूं है, ‘भारतीय पाक कला, एक तरह का खाना या नाश्ता जिसमें मुरमुरे, प्याज, आलू और मसालेदार मीठी चटनी मिलाई जाती है, जो कभी-कभी पूरी (पूड़ी) के साथ परोसी जाती है’।

हिंदी तो हिंदी, कई संस्कृत शब्द ऐसे हैं जिन्हें ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल किया गया है। कर्म, बंधन ऐसे ही शब्द हैं। इसके साथ ही आर्यन, चक्र, धर्म, गुरु और पंडित को भी ज्यों का त्यों अंग्रेज अपने साथ ले ही गए थे, हॉलीवुड ने ‘अवतार’ शीर्षक से फिल्म बनाकर इसे आमफहम शब्द बना डाला।

भारत के धर्म, संस्कृति और खान-पान ने भी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में खासी जगह बनाई है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी जगरनॉट (जगन्नाथ) के रूप में उपलब्ध है। तमिल शब्द पेरिया (सामाजिक रूप से अछूत) तो उर्दू का पर्दा भी अंग्रेजी बन चुका है।

भारतीय कपड़ों और चलन से जुड़े शब्द भी इसमें शामिल हैं। बिंदी और धोती ऐसे ही शब्द हैं। इसके साथ ही भारतीय थाली के व्यंजन करी (तमिल), बासमती (चावल), घी, कबाब और चटनी भी आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी का स्वाद बढ़ा चुके हैं। इसके अलावा चीता, बंगाली शब्द बंगलो (घर) मराठी शब्द चिट (नोट या खत) भी ऑक्सफोर्ड में घुसपैठ कर चुके हैं।

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