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प्रकृति के अधिकारों की परवाह और जीवन शैली में बदलाव ही उपाय

गर्ग के मुताबिक पूर्व में भी विषाणु जनित ऐसी जिन बीमारियों की वैक्सीन बनी, वे विषाणु खत्म नहीं हो पाए। कोरोना विषाणु की भारत में जो दो प्रमुख किस्में मिली हैं, वे उतनी खतरनाक नहीं हैं जितनी यूरोप और अमेरिका की किस्में हैं।

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. डीसी जैन का निष्कर्ष है कि विषाणु जनित रोगों का मूल कारण मांसाहार है।

कोरोना विषाणु पृथ्वी से आसानी से खत्म होने वाला नहीं है और इनसान को इसके साथ ही जीने की आदत डालनी होगी। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर यूं ही नहीं पहुंचे। बढ़ते विषाणु प्रकोपों के मूल में दरअसल पर्यावरण और पारिस्थितिकीय परिवर्तन की बड़ी भूमिका है। सूक्ष्म जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर अमर प्रकाश गर्ग के मुताबिक धरती की क्षमता अधिकतम तीन सौ करोड़ मानव आबादी की है जबकि दुनिया की आबादी इस समय सात सौ करोड़ है।

शोभित विश्वविद्यालय मेरठ के कुलपति प्रोफेसर अमर प्रकाश गर्ग इस समय इंडियन साइंस कांग्रेस के पर्यावरण विकास विभाग के अध्यक्ष भी हैं। वे चाहते हैं कि प्रकृति को भी उसके अधिकार दिए जाएं। यानी स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ जल और स्वच्छ वायु जरूरी है अन्यथा आदमी को अंजाम भुगतना होगा। गर्ग मानते हैं कि आदमी ने अपने आराम और विलासितापूर्ण जीवन की जो भी चीजें बनाई हैं, सबका पर्यावरण पर दुष्प्रभाव होता है।

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. डीसी जैन का निष्कर्ष है कि विषाणु जनित रोगों का मूल कारण मांसाहार है। ज्यादातर खतरनाक विषाणु विभिन्न जानवरों के जरिए आदमी के शरीर में प्रवेश कर उसे संक्रमित करते हैं। जैन भारत सरकार के अपर स्वास्थ्य महानिदेशक रह चुके हैं। वे शाकाहार के पक्ष में वैश्विक स्तर पर पिछले तीन दशकों से अभियान चला रहे हैं। पर इसके लिए किसी धार्मिक परंपरा के बजाए वे वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि अंडा जनित और मांसजनित खाद्य उत्पादों के पैकिंग पर मियाद खत्म होने की तारीख दर्ज नहीं करना भी संक्रामक रोगों के फैलाव का कारण है।

जबकि अमर प्रकाश गर्ग मानते हैं कि पूर्णबंदी कोरोना का निदान नहीं है। हमें भौतिक दूरी और खानपान में बदलाव के साथ अपनी जीवन शैली बदलनी होगी। वैसे भी कोविड-19 का कोई टीका बनना सरल नहीं है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों के अध्ययन से यह सामने आ चुका है कि यह आरएनए विषाणु अब तक करीब 30 हजार रूप बदल चुका है। लिहाजा कोई एक वैक्सीन हर स्वरूप के लिए कारगर होगी, कह नहीं सकते।

गर्ग के मुताबिक पूर्व में भी विषाणु जनित ऐसी जिन बीमारियों की वैक्सीन बनी, वे विषाणु खत्म नहीं हो पाए। कोरोना विषाणु की भारत में जो दो प्रमुख किस्में मिली हैं, वे उतनी खतरनाक नहीं हैं जितनी यूरोप और अमेरिका की किस्में हैं। कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों को गर्ग भारत के संदर्भ में बहुत ज्यादा नहीं आंकते। प्रोफेसर गर्ग भी डीसी जैन की इस राय से सहमत हैं कि विषाणु जनित रोगों का कारण असुरक्षित मांसाहार भी है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर ही हम विषाणु जनित रोगों का मुकाबला कर सकते हैं। जैविक उत्पाद और मसालों का सेवन इसमें उपयोगी है। आदमी की वनस्पति आधारित आहार की तरफ रुचि बढ़ानी होगी।

डॉ डीसी जैन कहते हैं कि दुनिया के सारे देशों को बैक्टीरिया, विषाणु और प्रोटोजोन के संक्रमण की समस्या पर सम्यक अध्ययन करना चाहिए। कोरोना से पहले भी स्वाइन फ्लू, जीका, सार्स, इबोला, एचआइवी और बर्ड फ्लू जैसे रोगों ने खुद को सर्वशक्तिमान समझने वाले आदमी को चुनौती दी थी।

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