अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने दिल्ली के सत्य निकेतन में एक हॉस्टल गिरने की घटना के बाद अपना विरोध तेज कर दिया है। संघ परिवार से जुड़े छात्र संगठन ABVP ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कई कैंपसों में प्रदर्शन और धरना दिया।

ABVP ने MCD कमिश्नर संजीव खिरवार को निलंबित करने की मांग की है। यह प्रदर्शन उस घटना के एक दिन बाद हुआ जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास छात्रों के लिए बने पांच मंजिला पीजी की इमारत गिर गई थी। हादसे में कम से कम सात लोगों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए।

खास बात यह है कि ABVP का यह प्रदर्शन भाजपा शासित दिल्ली में भाजपा के नियंत्रण वाले MCD के खिलाफ हो रहा है। साथ ही केंद्र में भी एनडीए की सरकार है। हालांकि, ABVP की ओर से अपनी ही विचारधारा से जुड़े शासन और नगर निकाय पर सवाल उठाने का यह कोई पहला मामला नहीं है। ABVP इससे पहले भी बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकारों या स्थानीय निकायों के खिलाफ अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन कर चुका है।

एबीवीपी के हालिया प्रोटेस्ट

राजस्थान

एक महीने पहले, एबीवीपी ने राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार के खिलाफ छात्र संघ चुनाव दोबारा न कराने के विरोध में प्रदर्शन किया था। छात्र संगठन ने राज्य भर में प्रदर्शन आयोजित किए थे।

अगस्त के अंत में इस संगठन ने राज्य भर में “विद्यार्थी हुंकार” अभियान के नाम से विरोध प्रदर्शन आयोजित किए, जिसमें सरकारी कॉलेजों में पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, स्वच्छता, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं और अवसंरचना की मांग की गई। इंदौर में प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर कार्यालय के बाहर पुलिस बैरिकेड तोड़ दिए थे।

उत्तर प्रदेश

2025 में एबीवीपी ने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया था। एबीवीपी ने तब लखनऊ -बाराबंकी सीमा पर बाराबंकी स्थित श्री रामस्वरूप मेमोरियल विश्वविद्यालय के खिलाफ प्रदर्शन किया था। संगठ ने आरोप लगाया था कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों को मान्यता नहीं देती है। इसके परिणामस्वरूप पुलिस के साथ झड़प हुई, जिसमें पुलिस ने एबीवीपी कार्यकर्ताओं को जमकर पीटा था।

इसके बाद एबीवीपी ने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उत्तर प्रदेश के मंत्री ओपी राजभर के आवास के सामने प्रदर्शन किया। जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें “गुंडे” कहा। स्थिति को बेकाबू होने से बचाने के लिए, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एबीवीपी का समर्थन किया और अस्पताल का दौरा किया। उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने भी पुलिस कार्रवाई की आलोचना की थी।

मध्य प्रदेश

सितंबर 2024 में जब भाजपा ने मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित सरकारी होल्कर विज्ञान महाविद्यालय में सदस्यता अभियान शुरू किया, तो एबीवीपी ने तुरंत परिसर में “राजनीतिक कार्यक्रमों” के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कॉलेज के प्रधानाचार्य को अपनी अनुमति के बिना परिसर में राजनीतिक कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए भी मजबूर किया।

गोरखपुर

जुलाई 2023 में फीस वृद्धि जैसे मुद्दों पर गोरखपुर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और उत्तर प्रदेश पुलिस के बीच झड़प हुई और कथित तौर पर विश्वविद्यालय प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों पर हमला भी किया गया। एबीवीपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।

कर्नाटक

2022 में जब कर्नाटक में भाजपा सत्ता में थी, तब एबीवीपी ने गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र के आवास पर धावा बोल दिया था। उन्होंने राज्य सरकार पर अपने युवा कार्यकर्ता प्रवीण नेट्टारू की हत्या की सुरक्षा करने में असमर्थ होने का आरोप लगाया था। मंत्री उस समय अपने आवास पर मौजूद नहीं थे। एबीवीपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

विरोध प्रदर्शनों का कारण क्या है?

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की तुलना में NSUI (कांग्रेस का छात्र संगठन), AISF (CPI का छात्र संगठन), SFI (CPI(M) का छात्र संगठन) और AISA (CPI(ML) का छात्र संगठन) सीधे अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों के नियंत्रण में हैं। इसके विपरीत ABVP सीधे भाजपा के नियंत्रण में नहीं है। यही वजह है कि ABVP के पास भाजपा की सरकार के खिलाफ भी खुलकर विरोध करने और अपनी रणनीति तय करने की अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता है।

एबीवीपी की स्थापना 1948 में हुई थी और 1949 में आरएसएस से संबद्ध एक छात्र संगठन के रूप में इसे औपचारिक रूप से पंजीकृत किया गया था। यह उस प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें आरएसएस के स्वयंसेवक समाज के विभिन्न वर्गों के बीच काम करने के लिए अलग-अलग संगठन बनाते थे। एबीवीपी का उद्देश्य कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों तक पहुंचना और परिसरों में वामपंथियों का मुकाबला करना था। इस प्रकार एबीवीपी का इतिहास जनसंघ (जो आरएसएस से संबद्ध पहला राजनीतिक संगठन था और जिसकी स्थापना 1951 में हुई थी) और भाजपा (जो 1980 में जनसंघ की उत्तराधिकारी बनी) दोनों से पुराना है।

दूसरी बात, जहां NSUI कार्यकर्ता का करियर आगे बढ़ने का रास्ता पहले इंडियन यूथ कांग्रेस और फिर कांग्रेस तक जाता है। वहीं ABVP कार्यकर्ता संघ परिवार के किसी भी संगठन में जा सकता है, जरूरी नहीं कि वह भाजपा में ही जाए।

हालांकि, ABVP से जुड़े कई कार्यकर्ता भाजपा में जाने की इच्छा रखते हों, क्योंकि वहां सत्ता तक पहुंच मिलती है और कई लोगों ने सफलतापूर्वक यह बदलाव किया भी है, लेकिन ABVP से BJP में जाना हर कार्यकर्ता के लिए तय या स्वाभाविक अगला कदम नहीं है।

ABVP के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक हर्ष अत्री ने कहा, “ABVP के लिए छात्रों की जिंदगी सबसे अहम है। जब ऐसी दुखद खबर (इमारत गिरने की) आती है, तो ABVP यह नहीं देखता कि सरकार किसकी है-BJP की या किसी और पार्टी की। PG के कुप्रबंधन (mismanagement) के कारण भारत के अलग-अलग हिस्सों से अपना करियर बनाने आए छात्रों की जान चली गई। हमने तब भी ऐसे PG का ऑडिट करने की मांग की थी जब आम आदमी पार्टी की सरकार थी। हम इसमें शामिल सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं, जिसमें MCD कमिश्नर भी शामिल हैं, जो अपने कुत्ते को टहलाने के लिए स्टेडियम खाली करवा लेते थे, लेकिन उन छात्रों के लिए कुछ नहीं किया जिनकी इमारत गिरने से जान चली गई।”

नाम न बताने की शर्त पर एबीवीपी के एक कार्यकर्ता ने कहा कि भाजपा के साथ हमारे वैचारिक संबंध हैं, लेकिन हमारी प्रतिबद्धता छात्रों के मुद्दों के प्रति है।

आरएसएस से जुड़े संगठनों का एक चलन यह भी रहा है कि भाजपा के सत्ता में होने के बावजूद ये संगठन सड़कों पर उतरकर विरोध करते हैं। इससे वे विपक्ष की जगह को अपने प्रभाव में लेने और विपक्षी दलों के लिए जगह कम करने की कोशिश करते हैं। उदारीकरण के बाद स्वदेशी जागरण मंच इसका एक उदाहरण रहा। उसने वैश्वीकरण का विरोध किया और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के समय भी उसकी नीतियों की मुखर आलोचना की।

संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि इस व्यवस्था से संघ परिवार को एक फायदा होता है। अगर सरकार की किसी नीति से लोग नाराज हैं, तो उन्हें यह भरोसा रहता है कि संघ परिवार के भीतर ही कुछ संगठन उनकी चिंताओं और विरोध की आवाज उठा रहे हैं।

हालांकि, यह तरीका केवल संघ परिवार तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय भी ऐसा ही एक उदाहरण देखने को मिला था। सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) में वामपंथी विचारों को जगह मिली थी, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के समर्थक माने जाते थे।

सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे में पांचवीं गिरफ्तारी, छात्रों ने पहचान लिया तो मौके से डरकर भागा था हॉस्टल मैनेजर

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने एक और आरोपी को गिरफ्तार किया है। हादसे के बाद मौके पर पहुंचा यह शख्स वहां मौजूद छात्रों के पहचानने पर डरकर भाग गया था। पुलिस के मुताबिक, उसे डर था कि छात्र उसके साथ मारपीट कर सकते हैं। पढ़ें पूरी खबर।