एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अगर किसी रेल दुर्घटना में मृत यात्री के शव से ट्रेन का टिकट बरामद नहीं होता है तो केवल इसी आधार पर उसके परिजनों को मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (RCT) और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए साल 2015 में चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले एक व्यक्ति की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

जस्टिस संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शख्स की विधवा की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि आरसीटी और हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था कि दुर्घटना के बाद मृतक का टिकट नहीं मिला इसलिए यह साबित नहीं हो सका कि वह एक वास्तविक (बोना फाइड) यात्री था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Welfare Legislation) है, इसलिए इसकी उदार और उद्देश्यपूर्ण (Liberal and Purposive) व्याख्या की जानी चाहिए।

‘कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उदार और उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए’

अपने फैसले में पहले के न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति संजय करोल ने कहा, “कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उनके उद्देश्य और विधायिका की मंशा को आगे बढ़ाने के लिए उदार और उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए। उनकी शाब्दिक या अत्यधिक संकीर्ण व्याख्या नहीं अपनाई जानी चाहिए। मूल उद्देश्य यह है कि कानून के पीछे की मंशा प्रभावी रूप से लागू हो सके।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीकी आधारों या प्रक्रियागत कमियों के कारण कानून के कल्याणकारी उद्देश्य को विफल नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के एक अंग होने के नाते रेलवे के लिए इतना संकीर्ण और सीमित दृष्टिकोण अपनाना उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसलों का दिया हवाला

फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124A के तहत मुआवजे की कार्यवाही ‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ (No-Fault Liability) के सिद्धांत पर आधारित है। इसका उद्देश्य रेलवे की अप्रिय घटनाओं के पीड़ितों या उनके परिजनों को बिना किसी लापरवाही का प्रमाण दिए त्वरित मुआवजा उपलब्ध कराना है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “सिर्फ इसलिए कि मृतक के पास से ट्रेन का टिकट बरामद नहीं हुआ, उसे वास्तविक (बोना फाइड) यात्री मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि 4 सप्ताह के भीतर मुआवजा जारी करे

यह मामला चंद्रकांत ठक्कर की मौत से जुड़ा है, जो नवंबर 2015 में रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिर गए थे। दुर्घटना के बाद उनका यात्रा बैग जिसमें कथित रूप से ट्रेन का टिकट रखा था, लापता हो गया था। उनकी विधवा पत्नी की ओर से अधिवक्ता श्वेता प्रियदर्शिनी द्वारा दायर अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रेलवे दुर्घटना एवं अप्रिय घटनाएं (मुआवजा) नियमों के तहत 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जारी करे। तय समय में अगर भुगतान नहीं किया जाता है तो दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अब तक हमने इस बात पर चर्चा की कि मुआवजा पाने के लिए यात्री या उसके परिजनों को क्या साबित करना होता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि रेलवे की अपने यात्रियों के प्रति क्या जिम्मेदारी है। इस मामले के संदर्भ में यह कहना जरूरी है कि किसी भी कारण से ट्रेन से गिरकर यात्री का घायल होना या उसकी मौत होना कोई असामान्य घटना नहीं है।”

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(इनपुट- पीटीआई)