अब 20 नहीं, 24 हफ्ते तक गर्भपात की इजाज़त, पर कुछ शर्तों के साथ

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) अधिनियम, 2018 के बारे में एक अधिसूचना जारी की, जिसके अनुसार गर्भपात की समय सीमा 20 हफ्तों से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दी गई है।

Abortion and Pregnancy
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। Photo Source- Pixabay

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) अधिनियम, 2018 के बारे में एक अधिसूचना जारी की, जिसके अनुसार गर्भपात की समय सीमा 20 हफ्तों से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दी गई है। हालांकि इसके लिए कुछ शर्ते लगाई गई हैं। इस मामले को लेकर एक्टिविस्ट की मांग है कि कानून को अभी और बेहतर बनाए जाने की उम्मीद है। 24 सप्ताह की समय सीमा वाला यह संशोधन सभी महिलाओं पर समान रूप से लागू नहीं होगा। संशोधन के अनुसार यह केवल रेप सर्वाइवर, नाबालिग या फिर असामान्य गर्भधारण वाले मामलों पर ही लागू होगा।

टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस अभियान को शुरू करने वाले निखिल दातार का कहना है कि गर्भपात का सबसे आम कारण गर्भनिरोधक विफलता है, जिसके लिए समय सीमा अभी भी 20 सप्ताह ही है। दातार का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपने केस को नहीं छोड़ेंगे। डॉक्टर दातार मुंबई के एक गायनेकोलॉजिस्ट हैं, जोकि साल 2008 में महिलाओं में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी की समय सीमा को बदलने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि अभी बहुत सारा काम बाकी है, इसलिए केस वापस नहीं लिया जाएगा।

वकील अनुभा रस्तोगी कहती हैं कि हम उम्मीद कर रहे थे कि संशोधन महिलाओं के अधिकारों की स्वीकृति के रूप में होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जिन नियमों पर नई समय सीमा लागू होती है, उन्हें सही से परिभाषित करने की जरूरत है। इससे पहले, डॉक्टर मेडिकल जांच के आधार यह बता पाते थे कि गर्भधारण करने का विपरित असर महिला के स्वास्थ्य पर पड़ेगा या नहीं, लेकिन संशोधन में इसका कहीं जिक्र नहीं है।

पिछले 5 सालों में 300 से ज्यादा मामले ऐसे आए हैं, जहां महिलाओं ने 20 सप्ताह की समय सीमा के बाद गर्भपात की अनुमति मांगी थी। डॉ दातार ने बताया कि ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया था। संशोधन लागू होने के बाद हमें इस तरह के सिस्टम को फिर से स्थापित करना होगा, इसके लिए बकायदा एक मार्गदर्शन नोट या फिर एक रूप रेखा बनाई जानी चाहिए।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2008 में डॉक्टर दातार ने अपने एक मरीज को लेकर पहले बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और फिर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंचे थे। निकिता मेहता नाम की मरीज 24 सप्ताह की अवस्था में गर्भपात कराना चाहती थीं, क्योंकि उनके भ्रूण के दिल में कुछ असामान्यताएं देखने को मिली थी। निकिता को गर्भपात की अनुमति नहीं मिली थी और बाद में उन्होंने अपने बच्चे को खो दिया। इसके बाद डॉक्टर दातार ने गर्भपात की समयसीमा बढ़ाने की अपनी मांग को जारी रखा। उनका कहना है कि कुछ जगहों पर जीत मिली है लेकिन अभी लड़ाई बाकी है।

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