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विशेष: आप का अवसर

दिल्ली के रामलीला मैदान में संविधान और जनता के अधिकारों की ‘तीसरी कसम’ खाने वाले यह भूल गए कि जनता ने उन्हें जनादेश क्यों दिया था। केजरीवाल ने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश किया था। अण्णा हजारे की पहचान की टोपी में सिर घुसाने के बाद वाम की जमीन पर अपनी खास आम आदमी वाली छवि की फसल काटी। ‘आम आदमी पार्टी’ नाम रखने का उद्देश्य ही वाम जैसे काम का दावा करना था।

आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल।

‘ऐ वाए इंकलाब जमाने के जौर से
दिल्ली जफर के हाथ से पल में निकल गई।’
कल तक अखंड भारत के नक्शे के सामने खड़े हो भारत माता और राष्ट्रवाद के नाम पर वोट मांग सत्ता में आने वाले ने दिल्लीवालों से दिल्ली की सीमा बंद करने और दिल्ली के अस्पतालों में केवल दिल्लीवालों का इलाज करने के लिए राय मांगी है। लगता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री स्मृति विलोप के शिकार हो अदालत की पिछली फटकार को भूल चुके हैं जो इन्हें कथित दिल्लीवालों के साथ भेदभाव करने के लिए पड़ी थी। अगर उन्होंने याद रख कर यह सब किया है तो वे अपनी क्षुद्र राजनीति के लिए दिल्लीवासियों का इस्तेमाल कर अदालत और संविधान की भावना के खिलाफ जाने का अपराध कर रहे हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री से लेकर दिल्ली विधानसभा के मौजूदा ज्यादातर सदस्य दिल्ली से बाहर के हैं। दिल्ली विधानसभा के सदस्यों को चुनने वाली जनता कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की है। दिल्ली के ज्यादातर अस्पताल और अन्य संसाधन केंद्रीय खर्च से चलते हैं। दिल्ली देश के सवा सौ करोड़ लोगों की है। यहां के अस्पतालों पर केंद्र का यानी पूरे देश का पैसा लगा है। जिस मुख्यमंत्री ने कोरोना की बीमारी के बाद अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए केंद्र से पांच हजार करोड़ रुपए का पैकेज मांगा है वही आज बाहर के बीमारों के लिए दिल्ली की सीमा बंद करने की बात कह रहे हैं।

दिल्ली के रामलीला मैदान में संविधान और जनता के अधिकारों की ‘तीसरी कसम’ खाने वाले यह भूल गए कि जनता ने उन्हें जनादेश क्यों दिया था। अरविंद केजरीवाल ने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश किया था। अण्णा हजारे की पहचान की टोपी में सिर घुसाने के बाद वाम की जमीन पर अपनी खास आम आदमी वाली छवि की फसल काटी।

‘आम आदमी पार्टी’ नाम रखने का उद्देश्य ही वाम जैसे काम का दावा करना था। लेकिन पार्टी सिर्फ दिल्ली में अपनी पहचान बना पाई। पूरे देश में असफल होने के बाद केजरीवाल ने पार्टी से उन सभी चेहरों को हटा दिया जिनमें वाम विकल्प की संभावनाएं थीं, चाहे वे प्रशांत भूषण हों या योगेंद्र यादव। इन चेहरों के साथ सरोकारों को भी पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा सिर्फ सत्ता पाने की राजनीति की।

राष्ट्रीय वाम विकल्प की वृहत्तर सोच लेकर आने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली तक सीमित हो गई है। दिल्ली मेट्रो ने तो अपना दायरा हरियाणा के वल्लभगढ़ और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा तक बढ़ाया, लेकिन केजरीवाल सरकार ने एनसीआर तक से कन्नी काट लेने की बात कही है। मजदूरों को ठेकेदारों से मुक्ति दिलाने का वादा करने वाले केजरीवाल खुद ही ठेकेदार वाली भाषा बोल कर भेदभाव की लठैती पर उतर आए हैं।

दिल्ली दंगे से लेकर कोरोना तक के मामलों में केजरीवाल दिल्ली की जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करते आ रहे हैं। दंगा मामले में लंबी खामोशी के बाद दिल्ली सरकार की तरफ से महाधिवक्ता तुषार मेहता की नियुक्ति की संस्तुति करते हैं। यह रजामंदी साबित करती है कि केजरीवाल का अंतिम ध्येय केंद्र का पिछलग्गू बनना होता है लेकिन भरपूर नाटकीयता के बाद। केंद्र सरकार जो भी जनमानस तैयार कर लेती है, उस पर थोड़ा अकड़ने और भड़कने के बाद उसके सामने दंडवत प्रणाम करते हैं। केजरीवाल का साथ दे अपनी साख गंवाने वाले रोते हैं कि इन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ एक आवाज नहीं निकाली। उदारवादी लोकतंत्र का विकल्प अवसरवादी तंत्र साबित हुआ है।

दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के लिए नवउदारवादी राजनीति के खिलाफ जाकर बिजली, पानी और परिवहन के मुद्दे पर पूरी दुनिया की वाहवाही बटोरी। जनता को मुक्त कर आम आदमी को सत्ता में हिस्सेदार बनाने का सपना दिखाया। कहा था कि हम शासक नहीं होंगे जनता को सशक्त करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री अब जनता को ही संकीर्ण सोच में बांट रहे हैं। महज दस-बीस साल पहले उत्तर प्रदेश, बिहार या हरियाणा से आकर दिल्ली का मतदाता बना शख्स बाहर से आकर मुख्यमंत्री बने केजरीवाल को बताएगा कि दिल्ली में बाहरी लोगों का इलाज होना चाहिए या नहीं।

नेता की भूमिका जनता का नेतृत्व करना, उसे नया रास्ता दिखाने की होती है। जनता को सोच, विचार, चेतना से लैस कर राजनीतिक दखल करवाने की होती है। केजरीवाल जनता के मन को मैला कर रहे हैं कि स्वास्थ्य सेवा का मतलब सिर्फ अपने घर के लोगों का इलाज करना होता है। नेता की तरह जनता की सोच भी इतनी क्षुद्र हो जाएगी तो क्या होगा? कारखाना चलाने के लिए दूसरे राज्यों से मजदूर चाहिए, लेकिन उन्हीं राज्यों से बीमार आएंगे तो उन्हें इलाज नहीं देंगे।

राष्ट्रीयता की भावना संकीर्णतावाद के इस निम्नतम पर है कि आप प्रतिक्रियावादी बन जाने के लिए मजबूर करते हैं।। केजरीवाल जनता के बीच वैमनस्य पैदा कर रहे हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली का एक सहज रिश्ता है जिसमें आप जहर घोल रहे हैं। जब अमेरिका में भेदभाव के आरोपी बंकर में छुप रहे हैं, घुटनों के बल माफी मांग रहे हैं तो केजरीवाल जनता को दुराग्रही नीति की ओर धकेल रहे हैं। वैमनस्यता का यह विषाणु कोरोना से ज्यादा घातक है।

(पुनश्च: थोड़ा सा दिमाग पर बोझ डालेंगे तो अरविंद केजरीवाल को याद आ जाएगा कि अगर वो वाराणसी से लोकसभा चुनाव जीत गए होते तो क्या होता?)

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