ताज़ा खबर
 

जनसत्ता विशेष समाज: सहना नहीं लड़ना होगा

हालिया प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 71 फीसद से अधिक बुजुर्ग अपने ही पारिवारिक सदस्यों की प्रताड़ना के शिकार होते हैं। गंभीर सवाल यह है कि तकनीक और विकास के उत्तर आधुनिक दौर में परिवार से लेकर समाज तक लड़कियों के लिए रूढ़िग्रस्त मानसिकता क्यों है, क्यों उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा। जबकि इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है। प्रस्तुत है महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय से जुड़े इन्हीं विरोधाभासों को लेकर एक सामयिक विमर्श।

दुनिया में बदलाव। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

समाज तीव्र गति से बदल रहा है। टेलीफोन लाइन से आगे मोबाइल फोन के आविष्कार के साथ देखते-देखते बहुत कुछ बदल गया। अब तो स्मार्टफोन के रूप में यह हर किसी के हाथ का खिलौना बन गया है। ऐसा खिलौना, जिससे दुनियाभर की खबरों के साथ अपने लोगों से कई स्तरों पर संपर्क साधा जा सकता है। बदलाव के इसी दौर में कोरोना का कहर और पूर्णबंदी भी आई। इसी के साथ आ गई आॅनलाइन कक्षाएं। पैसे के लेनदेन के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल इस दौरान काफी बढ़ गया है।

वॉट्सऐप और फेसबुक जैसे सोशल ऐप तो अब हमारे रोजमर्रा के व्यवहार का जरूरी हिस्सा हो चले हैं। इस तरह तकनीक ने देखते-देखते कितना कुछ बदल दिया हमारे देश-समाज में, हमारे पूरे परिवेश में। इस बीच, अगर नहीं बदली तो हमारी पारिवारिक-सामाजिक सोच। जीवनशैली तो बदल गई पर सोचने-समझने का ढंग नहीं बदला। प्रेम नहीं बदला, पुरुषवादी सोच नहीं बदली, लड़कियों को गुलाम रखने की कोशिश भी नहीं बदली।

गौर से देखें तो किसी भी घर में पुरुषवादी सत्ता की शिकार सबसे ज्यादा महिला है। उसकी परवाह किसी को नहीं है। मां-बाप से लेकर भाई तक उसे कोई नहीं समझता। पति तो उसे सबसे ज्यादा भयभीत करता है। पर इसी पति के इशारे पर चलकर या उन्हें अपने इशारे पर चलाकर वह घर में अनुशासन लाती है। ऐसा अनुशासन जहां लड़की पढ़ाई के दौरान भी घरेलू काम करेगी और बेटा बैठकर टीवी देखेगा या यहां-वहां घूमकर समय नष्ट करेगा। जिस भी परिवार में बेटी को दबाया जाता है लेकिन बेटे को खासी छूट दी जाती है, वहां बहुत संभावना कि बेटा हाथ से निकल जाए। आए दिन समाज में माता-पिता के खिलाफ अपने ही बेटे की दुर्व्यवहार की खबरें आती रहती हैं। हालिया प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 71 फीसद से अधिक बुजुर्ग पारिवारिक सदस्यों की प्रताड़ना के शिकार हैं।

गंभीर सवाल यह है कि तकनीक और विकास के उत्तर आधुनिक दौर में परिवार से लेकर समाज तक लड़कियों के लिए रूढ़िग्रस्त मानसिकता क्यों है, क्यों उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा। जबकि इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है। सदियों से विचारणीय प्रश्न है लड़की पराई क्यों मानी जाती है। आखिर लड़की में ऐसी क्या कमी है कि मां-बाप तक के घर में भी उसके साथ दोयम सलूक किया जाता है? ऐसा कोई अन्यायकारी व्यवहार तभी लंबे समय तक जारी रहता है, जब इसका कारगर विरोध न किया जाए। चुप रहना और चुपचाप सहना लड़कियों की सबसे बड़ी कमजोरी है। यह कमजोरी उन्हें पुरुषों के आत्मविश्वास व अधिकार-सत्ता के सामने टिकने नहीं देता।

वह तब भी चुप रहती है जब परिवार के भीतर खानपान तक में उसके साथ भेदभाव किया जाता है। नौबत यहां तक आती है कि घर का सारा काम करने वाली को सबसे आखिर में बचा-खुचा खाना मिलता है। अन्याय और उपेक्षा की यह स्थिति महिलाओं को भीतर ही भीतर तोड़ती चली जाती है, उसके अंदर सब कुछ सहने का एक विवश भाव पनपने लगता है।

यह स्थिति न बदले इसके लिए जानबूझकर घरों में बेटियों को कामचलाऊ तालीम दी जाती है। वह भी सरकारी या फिर साधारण स्कूल से ताकि उस पर ज्यादा खर्च न करना पड़े। इसके उलट बेटों की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम वाले या बड़े स्कूलों में कराई जाती है ताकि वे योग्य और सबल बन सकें। जब एक ही घर में लड़का और लड़की की तालीम में फर्क किया जाता है, तब भी वह विरोध नहीं करती, नहीं उठाती सवाल मां के आगे कि किस कारण उसकी औकात घर में एक कामवाली बाई से ज्यादा की नहीं है, वही औकात अपनी बेटी को तो मत दो। लड़का-लड़की के भेदभाव को लेकर वह पिता से भी कुछ नहीं कह पाती। इस तरह शुरू होता है लड़कियों के जीवन में अपना हक खोने का सिलसिला। वह आगे फिर कभी भी अपने हक के लिए नहीं लड़ पाती है।

आगे जब दसवीं-बारहवीं की पढ़ाई के बाद बड़ी संख्या में लड़कियों को घर बिठा दिया जाता है और फिर माता-पिता अपनी हैसियत के हिसाब से दुल्हा खरीदने की, तोल-मोलकर उसके साथ ब्याह कराने की कोशिश शुरू करते हैं। विरोध वो तब भी नहीं कर पाती। नहीं कह पाती अपनी मां को- रुक मां, भाई की तरह मैं भी अपने पैर पर खड़ी हो लूं, तो शादी के बारे में सोचूंगी। अभी नहीं।

गौरतलब है कि लड़कियों को उनके अभिभावकों द्वारा शादी के दौरान यह भी जता-बता दिया जाता है कि उसकी शादी कराकर, शादी में लगने वाला खर्च करके उन्होंने लड़की की जिम्मेदारियों से हर तरह से मुक्ति पा ली है। लिहाजा अब उन्हें मां-बाप की तरफ से कोई हिस्सा, कोई सहयोग नहीं मिलेगा। दिलचस्प है कि हक से इस तरह की बेदखली गैरकानूनी है पर सामाजिक रूढ़ि का ताना-बाना इतना मजबूत है कि इसे कोई कानून भी नहीं तोड़ पाता है।

इसके समानांतर चलती है बेटों की दुनिया। उनके जन्मोत्सव से लेकर मुंडन, उपनयन आदि में खूब पैसा लगता है। पढ़ाई पर तो खर्च होता ही है। इसके बावजूद धन-संपत्ति पर उनके अधिकार बने रहते हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात है कि चाहे शादी के बाद बेटी किसी भी हाल में हो, बीमार हो जाए, पति मारपीट करता हो या फिर उसके साथ कोई दुर्घटना हो जाए तो भी मायके से उसकी मदद के लिए आमतौर पर कोई सामने नहीं आता है। उलटे उसे हालात से समझौता करने, धैर्य के साथ सब कुछ सहने की सीख दी जाती है।

इसी का नतीजा है कि हर साल घरेलू हिंसा के तहत दहेज सहित घरेलू प्रताड़ना के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं। दुर्भाग्य से ऐसे मामले जब सार्वजनिक होते हैं या पुलिस के सामने आते हैं तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ज्यादातर मामलों में लड़की के घर वाले तब पुलिस में शिकायत करते हैं, जब पता चलता है कि उनकी बेटी की जान चली गई या वो अस्पताल में जिंदगी-मौत की जंग लड़ रही है। तब इस अफसोस का भी कोई मतलब नहीं रह जाता कि उसने इस बारे में पहले जब बताई तब इस बारे में उनके घरवालों ने कोई कदम उठाया होता तो नौबत यहां तक नहीं आती।

कोरोना कहर के बीच दिल्ली का एक ऐसा ही मामला हमारी जानकारी में आया। लड़की छह साल से पति के जुल्म को सह रही थी। कई बार उसने मां-बाप से पति के हिंसात्मक सलूक की चर्चा भी की। लेकिन चुपचाप सहने की सीख देते-देते, उसे हमेशा के लिए चुप करा दिया गया। एक दिन पुलिस द्वारा सूचना भेजी गई कि लड़की ने फंदे से झूलकर अपनी जान दे दी है। मामले में ससुराल पक्ष की भूमिका को देखते हुए पुलिस ने शव उन्हें सौंपने से इनकार कर दिया। ऐसे में पूर्णबंदी के दौरान लड़की के माता-पिता सरकार से अनुमति मिलने के बाद अस्सी हजार रुपए खर्च कर गाड़ी लेकर दिल्ली आए बेटी का शव लेने के लिए।

इतना पैसा बेटी की समस्याओं के निराकरण में पहले खर्च किए जाते तो शायद वह आज जिंदा होती। महिलाओं की हत्या या आत्महत्या जैसे मामलों में आमतौर पर होता यह है कि इसके पहले कई सालों तक उनके खिलाफ अत्याचार होता है। जिंदगी खत्म करने का फैसला विवशता की अंतिम या चरम परिणति होती है। इस क्रूर परिणति के पीछे लड़के-लड़कियों में भेदभाव की वह रूढ़ि है, जिसे करने-ढोने वाले कोई और नहीं बल्कि लड़कियों के अपने होते हैं, उनके मां-बाप होते हैं। अगर मायके में बेटियों को संपत्ति में हिस्सा देने का चलन शुरू हो जाए तो निश्चित तौर पर बड़ा बदलाव आएगा। हो सकता है कि इससे दहेज की मांग तक खत्म हो जाए।

आखिर में एक बात जो समझनी जरूरी है वह यह कि महिलाओं की दुनिया में बदलाव कहीं बाहर से नहीं आएगा। इसके लिए उन्हें खुद पहल करनी होगी। संपत्ति के अधिकार का मामला हो या रोजगारपरक प्रशिक्षण लेकर नौकरी करने की बात हो, आधी दुनिया की दृढ़ इच्छाशक्ति और अन्याय के खिलाफ खड़े होने के उसके साहस से ही महिला सशक्तिकरण का कारगर रूप देश-समाज में दिखेगा।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 कोरोना संकटः देश में Lockdown 3.0 का आज से आगाज़ः जानें क्या खुलेगा और क्या रहेगा बंद?
2 बोले CM केजरीवाल, ‘अब दिल्ली को फिर से खोलने का है वक्त’; Lockdown 3.0 में दीं राहतें, देखें लिस्ट
3 COVID-19 संकटः अप्रैल में इस बार गिरा 3200 करोड़ का राजस्व, लंबे वक्त तक नहीं झेल पाएंगे Lockdown- बोले दिल्ली CM केजरीवाल