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किताब में दावा: जनरल करियप्पा को कमांडर इन चीफ नहीं बनाना चाहते थे नेहरू, कई आर्मी चीफ से नहीं थे रिश्ते अच्छे

कृष्ण मेनन इससे पहले लंदन में उच्चायुक्त थे और कश्मीर मसले पर संयुक्त राष्ट्र में खूब वाहवाही बटोर चुके थे। पंडित नेहरू ने उन्हें बाद में देश बुला लिया और चुनावों के बाद 1957 में रक्षा मंत्री बना दिया।

Author Published on: October 19, 2019 4:06 PM
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के टॉप मिलिट्री अफसरों से रिश्ते सामान्य नहीं थे। ऐसा दावा किया जाता रहा है।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के टॉप मिलिट्री अफसरों से रिश्ते सामान्य नहीं थे। ऐसा दावा किया जाता रहा है। दावा ऐसे भी किए जाते रहे हैं कि पंडित नेहरू का चीन से बहुत ज्यादा लगाव था इसलिए उन्होंने चीनी सैनिकों के कदम को नजरअंदाज कर दिया था, जिस वजह से 1962 में भारत-चीन का युद्ध हुआ। अनित मुखर्जी की किताब ‘द अब्सेन्ट डायलॉग’ में पंडित नेहरू के समय राजनेताओं, नौकरशाहों और सेना के बीच के मानसिक द्वंद की पड़ताल की गई है। किताब में कहा गया है कि नेहरू जी ने जनरल करियप्पा को देश का पहला चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया था लेकिन वो उनकी पहली पसंद नहीं थे।

‘द स्क्रॉल’ में छपे एक आलेख के मुताबिक किताब में दावा किया गया है कि करियप्पा से पहले नेहरू के तत्कालीन रक्षा मंत्री बलदेव सिंह ने जनरल नाथू सिंह और जनरल राजेन्द्रसिंहजी से भी संपर्क किया था लेकिन इन दोनों ने चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनने से इनकार कर दिया था क्योंकि ये दोनों जनरल करियप्पा से जूनियर थे। ऐसे में जनरल करियप्पा को कमांडर इन चीफ बनाया गया था। कहा जाता है कि जनरल करियप्पा और उनके उत्तराधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंहजी के साथ भी नेहरू सरकार के संबंध मधुर नहीं थे। इन अफसरों और राजनेताओं के बीच संबंधों में तनाव और उदासीनता का आलम था।

हालांकि, उनके बाद बने नए चीफ श्रीनागेश ने राजनीतिक हस्तियों और अधिकारियों के बीच रिश्ते सामान्य रखे। शायद यही वजह है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें असम फिर बाद में आंध्र प्रदेश का गवर्नर बनाया जा सका। वो पहले ऐसे गवर्नर थे जो आर्मी चीफ रह चुके थे। श्रीनागेश के बाद जनरल थिमैया नए आर्मी चीफ बनाए गए। दावा किया जाता है कि शुरुआत में जनरल थिमैया और पंडित नेहरू के बीच रिश्ते सामान्य थे लेकिन बाद में उनके बीच भी रिश्तों में कड़वाहट आ गई। इसकी वजह तत्कालीन रक्षा मंत्री वी कृष्ण मेनन को बताया जाता है।

कृष्ण मेनन इससे पहले लंदन में उच्चायुक्त थे और कश्मीर मसले पर संयुक्त राष्ट्र में खूब वाहवाही बटोर चुके थे। पंडित नेहरू ने उन्हें बाद में देश बुला लिया और चुनावों के बाद 1957 में रक्षा मंत्री बना दिया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में कृष्ण मेनन और जनरल थिमैया के बीच की तल्खियों के बारे में लिखा है, “थिमैया ने चीन की सीमा पर बढ़ती कारगुजारियों के चलते सेना को तैयार रखने की बात कही, मेनन ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत को पाकिस्तान से खतरा है न कि चीन से। जनरल थिमैया ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए बेल्जियन राइफल्स की मांग की तो मेनन ने कहा कि वो सेना को नाटो के हथियार नहीं देंगे।’

जनरल थिमैया और कृष्ण मेनन के बीच रिश्तों में और तल्खी तब आई जब मेनन ने जनरल बीएम कौल को पूर्वी कमान का लेफ्टिनेंट बना दिया। कहा जाता है कि इससे नाराज होकर जनरल थिमैया अपना इस्तीफा देने प्रधानमंत्री नेहरू के पास चले गए थे लेकिन नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से रोक लिया था। जनरल थिमैया 1961 में रिटायर हो गए उसके बाद ही चीनी सेना ने हमला बोल दिया और भारत को 1962 में चीन से हार का सामना करना पड़ा। जब सरकार के अंदर और बाहर इसका विरोध हुआ तो पहले तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल थापर का इस्तीफा मांग लिया गया फिर बाद में मेनन से भी नेहरू ने इस्तीफा ले लिया।

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