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ट्रेन में मिलने वाले बेड रोल का सफरः जानिए कैसे होती है धुलाई, कितना खर्च करती है रेलवे

हम आपको बता रहे हैं ट्रेन में मिलने वाले बेड रोल के सफर की कहानी है। इस कहानी में हम आपको बताएंगे कि इनकी धुलाई कैसे होती है और रेलवे कहां से करवाती है बेड रोल की धुलाई, कितना करती है इस पर खर्च ?

हर रोज करीब 18 लाख बेड रोल सर्विस में लिए जाते हैं। (Photo By Praveen Khanna)

रेलमंत्रालय ने हालही में फैसला किया है ट्रेन में मिलने वाले कंबलों की हर यूज के धुलाई होगी। पिछले महीने रेल राज्यमंत्री ने संसद में बताया था कि ट्रेन में मिलने वाले कंबलों की धुलाई दो महीने में एक बार होती है। जिसके बाद से इस पर सवाल उठने लगे थे। हर रोज करीब 18 लाख बेड रोल सर्विस में लिए जाते हैं। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं ट्रेन में मिलने वाले बेड रोल के सफर की कहानी है। इस कहानी में हम आपको बताएंगे कि इनकी धुलाई कैसे होती है और रेलवे कहां से करवाती है बेड रोल की धुलाई, कितना करती है इस पर खर्च ?

साल 1998 में उत्तरी रेलवे ने दिल्ली डिविजन के बेड रोल की धुलाई के लिए प्राइवेट लॉन्ड्री सर्विस हायर की थी। लॉन्ड्री में केमिकल और डिटर्जेंट के साथ इनकी धुलाई होती है। जर्मनी से मंगाई गई टनल मशीनों में इनकी धुलाई होती है, इन टनल्स से एकबार में 42 टन कपड़ों की धुलाई हो सकती है। टनल में केमिकल और डिटर्जेंट डालकर कंप्यूटराइज्ड मशीनों द्वारा बेडरोल की धुलाई होती है। टनल में करीब 30 मिनट तक कपड़े रहते है। उसके बाद गर्म पानी में निचोड़ा जाता है और फिर इन्हें दा या तीन ड्रायर में सुखाया जाता है। सुखाए जाने के बाद इन्हें एक बड़ी टेबल पर ले जाया जाता है, जहां इन्हें कर्मचारी फोल्ड करता है और आगे फ्लैट आयरन मशीन के पास भेजा जाता है। यह पर कर्मचारी यह भी देखता है कि किसी कपड़े पर कोई दाग तो नहीं रह गया, अगर कोई दाग रह जाता है तो उसे दोबारा से धुलाई के लिए भेजा जाता है।

बेडरोल की इंटरनेशनल स्टेंडर्ड के मुताबिक सफेदी 80 फीसदी होनी चाहिए। उससे कम होने पर रेलवे स्वीकार नहीं करती। पैकिंग से पहले कर्मचारी एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के जरिए उनकी सफेदी नापते हैं। सफेदी चेक होने के बाद उन्हें पैकिंग के लिए भेज दिया जाता हैं। जहां उन्हें रेलवे के भूरे रंग के बैग में पैक किया जाता है। उसके बाद करीब 50-50 सेट्स को एक बड़े बैग में पैक किया जाता है। फिर ट्रक में भरकर इन्हें लिनन डीपो भेज दिया जाता है। हर रोज करीब 1.25 सेट्स लॉन्ड्री सर्विस के लिए आते हैं। रेलवे एक बैडशीट के छह रुपए और तौलिए और तकिए के कवर के तीन रुपए देता है।

फटे हुए कंबलों के लिए भी टेलरिंग सुविधा है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास स्थित फैक्ट्री में फटे हुए कंबलों को रिपेयर किया जाता है, खासकर उनके कोनों को। रेलवे फटे कोने के कंबलों को नहीं लेता है। यह हर रोज करीब एक हजार कंबल धुलाई के लिए आते हैं। इस फैक्टीर में तीन बड़े आकार की मशीनें लगी हुई हैं। एकमशीन में एक बार में 35 कंबल धोये जा सकते हैं। एक धुलाई में एक घंटे का वक्त लगता है। उसके बाद इन्हें फोल्ड करके लिनन डीपो भेज दिया जाता है। कंबलों को एक महीने में एक बार ही धोया जाता है। रेलवे मंत्रालय ने 13 साल पहले दो महीने में एक बार कंबल धोने के आदेश दिए थे।

रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल का कहना है कि आप लोग ये देखिए कि फाइव स्टार जैसी जगहों पर कंबलों को कितनी बार धोया जाताहै। सच्चाई ये है कि वूलन को हर यूज के बाद नहीं धोया जा सकता। हम लोग यात्रियों को दो बैडशीट देते हैं जिनमें से एक बैडशीट का इस्तेमाल कंबल के नीचे लगाकर किया जा सकता है। रेलवे एक कंबल की धुलाई के 18 रुपए देता है और पूरे बेडरोल की धुलाई के 36.80 रुपए देता है। करीब हर रोज 3.5 बेडरोल धुलाई के लिए आते हैं।

इससे पहले बेड रोल की धुलाई का काम छोटी स्थानीय लॉन्ड्री को दिया गया था। लेकिन बाद में जांच में पाया गया कि कुछ लॉन्ड्री इन्हें केवल पानी से निकालककर सुखा देते हैं। उसके बाद रेलवे ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में जाने का फैसला किया। इसके मुताबिक प्राइवेट कंपनी को रेलवे जमीन देगी, जिसमें वे रेलवे के नियमों के मुताबिक लॉन्ड्री लगाएंगे। चेन्नई में पहली बार बूट मॉडल लॉन्ड्री लगाई गई। उसके बाद यह सुविधा केरल, हैदराबाद, मुंबई और अहमदाबाद में लगाई गई।

दिल्ली डिविजन हर साल 32 करोड़ रुपए वॉशिंग और डिस्ट्रीब्यूशन पर खर्च कर देता है। इस डिविजन के पास करीब 75 हजार सेट्स हैं और 45 ट्रेनों में तीस हजार सर्विस में यूज किए जाते हैं। एक कंबल की इकॉनोमिक जिंदगी 48 महीने है। इसका मतलब है कि चार साल तक सर्विस में रहेगा। लेकिन कंबल को डिविजन अकसर 12 महीने बाद बदल देता है। बैडशीट को 12 महीने को यूज किया जा सकता है, लेकिन आठ महीने बाद ही उन्हें रिटायर कर दिया जाता है। तौलियों को नौ महीनों तक यूज किया जा सकता है, लेकिन उन्हें चार महीनों में ही बदल दिया जाता है। एक बार यूज किया हुआ सेट ट्रेन में तब तक रहता है, जब तक वह वापस अपने स्टेशन पर नहीं आती। कई बार कई-कई दिन सेट्स बाहर रहते हैं। इसलिए लंबी दूरी की ट्रेन अकसर एक यात्रा से ज्यादा सेट्स होते हैं।

पहले बेडरोल केवल एसी-1 क्लास में ही दिए जाते थे, उसके बाद 90 के दशक के मध्य एसी-2 टियर क्लास में भी दिए जाने लगा। पहले बेडरोल को संभालने की जिम्मेदारी कोच और डीजल इंजन संभालने वाले मैकेनिकल डिपार्टमेंट के पास थी। एसी-2 में बेडरोल की सुविधा के साथ ही इसकी जिम्मेदारी कमर्शियल डिपार्टमेंट के पास भी आ गई। जल्द ही एसी-2 टायर क्लास में सेट्स बांटने का काम इलेक्ट्रिकल डिपार्टमेंट के पास आ गया। इसके पीछे लॉजिक बताया गया कि जो अटैंडेंट एसी मशीन कंट्रोल करता है वह सेट्स भी बांट सकता है। साल 2008-09 में रेलवे मंत्रालय ने फैसला किया कि सेट्स संभालने की जिम्मेदारी कोच की सफाई और व्यवस्था देखने वाले इंचार्ज की होगी। इसलिए तब से अब तक सेट्स मैनेजमेंट की जिम्मेदारी मैकेनिकल डिपार्टमेंट के पास ही है।

हर एक बेड रोल में एक कंबल, दो बैडशीट, एक तकिया कवर और एक हाथ साफ करने के लिए तौलिया दिया जाता है। एसी-1 टायर क्लास नहाने के लिए अलग से तौलिया और कंबल का कवर दिया जाता है। रेलवे 290 रुपए में बैडशीट, 370 रुपए में कंबल और 34 रुपए में तौलिया खरीदता है।

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