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7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोट में 5 को मौत की सजा, 7 को उम्रकैद

मुंबई में लोकल ट्रेनों में सीरियल बम ब्लास्ट के आरोपियों को आज सजा सुनाई जा सकती है। करीब 9 साल पहले हुए इस सीरियल ब्लास्टों में शहर के 188 लोग मौत की नींद सो गए थे

Author नई दिल्ली/मुंबई | September 30, 2015 8:04 PM
7/11 सीरियल ब्लास्टः आज मिलेगा पीड़ितों के परिजनों को इंसाफ? (PTI)

विशेष अदालत ने नौ साल पहले मुंबई लोकल ट्रेन में सिलसिलेवार विस्फोट के लिए आज पांच लोगों को मौत की सजा और सात अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनायी। विस्फोट में 189 लोगों की मौत हो गयी थी और 800 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।

फैसला सुनाते हुए विशेष मकोका न्यायाधीश यतीन डी शिंदे ने कमाल अहमद अंसारी (37), मोहम्मद फैसल शेख (36), एहतेशाम सिद्दकी (30), नावेद हुसैन खान (30) और आसिफ खान (38) को मौत की सजा सुनायी।

तनवीर अहमद अंसारी (37), मोहम्मद माजिद शफी (32), शेख आलम शेख (41), मोहम्मद साजिद अंसारी (34), मुजम्मिल शेख (27), सोहेल महमूद शेख (43) और जमीर अहमद शेख (36) को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। इन सभी के तार प्रतिबंधित संगठन सिमी से जुड़े थे।

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खार रोड-सांताकू्रज, बांद्रा-खार रोड, जोगेश्वरी-माहिम जंक्शन, मीरा रोड-भायंदर, माटुंगा-माहिम जंक्शन और बोरेवली के बीच 10 मिनट के अंतराल में लोकल ट्रेनों में हुए विस्फोटों से मुंबई दहल गई थी। लोकल ट्रेनों के प्रथम श्रेणी के डब्बों में सात आरडीएक्स बम विस्फोट हुआ था जिसमें 189 लोगों की मौत हो गयी थी और 829 लोग घायल हो गए थे।

एटीएस के आरोपपत्र में कहा गया था कि मुंबई के उपनगर गोवंदी में एक कमरे में इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेस (आईआईडी) बनाये गये। आरोप पत्र के अनुसार बम बनाने के दौरान कुछ पाकिस्तानी नागरिक भी मौजूद थे।

लंबे समय तक चले मुकदमे के बाद अदालत ने 11 सितंबर को 13 में से 12 आरोपियों को दोषी करार दिया जबकि एक आरोपी को बरी कर दिया गया। इन सभी के प्रतिबंधित संगठन सिमी से कथित रूप से संबंध रहे हैं।

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अदालत ने सजा को लेकर पिछले सप्ताह दोनों पक्षों की दलीलों की सुनवाई पूरी की थी। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने 12 में से आठ आरोपियों को मृत्युदंड देने और चार अन्य के लिए आजीवन कारावास की मांग की थी।

पांच आरोपियों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी पाया गया। सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता, विस्फोटक अधिनियम, गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से रोकथाम अधिनियम, भारतीय रेलवे अधिनियम और मकोका के प्रावधानों के तहत दोषी पाया गया था।

अदालत ने सभी आरोपियों को मकोका की धारा 3(1) (आई) के तहत भी दोषी पाया, जिसके तहत मृत्युदंड का प्रावधान है। इन 13 आरोपियों को मामले की जांच के दौरान गिरफ्तार किया गया था और उनके खिलाफ मामले की सुनवाई की गई। ये सभी भारतीय हैं।

आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीसी) ने नवंबर 2006 में 30 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जिसमें 17 फरार हैं। पाकिस्तान स्थित लश्करे तैयबा का सदस्य आजम चीमा समेत 13 पाकिस्तानी नागरिक इस मामले में फरार हैं।

न्यायाधीश शिंदे ने 12 आरोपियों के दोषी पाए जाने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों को गवाहों से पूछताछ करने की अनुमति दी थी। इसके बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत को यह दिखाने के लिए नौ गवाहों से पूछताछ की कि आरोपियों ने स्वयं को सुधारा है और इसलिए उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया जाए।

गवाहों से पूछताछ के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने 12 दोषियों के प्रति नरमी बरतने की अपील करते हुए कहा था कि वे केवल सरगना चीमा के प्यादे थे। बचाव पक्ष के वकील ने यह भी कहा कि दोषियों ने जेल में कई कठिनाइयों का सामना किया है और नरमी बरते जाने के लिए यह भी एक पहलू है।

बहरहाल, विशेष सरकारी अभियोजक राजा ठाकरे ने मामले के सभी दोषियों को ‘मौत का सौदागर’ करार देते हुए 12 दोषियों में आठ को मौत की सजा दिए जाने पर जोर दिया था। ठाकरे ने अदालत को यह भी बताया कि (सामाजिक) विचारकों को लगता है कि इन दोषियों को रखने के लिए सरकार पर बोझ क्यों डाला जाए। ईमानदार करदाताओं का धन क्यों खर्च किया जाए।

आठ साल तक चले मुकदमे में अभियोजन ने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के आठ, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के पांच अधिकारियों और 18 डॉक्टरों सहित 192 गवाहों से पूछताछ की। बचाव पक्ष ने 51 गवाहों से और एक व्यक्ति से अदालत के गवाह के रूप में पूछताछ की।

मकोका न्यायाधीश ने पिछले साल 19 अगस्त को मुकदमे की सुनवाई पूरी कर ली थी। गवाहों से पूछताछ दो साल बाद फिर शुरू हुयी क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 2008 में मुकदमे पर रोक लगा दी थी। रोक से पहले अभियोजन ने एक अधिकारी से पूछताछ की थी। उच्चतम न्यायालय ने 23 अप्रैल 2010 को रोक हटा लिया।

20 जुलाई 2006 से तीन अक्तूबर 2006 के बीच एटीएस द्वारा गिरफ्तार 13 आरोपियों में 11 ने इकबालिया बयान में विस्फोट में संलिप्तता कबूल की लेकिन बाद में मुकर गए। मामले में तब मोड़ आया जब बचाव पक्ष के एक वकील ने इंडियन मुजाहिद्दीन के सह संस्थापक सादिक शेख को बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर बुलाने की मांग की। उसने 2008 में पुलिस से कहा था कि ट्रेन विस्फोट सहित 2005 के बाद से हुए सभी विस्फोटों के लिए आईएम के सदस्य जिम्मेदार थे।

अदालत ने बचाव पक्ष के गवाह के रूप में सादिक से जिरह की इजाजत दे दी। बाद में उसने दावा किया कि दबाव में उसने यह बात कही थी।

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