मर्क एंड कंपनी की सबसे ज्यादा बिकने वाली कैंसर इम्यूनोथेरेपी दवा Keytruda का जेनेरिक वर्जन बनाने की दौड़ में कम से कम सात भारतीय निर्माता शामिल हैं। डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का कहना है कि जून 2028 में दवा का पेटेंट समाप्त होने पर दो साल के अंदर एक सस्ता विकल्प उपलब्ध हो सकता है । इस दवा के 200 मिलीग्राम खुराक की कीमत 3 लाख रुपये से अधिक है।
मेदांता-नोएडा के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ तरुण दुर्गा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हमने अन्य इम्यूनोथेरेपी के मामले में भी यही देखा है। बायोसिमिलर के आने से कीमतों में काफी गिरावट आती है, कभी-कभी तो 70% तक। कैंसर की दवाओं को अधिक किफायती और सुलभ बनाने का यह सबसे आसान तरीका है। हालांकि, लंबे समय में भारत को अपनी खुद की थेरेपी विकसित करने में निवेश करने की आवश्यकता है।”
ये कंपनियां कर रहीं टेस्टिंग
औषधि नियामक, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के तहत विशेषज्ञ समिति की बैठकों और देश के क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, टेस्टिंग कर रही या लाइसेंस प्राप्त करने वाली कंपनियों में सन, हेटेरो और इंटास शामिल हैं। जनवरी में, बायोकॉन ने कहा कि वे अपने पोर्टफोलियो में पेम्ब्रोलिज़ुमाब सहित तीन और कैंसर बायोसिमिलर शामिल करेंगे। चीनी कंपनी बायोथेरा और रूसी कंपनी बायोकाड द्वारा विकसित जेनेरिक संस्करणों की टेस्टिंग भी भारत में चल रही है।
भारत में मर्क एंड कंपनी (MSD) के पास पेम्ब्रोलिज़ुमाब (Pembrolizumab) नामक अणु पर केवल एक वैध पेटेंट है जबकि वैश्विक स्तर पर इसके पास इससे जुड़े लगभग 1000 पेटेंट और पेटेंट समूह हैं, जिनमें से लगभग 84% दवा को 2014 में पहली मंजूरी मिलने के बाद दायर किए गए थे। कंपनी भारत में इस दवा के प्री-फिल्ड पेन और सबक्यूटेनियस संस्करण के लिए भी पेटेंट प्राप्त करने की कोशिश कर रही है।
पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने के तुरंत बाद बायोसिमिलर संस्करण बाजार में आ सकते
कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और रोगी अधिकार समूहों के गठबंधन, दवाओं और उपचार तक पहुंच पर कार्य समूह के सह-संयोजक केएम गोपाकुमार ने बताया, “पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने के तुरंत बाद बायोसिमिलर संस्करण बाजार में आ सकते हैं, जब तक कि कोई बड़ी और आर्थिक रूप से सक्षम कंपनी उन्हें अदालत में न ले जाए। ऐसा ही दूसरे चेकपॉइंट इनहिबिटर निवोलुमाब के मामले में भी हुआ है। हालांकि पेम्ब्रोलिज़ुमाब के दो सेकेंडरी पेटेंट भारतीय पेटेंट कार्यालय द्वारा खारिज कर दिए गए हैं लेकिन किसी अणु के आसपास के पेटेंट समूह का उपयोग मुख्य पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी बायोसिमिलर उत्पादन को रोकने के लिए किया जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की जेनेरिक संस्करण बेचने से रोकने के लिए बीएमएस की याचिका
जनवरी में, दिल्ली हाई कोर्ट ने पेटेंट की समय सीमा 2 मई को समाप्त होने से कुछ महीने पहले ही ज़ाइडस लाइफसाइंसेज को ब्रिस्टल-मायर्स स्क्विब (BMS) द्वारा निर्मित निवोलुमाब के बायोसिमिलर के निर्माण और बिक्री का रास्ता साफ कर दिया। फरवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने ज़ाइडस को जेनेरिक संस्करण बेचने से रोकने के लिए बीएमएस द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया।
मार्च में, सरकार ने बायो फार्मा शक्ति की घोषणा की। यह 10,000 करोड़ रुपये की योजना है जिसका उद्देश्य उच्च लागत वाली दवाओं पर आयात निर्भरता कम करने के लिए बायोसिमिलर के लिए एक घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। जिसमें निर्माताओं को कैंसर और ऑटोइम्यून डिसिज पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है।
एम गोपाकुमार ने कहा कि पेम्ब्रोलिज़ुमाब अब विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल है इसलिए भारत को इसके बायोसिमिलर के विकास में सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा, “बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (बीआईआरएसी) जैसे संगठनों को सेल लाइन विकसित करनी चाहिए और कई कंपनियों को इस पर आधारित बायोसिमिलर बनाने की अनुमति देनी चाहिए।”
