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68 साल बाद गणतंत्र से गुजरा बचपन

देश ने भले ही गुरुवार को 68वां गणतंत्र दिवस मनाया हो, लेकिन पूर्वोत्तर भारत के कुछ बच्चों के लिए यह पहला मौका था जब उन्होंने अपने गणतंत्र के उत्सव को महसूस किया।

Author January 28, 2017 1:05 AM

रूबी कुमारी
देश ने भले ही गुरुवार को 68वां गणतंत्र दिवस मनाया हो, लेकिन पूर्वोत्तर भारत के कुछ बच्चों के लिए यह पहला मौका था जब उन्होंने अपने गणतंत्र के उत्सव को महसूस किया। उत्तरी त्रिपुरा में विस्थापितों का जीवन बिता रहे ब्रू/रियांग आदिम जनजाति के बच्चों ने वहां बने अस्थायी स्कूलों में इस साल पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया, तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान गाया। राष्टÑीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की पहल पर मिजोरम और त्रिपुरा सरकार के संयुक्त प्रयास से इन बच्चों ने पहली बार जाना कि गणतंत्र दिवस क्या होता है। 1997 में मिजोरम से विस्थापित होकर यहां आए इस जनजाति के बच्चों के लिए कोई नियमित स्कूल नहीं है और सर्व शिक्षा अभियान के तहत जो अस्थायी व्यवस्था की गई है, वहां अभी तक झंडा नहीं फहराया जाता था। एनसीपीसीआर के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने बताया कि ब्रू/ रियांग जनजाति के लोग जातीय दंगों के कारण 1997 में मिजोरम से विस्थापित होकर उत्तरी त्रिपुरा में बस गए। इस जनजाति के लगभग 5000 परिवार उत्तरी त्रिपुरा में बने छह राहत शिविरों में रहते हैं। कानूनगो ने कहा कि वर्तमान समय में इन परिवारों में लगभग 12 हजार बच्चे होंगे, लेकिन उनके लिए किसी औपचारिक स्कूल की व्यवस्था नहीं है। इन बच्चों के लिए सर्व शिक्षा अभियान की वित्तीय सहायता से नॉन रेजिडेंशियल स्किल ट्रेनिंग सेंटर (एनआरएसटीसी) चलाए जा रहे हैं। उत्तरी त्रिपुरा में ऐसे 16 केंद्र हैं जहां लगभग 4000 बच्चे दाखिल हैं। एनसीपीसीआर की दो सदस्यीय टीम ने पिछले 12 और 13 जनवरी को त्रिपुरा के इन शिविरों का दौरा करने पर पाया कि इन केंद्रों में बीस साल से कभी झंडा नहीं फहराया गया। इसके बाद आयोग ने 17 जनवरी को त्रिपुरा सरकार को पत्र लिखकर इन केंद्रों में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने को कहा।

आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि ब्रू/रियांग जनजाति के ये बच्चे काफी पिछड़े हुए हैं। राष्टÑगान से भी उनका परिचय अधूरा ही है। अस्थायी स्कूलों (एनआरएसटीसी) में ये बच्चे जाते तो हैं, लेकिन औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से वे कोसों दूर हैं। प्रियंक कानूनगो ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इस जनजाति के लोगों की घर वापसी और पुनर्वास के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके तहत मंत्रालय ने इन बच्चों में कौशल विकास को लेकर स्थिति की समीक्षा के लिए आयोग के साथ बैठक बुलाई थी। इसके तहत आयोग ने इस क्षेत्र का दौरा कर वहां की स्थिति को समझा जिससे यह सामने आया कि इन बच्चों ने आज तक कभी तिरंगा नहीं फहराया।

गौरतलब है कि इस बार राजपथ पर राज्यों की झांकियों में त्रिपुरा की झांकी का विषय ब्रू/रियांग जनजाति ही थी। इन जनजातीय लोगों को अपने मूल राज्य भेज कर फिर से बसाने का मामला लंबे समय से अधर में लटका है। हालांकि कोई भी नागरिक देश के किसी भी कोने में रहे, 68 साल पुराने गणतंत्र में देश के कुछ नौनिहालों का अपने गणतंत्र और राष्ट्रध्वज से भी परिचित न होना गंभीर सवाल खड़े करता है।

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