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खून की कमी से जूझ रहा है देश का बचपन, 5 साल से कम उम्र के 58 फीसदी बच्चे हैं एनीमिक

आंकड़ों के मुताबिक 5 साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चों का विकास ठीक ढंग से नहीं हो पाया, 21 फीसदी बच्चे बहुत ही कमजोर हालत में थे, जबकि 36 फीसदी बच्चों का वजन उनके उम्र के अनुपात में कम था।

देश में 5 साल तक के आधा से ज्यादा बच्चे खून की कमी से पीड़ित हैं (EXPRESS PHOTO)

विकास और बुलंदियों को रोज़ाना छू रहे भारत के लिए कुछ आंकड़े बेहद शर्मिंदगी भरे हैं, और ये आंकड़े देश की ज़मीनी हकीकत को पेश करते हैं। ऐसे ही आंकड़ों को पेश किया है परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) ने । हाल में जारी इन आंकड़ों के मुताबिक भारत में 5 साल से कम उम्र के 58 फीसदी बच्चे एनीमिक हैं, यानी की खून की कमी से पीड़ित हैं। देश के आधे से अधिक नौनिहालों के एनीमिक होने का मतलब है कि इनके खून में हेमोग्लोबिन की कमी है, जिसकी वजह से इन बच्चों में बीमारियों के फैलने का खतरा अधिक होता है और इसी वजह से उनका मानसिक विकास भी प्रभावित हो सकता है।

2015-16 में देश के लगभग 6 लाख घरों में किये गये इस सर्वे के नतीजे स्वस्थ मातृत्व और स्वस्थ बचपन के हमारे नारों की पोल खोलते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 5 साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चों का विकास ठीक ढंग से नहीं हो पाया, 21 फीसदी बच्चे बहुत ही कमजोर हालत में थे, जबकि 36 फीसदी बच्चों का वजन उनके उम्र के अनुपात में कम था। 2011 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक देश में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 12.4 करोड़ है। इस लिहाज से 7.2 करोड़ बच्चे रक्तहीनता से पीड़ित हैं, लगभग 5 साल के बच्चों का सही शारीरिक विकास नहीं हो पा रहा, और 4.4 करोड़ बच्चों का वजन कम है।

NFHS के आंकड़ों से पता चला है कि देश की आधी गर्भवती महिलाएं भी खून की कमी से पीड़ित हैं। जिसकी वजह से उनके बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं। इस डाटा के मुताबिक 15 से 49 साल के आयु वर्ग में 53 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष एनीमिक हैं। केन्द्र सरकार के लिए इस सर्वे को करने वाली नोडल एजेंसी मुंबई के इंटरनेशनल इंस्‍टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज के प्रोफेसर, बलराम पासवान कहते हैं कि यूपी में चल रहे चुनाव की वजह से वहां का डाटा जारी नहीं किया गया है।
इस सर्वे से ये भी पता चलता है कि देश के गरीब राज्यों जैसे बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, असम, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में एनीमिया का दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, जबकि हरियाणा, गुजरात और दक्षिण के राज्यों में स्थिति थोड़ी अच्छी है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय औसत से फिर भी ये राज्य पीछे ही हैं।

विश्व स्वास्थय संगठन का कहना है कि ये आंकड़े देश की गरीब सामाजिक आर्थिक स्थिति का सूचक है। और इसका साफ मतलब ये है कि हिन्दुस्तान के कई इलाक़े ऐसे हैं जहां अभी भी लोग भोजन की कमी, लचर स्वास्थ्य सेवाएं और घटिया जीवन स्तर जैसी समस्याओं से रोजाना दो चार हो रहे है।

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