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रिपोर्ट: नरेंद्र मोदी की नोटबंदी ने खत्म कर दीं नौकरियां, 50 लाख लोगों की जॉब्स प्रभावित

रिपोर्ट के अनुसार, "सामान्यतः पुरुषों से कहीं अधिक महिलाएं बुरी तरह इससे प्रभावित हुई हैं। उनकी बेरोजगारी दर कहीं अधिक है।"

Jobs Crisis, Unemployment, Jobs, Employment, Narendra Modi, PM, BJP, Demonetisation, Economy, Household, Azim India, National News, India News, Hindi Newsतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटोः एपी)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने देश में बड़े स्तर पर नौकरियां खत्म कर दीं। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनबल एंप्लॉयमेंट की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2019’ रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2016 में पीएम के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के उस फैसले से तकरीबन 50 लाख लोगों की जॉब्स चली गई थीं।

हालिया रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले एक दशक में देश में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी, जबकि साल 2016 के बाद नौकरी से जुड़ा संकट और भयावह हो गया। इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए ‘न्यूज 18’ की एक खबर में कहा गया कि भारत में 20 से 24 साल की उम्र के लोगों के बीच नौकरी का संकट सबसे अधिक है। खासकर तब, जब यह आयुवर्ग देश में कामगर युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है।

राजनीतिक एक्सपर्ट्स की मानें तो यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है, जब देश आम चुनाव की प्रक्रिया से गुजर रहा है। नतीजतन विपक्षी दलों को मोदी सरकार पर रोजगार के संकट को लेकर हमला बोलने के लिए एक और प्रमुख वजह मिल सकती है। वैसे, रोजगार का मुद्दा चुनाव के पहले हमेशा से वोटर्स को अपनी ओर लुभाता रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, “सामान्यतः पुरुषों से कहीं अधिक महिलाएं बुरी तरह इससे प्रभावित हुई हैं। उनकी बेरोजगारी दर कहीं अधिक है।” वहीं, बेरोजगारी पर नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे से जुड़े आंकड़े फिलहाल सामने नहीं आए हैं।

हालांकि, एनएसएसओ रिपोर्ट की लीक हुए एक प्रति जरूर कुछ मीडिया संस्थानों के पास आई। वह बताती है कि 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी, जो कि बीते 45 सालों में सबसे अधिक बताई गई। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस आंकड़े को मुद्दा बनाते हुए बीजेपी पर जुबानी निशाना भी साधा था। हालांकि, नीति आयोग ने इस पर कहा था कि यह आंकड़ा प्रामाणिक नहीं है।

बता दें कि नोटबंदी करने के पीछे पीएम ने तब चार अहम कारण गिनाए थे। उनमें आतंकवाद, कालाधन, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात शामिल थी। पर जमीनी हकीकत, आंकड़ों और एक्सपर्ट्स की राय पर गौर फरमाएं तो पीएम की नोटबंदी अपने तीन लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम नजर आती है।

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