46 दिन और लगातार जारी रहने के साथ 18वीं लोकसभा के आठवें सत्र ने एक खास रिकॉर्ड बना दिया है। संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह सत्र अब तक का तीसरा सबसे लंबा अनिश्चितकालीन (sine die) स्थगन बन गया है। इससे पहले दो सबसे लंबे स्थगन कांग्रेस सरकारों के दौरान हुए थे। वहीं 2014 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद यह संसद के स्थगित रहने की सबसे लंबी अवधि है।

संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था और 13 अगस्त को अनिश्चतकाल के लिए स्थगित (adjourned sine die) कर दिया गया। sine die स्थगन का मतलब है कि सदन की बैठक खत्म कर दी गई। लेकिन दोबारा बैठक की कोई तारीख तय नहीं की गई। इसके विपरीत प्रोरोगेशन (prorogation) के जरिए संसद के पूरे सत्र को औपचारिक रूप से खत्म किया जाता है। 2023 का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चला था। इस दौरान सदन की 21 बैठकें हुई थीं और अगले दिन संसद का सत्र औपचारिक रूप से खत्म कर दिया गया था।

इस बार संसद लंबे समय से स्थगित है। मानसून सत्र के दौरान कई मुद्दों पर बार-बार हंगामा और गतिरोध देखने को मिला था। इनमें NEET पेपर लीक, अयोध्या राम मंदिर में कथित चोरी और युवाओं व Gen Z प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब देने की मांग जैसे मुद्दे शामिल थे।

इस बीच देश की राजनीति में भी कई अहम घटनाक्रम हुए। आम आदमी पार्टी (AAP) के कुछ राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुए विभाजन जैसे घटनाक्रम सामने आए।

संसद का सत्र अभी औपचारिक रूप से खत्म नहीं हुआ है। इसलिए अक्टूबर में सदन की दोबारा बैठक होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक चर्चा में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित संविधान संशोधन के लिए जरूरी संख्या को लेकर भी बात हो रही है। हालांकि सरकार की किसी योजना को लेकर किए जा रहे दावे फिलहाल अटकलों पर आधारित हैं और संसद की ओर से इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

एनडीए सरकार के कार्यकाल में इससे पहले भी संसद के सत्र के sine die स्थगन और उसके औपचारिक रूप से खत्म करने (प्रोरोग) के बीच लंबा अंतर रहा है। 12 अगस्त 2015 से 10 सितंबर 2015 के बीच 28 दिन और 11 अगस्त 2021 से 31 अगस्त 2021 के बीच 20 दिन का अंतर रहा था। इस बार की अवधि इन दोनों से ज्यादा है।

सदन स्थगित हुआ है, सत्र खत्म नहीं हुआ

एमएन कौल और एसएल शकधर की किताब Practice and Procedure of Parliament के मुताबिक, संसद के किसी सत्र के दौरान सदन को एक दिन, एक से ज्यादा दिन या अनिश्चितकाल के लिए (sine die) स्थगित किया जा सकता है।

सदन को स्थगित करने का मतलब है कि उसकी बैठक को किसी दूसरी तारीख तक टाल दिया गया है। जब सदन को sine die स्थगित किया जाता है तो अगली बैठक की कोई तारीख तय नहीं होती। इसका मतलब बैठक खत्म हो गई है लेकिन जरूरी नहीं कि संसद का पूरा सत्र भी खत्म हो गया हो।

प्रोरोगेशन (Prorogation) इससे अलग है। संविधान के अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति के आदेश से संसद के किसी सत्र को औपचारिक रूप से खत्म किया जाता है। आम तौर पर प्रोरोगेशन से पहले सदन को sine die स्थगित किया जाता है लेकिन कानूनी तौर पर दोनों अलग प्रक्रियाएं हैं।

राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर संसद का सत्र प्रोरोग करते हैं। तकनीकी रूप से प्रोरोगेशन सदन की बैठक चलने के दौरान भी हो सकता है। हालांकि आम तौर पर पहले सदन को sine die स्थगित किया जाता है और उसके बाद प्रोरोगेशन होता है।

लोकसभा अध्यक्ष के पास यह अधिकार है कि वह सदन को तय तारीख से पहले भी बुला सकते हैं। सदन के sine die स्थगित होने के बाद भी अध्यक्ष किसी भी समय लोकसभा की बैठक बुला सकते हैं। यानी sine die स्थगन का मतलब यह नहीं है कि सदन को दोबारा नहीं बुलाया जा सकता।

जब संसद लंबे समय तक स्थगित रही

लोकसभा के इतिहास में दो सबसे लंबे sine die स्थगन आठवीं लोकसभा के दौरान हुए थे।

सबसे लंबा स्तगन 76 दिन का था। यह 1987 में आठवीं लोकसभा के आठवें सत्र के दौरान हुआ था। उस समय बोफोर्स विवाद को लेकर संसद में लगातार हंगामा हो रहा था।

दूसरा सबसे लंबा स्थगन 61 दिन का था जो 1989 में इसी लोकसभा के 14वें सत्र के दौरान हुआ था।

1987 में बोफोर्स विवाद तब सामने आया था जब स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स एबी से 1986 में हॉवित्जर तोपों की खरीद के सौदे में कथित कमीशन और रिश्वत के आरोप लगे।

आठवां सत्र 23 फरवरी 1987 को शुरू हुआ था। बोफोर्स मुद्दे पर हंगामे के बीच 12 मई को सदन को sine die स्थगित कर दिया गया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने नियम 15 के प्रावधान के तहत सदन को दोबारा बुलाने के अधिकार का इस्तेमाल किया। लोकसभा की बैठक 27 जुलाई से 28 अगस्त तक हुई।

इस तरह बैठकों के बीच लंबे अंतर के बावजूद सत्र कई महीनों तक जारी रहा। 6 अगस्त को लोकसभा ने बोफोर्स सौदे की जांच के लिए 30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) बनाने का प्रस्ताव पास किया। राज्यसभा ने 12 अगस्त को इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया। समिति में लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य थे।

आखिरकार 3 सितंबर 1987 को लोकसभा को प्रोरोग कर दिया गया। इस तरह 76 दिन के अंतर के बाद यह सत्र औपचारिक रूप से खत्म हुआ।

1989 में 61 दिन का अंतर

दूसरा सबसे लंबा अंतर दो साल बाद आया। आठवीं लोकसभा का 14वां सत्र 18 जुलाई 1989 को शुरू हुआ और 18 अगस्त को sine die स्थगित कर दिया गया।

उस समय भी बोफोर्स को लेकर बड़ा राजनीतिक टकराव चल रहा था। इस सौदे पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट सदन में पेश होने के बाद करीब 100 विपक्षी सांसदों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया था।

लोकसभा अध्यक्ष ने फिर नियम 15 के प्रावधान के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और सदन को 11 से 16 अक्टूबर तक दोबारा बुलाया। इसके बाद 13 अक्टूबर को सदन को फिर sine die स्थगित किया गया और 20 अक्टूबर को प्रोरोग कर दिया गया। बैठकों के बीच कुल 61 दिन का अंतर रहा।

इसके कुछ ही हफ्तों बाद राजीव गांधी सरकार सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद बीजेपी के बाहरी समर्थन से वीपी सिंह के नेतृत्व वाली नेशनल फ्रंट सरकार सत्ता में आई।

1920 के दशक से चली आ रही प्रक्रिया

संसद को बुलाने, प्रोरोग करने और भंग करने से जुड़ी प्रक्रियाओं की जड़ें 1920 के दशक के आखिर में हुए बदलावों में मिलती हैं।

1929 से पहले केंद्रीय विधानमंडल को बुलाने, प्रोरोग करने और भंग करने से जुड़े गवर्नर-जनरल के आदेश भारत सरकार के विधायी विभाग के जरिए जारी और अधिसूचित किए जाते थे।

17 जून 1929 को गवर्नर-जनरल लॉर्ड इरविन की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इसमें विधानसभा अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल, गृह सदस्य और कानून सदस्य शामिल थे। बैठक में तय किया गया कि आगे से विधान सभा से जुड़े ऐसे आदेश विधानसभा विभाग के जरिए लिए और अधिसूचित किए जाएंगे।आजादी के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही।

1955 में संसदीय कार्य मंत्री ने प्रस्ताव दिया कि लोकसभा को बुलाने और प्रोरोग करने से जुड़े राष्ट्रपति के आदेश संसदीय कार्य मंत्रालय के आदेश पर लिए और अधिसूचित किए जाएं। 1958 में गृह मंत्री की ओर से भी ऐसा ही प्रस्ताव दिया गया। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने दोनों प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए।

संसदीय रिकॉर्ड में इसका कारण यह बताया गया कि राष्ट्रपति राज्य के प्रमुख होने के साथ-साथ संसद के एक संवैधानिक अंग भी हैं। अध्यक्ष का मानना था कि लोकसभा को बुलाने, प्रोरोग करने और सामान्य तौर पर भंग करने से जुड़े मामले व्यापक संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसलिए अध्यक्ष को सरकार से सलाह लेकर सदन की तारीख तय करनी चाहिए और इसकी जानकारी राष्ट्रपति को देनी चाहिए।

इसके पीछे एक संवैधानिक चिंता भी थी। अगर सदन की बैठकों से जुड़े सभी अधिकार पूरी तरह सरकार के हाथ में हों तो इसका असर विपक्ष या अल्पसंख्यक समूहों पर पड़ सकता है।

इसीलिए यह तर्क दिया गया कि सदन की बैठकें तय करना, उन्हें स्थगित करना, sine die स्थगन के बाद दोबारा बैठक बुलाना और नई बैठक की शुरुआत की तारीख तय करना आपस में जुड़े हुए अधिकार हैं। इन प्रक्रियाओं में लोकसभा अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।