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“मोदी शासन के 1,460 दिन पूरे, अच्छे दिन अभी तक नहीं आए”

देश के लोगों के लिए 'अच्छे दिन' जिसका मोदी ने अपने भाषणों में वादा किया था, वे चार सालों में पूरे नहीं हुए, बल्कि भाजपा के 'बेस्ट सेल्समैन' ने लोगों को जरूरत से ज्यादा ही उम्मीदें बेच दीं।

Author Published on: May 24, 2018 8:33 PM
संपन्नता-समृद्धि की बातें छोड़ कर वही गरीबी-गरीबों की बातें करने लगे, जो हम सत्तर वर्षों से कांग्रेस के समाजवादी प्रधानमंत्रियों से सुनते आ रहे हैं

अपराजिता गुप्ता

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के पास 2019 की परीक्षा से पहले सिर्फ एक साल बचा है। क्या देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ के वादे के थोड़ा-बहुत भी करीब पहुंच पाया है? अर्थशास्त्रियों और अन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, चार साल पहले देश के नागरिकों ने सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सभी क्षेत्रों में बेहतर दिन आने की उम्मीदों के साथ भाजपा को अपना वोट दिया था, लेकिन जीएसटी और नोटबंदी जैसे कुछ मजबूत संरचनात्मक सुधारों के दावों के बावजूद जनता को यह पता नहीं चल पाया है कि ये सुधार उनके लिए किस तरह अच्छे रहे हैं।

वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में भारत की सकल घरेलू उत्पाद में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कालेधन को खत्म करने के दावे वाले नोटबंदी के कदम ने अंत में देश की अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुंचाया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर जयति घोष ने कहा, “नोटबंदी सरकार की एक भयानक गलती थी, जिसकी भरपाई आम इंसान ने की। इसने बैंकिंग प्रणाली में लोगों के विश्वास को कम कर दिया, क्योंकि नकदी संकट के समय उन्हें अपने पैसों से ही दूर कर दिया गया था। संस्थानों और नीतियों के निर्माण में समय और मेहनत लगती है, लेकिन उन्हें बर्बाद आसानी से किया जा सकता है।”

मोदी सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को 1,000 रुपये और 500 रुपये के नोटों पर अचानक प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे कुल मुद्रा का 86 प्रतिशत चलन से दूर हो गया था। बैंक तीन दिन बंद और सभी एटीएम खाली। उसके बाद बैंकों के आगे लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं, बेटी की शादी के लिए पैसे जुटाना पिताओं के भारी मुसीबत बन गई। कतारों में घंटों खड़े-खड़े लगभग सवा सौ बुजुर्गो और महिलाओं ने दम तोड़ दिया। इन मौतों पर प्रधानमंत्री के मुंह से संवेदना का एक शब्द नहीं निकला। वह हालात सामान्य होने के लिए 30 दिन मांगे, फिर भी हालत जस के तस रहे। लगातार तीन महीने देश के लोगों ने कष्ट झेला। अपने ही पैसे के लिए उनकी नींद हराम हो गई। सोने के बजाय पैसे वाले एटीएम तलाशने और मिलने पर घंटों कतार में खड़े-खड़े रातें गुजारीं। देश में अचानक लगे इस ‘आर्थिक आपातकाल’ को कोई कैसे भूल सकता है भला!

जयति ने आगे कहा, “ऐसा हो सकता है कि इस कदम से सरकार का राजनीतिक उद्देश्य सिद्ध हुआ हो, लेकिन आर्थिक रूप से यह बहुत बुरा था।” जयति घोष के विचारों पर सहमति जताते हुए जेएनयू में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने आईएएनएस से कहा, “जब भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार आई तो भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही ऊपर की ओर बढ़ रही थी। जिस तिमाही में मोदी सरकार ने सत्ता संभाली, विकास दर आठ प्रतिशत तक बढ़ गई थी। अक्टूबर 2016 में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था थी, जबकि चीन थोड़ा धीमा हो गया था।

उन्होंने कहा, “लेकिन फिर सरकार द्वारा लागू नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा। असंगठित क्षेत्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा, जो देश में 45 प्रतिशत उत्पादन और 93 प्रतिशत रोजगार पैदा करता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, यह 50-80 प्रतिशत क्षतिग्रस्त हो गया।” कुमार, जो अब इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के चेयर-प्रोफेसर हैं, ने बताया, “उस समय सरकार ने कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया था और इसलिए कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करने वाले अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी इसके प्रभाव पर कोई अनुमान पेश नहीं किया।” उन्होंने कहा, “नोटबंदी के बाद लोगों द्वारा बैंक से लोन लेना भी कम हो गया। नवंबर-दिसंबर 2016 के बीच, यह गिरावट 60 साल के ऐतिहासिक स्तर पर थी। देश में निवेश को भी झटका लगा।”

वहीं, प्रोफेशनल सर्विसेज के लिए दुनिया की अग्रणी कंपनियों में शुमार प्राइसवाटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) में पार्टनर एंड लीडर, पब्लिक फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स, रैनन बनर्जी की हालांकि अलग राय है। वह कहते हैं, “डिजिटल भुगतान के संबंध में नोटबंदी का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यह उस अवधि के दौरान तेजी से फलीफूली, लेकिन बाद में उसने अपनी तेजी खो दी। लेकिन डिजिटल लेनदेन का स्तर अभी भी पहले से बढ़ा है। नोटबंदी ने हालांकि वैसे परिणाम नहीं दिए, जिसकी उससे उम्मीद की गई थी।” बनर्जी ने कहा कि सरकार का दूसरा धमाका वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) था, जिसे पिछले साल एक जुलाई से लागू किया गया। अर्थशास्त्री उम्मीद कर रहे हैं कि एक बार इसकी जटिलताएं खत्म हो गईं तो यह फायदेमंद बदलाव लाएगा। जीएसटी एक गुणात्मक प्रभाव बनाकर देश की कर प्रणाली के पूरे परि²श्य को बदल देगा। उन्होंने कहा, “जीएसटी एक साहसिक कदम था जो सकारात्मक परिणाम दिखा रहा है।”

जयति घोष हालांकि मानती हैं कि संघीय संरचना में एक एकीकृत प्रणाली इतनी जरूरी नहीं है, उदाहरण के लिए अमेरिका में यह नहीं है, लेकिन बावजूद इसके वह एक बहुत ही आधुनिक अर्थव्यवस्था है। लेकिन जीएसटी का कार्यान्वयन वास्तव में बुरा रहा है। वहीं कुमार ने कहा, “जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। मलेशिया में भी जहां जीएसटी 2015-16 में 26 प्रतिशत पर पेश किया गया था, सरकार ने इसे रद्द करने का फैसला किया। संगठित क्षेत्र के बढ़ने की कीमत असंगठित क्षेत्र भर रहा है और असमानता बढ़ रही है।” वहीं, उद्योगों ने सरकारी पहल खासकर जीएसटी का स्वागत किया है।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने बताया, “समग्र अर्थव्यवस्था जीएसटी के साथ मजबूत हो गई है और सही रास्ते पर मजबूती से सुधार कर रही है।” चंद्रजीत बनर्जी के अनुसार, सरकार ने व्यवस्थित रूप से अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख बिंदुओं, जैसे व्यापार में आसानी, बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियां, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नियम, आधारभूत संरचना निर्माण और असफल उद्यमों को बंद करने पर काम किया था। उन्होंने कहा, “सरकार के विकास अभियानों ने समग्र विकास गुणकों को जोड़कर उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि अगले वर्ष ऑर्डर की संख्या और कंपनियां की क्षमता का उपयोग बेहतर होगा।”

भारतीय सांख्यिकी संस्थान के पूर्व अर्थशास्त्र के प्रोफेसर दीपांकर दासगुप्ता मानते हैं कि अर्थव्यवस्था ने नोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई को अभी तक हासिल नहीं किया है। जीएसटी से उम्मीद है कि वह समय के साथ स्थिर हो जाएगी। उन्होंने कहा, “अन्य देशों, जहां इसे पेश किया गया था, वहां भी शुरुआत में समस्याएं आई थीं।” सरकार ने बैंकों की ऋण प्रणाली को दुरुस्त करने का भी काम किया है। लेकिन नोटबंदी के सदमे के बाद कई बैंकिंग घोटालों और बढ़ती गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) के कारण लोगों का बैंकों पर भरोसा कम हो गया है। उन्होंने कहा, “सावधानी के साथ पुनर्पूंजीकरण पर काम किया जाना चाहिए, ताकि राजकोषीय घाटा बढ़ न पाए।”

देश के लोगों के लिए ‘अच्छे दिन’ जिसका मोदी ने अपने भाषणों में वादा किया था, वे चार सालों में पूरे नहीं हुए, बल्कि भाजपा के ‘बेस्ट सेल्समैन’ ने लोगों को जरूरत से ज्यादा ही उम्मीदें बेच दीं। दासगुप्ता ने एक अलग अंदाज में कहा, “मैं इस सरकार को दोष नहीं देता कि वह अच्छे दिन लाने में सक्षम नहीं है, क्योंकि आजादी के बाद कोई सरकार अच्छे दिन नहीं लाई है।”

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