सस्पेंस खत्म हो गया है। घोषणा हो चुकी है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सप्ताहांत यानी 12-13 सितंबर को भारत आएंगे। वह नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। चीन के विदेश मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए इसकी आधिकारिक घोषणा की है।

बीजिंग ने कहा, “भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12-13 सितंबर तक नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे।”

पीछे मुड़कर देखें तो, हां। हमें (शायद) पता था कि शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं। सूत्रों ने आज द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि बीजिंग की सुरक्षा टीमें पहले ही मध्य दिल्ली के उस होटल में तैनात हो चुकी थीं, जहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ठहरने की संभावना थी। वहीं, भारत की ओर से उनकी सुरक्षा व्यवस्था के समन्वय की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सौंपी गई थी।

शी जिनपिंग अपने रूसी और ईरानी समकक्षों व्लादिमीर पुतिन और मसूद पेजेश्कियन के साथ 48 घंटों की व्यस्त बैठकों, गुप्त मुलाकातों और व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था से लेकर पश्चिम एशिया और यूक्रेन में चल रहे युद्धों तक के मुद्दों पर चर्चा में शामिल होंगे। पुतिन और पेज़ेश्कियन के साथ मोदी की बैठकों पर कड़ी नजर रहेगी। जिनसे वे पिछले पखवाड़े में पहले ही बात कर चुके हैं। साथ ही शी जिनपिंग के साथ पीएम मोदी की मुलाकात भी रोमांचक होगी, जो सात साल में पहली बार भारत की यात्रा पर हैं।

शी जिनपिंग अंतिम बार कब भारत आए

आइए अक्टूबर 2019 में तमिलनाडु में आयोजित दो दिवसीय ‘शिखर सम्मेलन’ पर चलते हैं।

शी जिनपिंग मामल्लापुरम (या महाबलीपुरम) में थे, जो चेन्नई से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित एक मंदिर नगर है। यहां 7वीं और 8वीं शताब्दी के चट्टानों को काटकर बनाए गए मंदिर और नक्काशी हैं, जिन्हें यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है ।

स्थान का चयन सोच-समझकर किया गया था। यह दिल्ली के औपचारिक परिवेश से दूर था और इसे इस तरह से तैयार किया गया था कि इसमें एक गर्मजोशी और एक अनूठा सांस्कृतिक स्पर्श झलके। यह व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने का एक सौम्य प्रयास भी था, जिसके परिणामस्वरूप बाद में जबरदस्त वृद्धि हुई। कुछ अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025/26 में भारत-चीन द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 150 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया।

इस बैठक का समय भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह भारतीय सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने के कुछ सप्ताह बाद हुई थी। चीन ने इस कदम की कड़ी आलोचना की थी। जून 2020 में लद्दाख में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई झड़प के कारण आने वाले महीनों में दिल्ली और बीजिंग के बीच तनाव नाटकीय रूप से बढ़ जाएगा, लेकिन यह एक अनिश्चित कारक था।

शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान क्या हुआ?

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं शी जिनपिंग का स्वागत किया। पीएम मोदी सफेद कमीज और उससे मेल खाती धोती पहने हुए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी नेता को मामल्लापुरम में मंदिर और अन्य स्मारकों का भ्रमण कराया। इसके बाद एक पारंपरिक नृत्य देखा। इसके बाद रसम और ‘मीन वरुवल’ जैसे तमिल व्यंजनों से भरपूर रात्रिभोज का आयोजन किया गया, जिसमें मछली के टुकड़ों को मसालों में मैरीनेट करके पैन में तला जाता है।

मंदिर भ्रमण और तली हुई मछली के बीच मोदी और शी ने भारत-चीन संबंधों के नए अध्याय पर चर्चा करने के लिए छह घंटे तक लगातार बैठक की। इसमें व्यापार और निवेश पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया। उस समय भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 11 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर 112 अरब डॉलर के बेहद बड़े स्तर पर पहुंच चुका है।

तत्कालीन विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया था कि दोनों नेताओं ने व्यापार और निवेश पर चर्चा की। बैठक में यह तय हुआ कि भारत और चीन के बीच व्यापार और निवेश को आगे बढ़ाने के लिए एक नई व्यवस्था बनाई जाएगी।

दोनों देशों ने आतंकवाद से मिलकर लड़ने के तरीके पर भी चर्चा की। हालांकि, इस बैठक के दौरान कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ और न ही किसी बड़ी डील की घोषणा की गई। यानी 2019 की मुलाकात में बातचीत और भविष्य की योजना पर जोर रहा, लेकिन कोई ठोस बड़ा समझौता सामने नहीं आया।

हालांकि, यह सोच-समझकर किया गया था। इसका उद्देश्य ठोस परिणाम देने के बजाय नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध बनाना था, और दोनों पक्षों ने सहमति व्यक्त की कि बैठक ‘स्पष्ट और रचनात्मक’ थी।

जून 2020, गलवान घाटी में झड़प

दशकों में दोनों देशों के बीच हुई पहली बड़े पैमाने की सैन्य कार्रवाई में 20 भारतीय सैनिक और अज्ञात संख्या में चीनी सैनिक मारे गए। हिंसा के अलावा भी इसके दूरगामी परिणाम हुए।

इस घटना के बाद राजनयिक संबंध ठप्प पड़ गए और दिल्ली और बीजिंग ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैनिकों की तैनाती शुरू कर दी, जो दोनों देशों के बीच वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा का काम करती है। पहला बड़ा सकारात्मक कदम उठाने में आठ महीने से अधिक का समय लगा। फरवरी 2021 में एलएसी से टैंक पीछे हटने लगे और अस्थायी सैन्य चौकियों को ध्वस्त कर दिया गया। हालांकि छिटपुट झड़पें जारी रहीं, जिनमें नवंबर 2020 में भारत द्वारा लगभग चार दर्जन चीनी मोबाइल फोन ऐप पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल है। इस जानकारी के आधार पर कि वे भारत की अखंडता और रक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल थे।

हालांकि, तब से संबंध बेहतर हुए हैं, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत और चीन दोनों को निशाना बनाकर की गई टैरिफ संबंधी आक्रामक नीति के बाद, जिसने उच्च स्तरीय दौरों के आदान-प्रदान और संबंधों में धीरे-धीरे सुधार को प्रेरित किया। और ऐसा भी हो सकता है कि 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इस गतिशीलता को उसी तरह बढ़ावा मिले जैसा कि 2024 में हुआ था, जब लद्दाख संघर्ष से ‘सैनिकों की वापसी और मुद्दों के समाधान’ के कुछ दिनों बाद मोदी और शी की मुलाकात हुई थी।

अब आगे क्या?

शी जिनपिंग की इस सप्ताहांत होने वाली भारत यात्रा का भारत-चीन संबंधों पर बड़ा असर देखने को मिल सकता। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि दोनों देशों के बीच रिश्तों में आई नरमी आगे जारी रहेगी या नहीं। साथ ही, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर दोनों देश किस तरह साथ काम कर सकते हैं, यह भी महत्वपूर्ण होगा। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया में सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कतें बढ़ रही हैं।

शी जिनपिंग अकेले भारत नहीं आ रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन भी शामिल होंगे। इससे भारत के सामने कई तरह की कूटनीतिक चुनौतियां होंगी। खासकर यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-ईरान तनाव के बीच भारत को संतुलन बनाना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुतिन और पेजेश्कियन के साथ होने वाली बैठक पर भी उतनी ही नजर रहेगी, जितनी शी जिनपिंग के साथ उनकी मुलाकात पर।

मुख्य बात यह है कि 2019 में मोदी और शी की मुलाकात का मकसद दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत भरोसा और बेहतर संबंध बनाना था, लेकिन तब कोई बड़ी औपचारिक डील नहीं हुई थी। कुछ ही महीनों बाद सीमा पर हुई हिंसक झड़प से दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए।

अब इस सप्ताहांत की मुलाकात यह परखेगी कि मोदी और शी इस बार रिश्तों को बेहतर तरीके से संभाल पाते हैं या नहीं। इस बार हालात ज्यादा मुश्किल हैं। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़ चुका है, सीमा विवाद अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है और यूक्रेन तथा पश्चिम एशिया के युद्धों के साथ-साथ ट्रंप के टैरिफ ने वैश्विक स्थिति को और जटिल बना दिया है। यानी दोनों देशों के बीच भरोसा पूरी तरह न होने के बावजूद मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां भारत और चीन को एक-दूसरे के करीब आने के लिए मजबूर कर रही हैं।

मोदी-जिनपिंग की मुलाकात सिर्फ भारत और ब्रिक्स के लिए ही नहीं, अमेरिका के लिए भी क्यों है अहम?

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को हो रहे 18 वें ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शनिवार को भारत आ रहे हैं। जिनपिंग लगभग सात साल बाद भारत आ रहे हैं। उनका यह दौरा न केवल ब्रिक्स और भारत-चीन संबंधों के लिए अहम है, बल्कि अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। पढ़ें पूरी खबर।