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संसदीय बोर्ड में रहकर भी अपनी सीट बचा न सके शाहनवाज, हारे घोड़े पर भाजपा ने क्यों लगाया दांव?

शाहनवाज हुसैन के सितारे तभी गर्दिश में आ गए थे, जब मोदी लहर के बावजूद 2014 का चुनाव वो भागलपुर से हार गए थे।

शाहनवाज हुसैन 2014 की मोदी लहर में भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। (file pic)

शनिवार (23 मार्च) को एनडीए की जारी सूची से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन का नाम गायब देख भाजपा के एक धड़े में और इनके चाहने वालों में भारी मायूसी है। शाहनवाज और उनके समर्थकों को एक हफ्ते में दूसरी बार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से धक्का लगा है। पहला तो भागलपुर संसदीय सीट जदयू की झोली में जाने की वजह से। फिर दूसरा धक्का शाहनवाज हुसैन को कहीं से भी टिकट नहीं मिलने से। इससे संदेश साफ तौर पर गया है कि पार्टी ने शाहनवाज के पर कतर दिए हैं। वैसे भी 2014 के बाद से भाजपा में कई बदलाव देखने को मिले हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने सत्ता हासिल करने के बाद 1990 के दशक के लोगों और उनके समर्थकों का पार्टी में कद कम करने की कोशिश की। 2019 के टिकट बंटवारे में यह जगजाहिर हो गया। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्रा का टिकट काट दिया। कलराज से तो फिर भी कहलवा दिया कि चुनाव नहीं लड़ेंगे। मगर आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को तो इस लायक भी नहीं समझा गया। एक समय था, जब भाजपा के लोग नारा लगाते थे और गांव से लेकर शहर की दीवारों पर लिखा होता था “अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर, भाजपा के ये तीन धरोहर।”

शाहनवाज हुसैन इसी धरोहर की उपज माने जाते हैं। उन्हें टिकट नहीं मिलने से भागलपुर के लोग अंदर से दुखी हैं। दरअसल, भाजपा भागलपुर से अबतक हुए सभी चुनाव लड़ी है। चाहे पुरानी दीपक छाप वाली जनसंघ हो या कमल निशान वाली भाजपा। हार-जीत अपनी जगह है। चुनावी रण में ताल ठोंकने में यह पार्टी कभी पीछे नहीं रही। भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता और पूर्व अध्यक्ष अभय वर्मन कहते है सीट बंटवारे में जदयू के पास जाने से तकलीफ तो है। मगर गठबंधन धर्म निभाना है। कर्ण की भूमि है। पार्टी का निर्देश पालन करना है। मगर शाहनवाज हुसैन के समर्थक प्रमोद वर्मा कहते है कि सीमांचल, कोशी और भागलपुर, बांका की सात सीटें भाजपा ने जदयू को दी। एक सीट अररिया अपने खाते में रखी। उम्मीद थी कि शाहनवाज हुसैन को वहां से टिकट मिलेगा लेकिन सारा जोश ठंडा हो गया। ताजुब्ब है संसदीय बोर्ड में होते हुए वे अपने लिए टिकट का जुगाड़ नहीं कर सके। जबकि उन्होंने खुद इस संवाददाता से भागलपुर दौरे के क्रम में बड़े फक्र से कहा था कि आपको पता होना चाहिए कि मैं केंद्रीय संसदीय बोर्ड का एक सदस्य हूं। टिकट न मिलने में संशय कहां है?

अररिया संसदीय सीट से भाजपा ने प्रदीप सिंह को उम्मीदवार बनाया है जबकि ये 2014 और फिर 2018 का उपचुनाव हार चुके हैं। लगता है मुस्लिम के खिलाफ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति के तहत हारे घोड़े पर भाजपा ने बाजी लगाई है। शाहनवाज हुसैन ने जनसत्ता.कॉम से कहा कि 2014 का चुनाव हारने के बाद भी दिलोजान से भागलपुर की जनता की सेवा कर रहा हूं। हाल में बीती 3 मार्च को पटना में हुई रैली में भी भागलपुर से हजारों कार्यकर्ता ले जाने में पूरी मेहनत की थी लेकिन सब पानी हो गया। इस दफा टिकट न मिलने से समर्थकों का कयास है कि अब इनके राजनैतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा है। शाहनावाज हुसैन ने खुद भी ट्वीट कर लिखा है कि मेरी सीट जदयू ने ले ली।

दरअसल, शाहनवाज हुसैन के सितारे तभी गर्दिश में आ गए थे, जब मोदी लहर के बावजूद 2014 का चुनाव वो भागलपुर से हार गए थे। हालांकि, 1999 में किशनगंज से चुनाव जीतकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। किशनगंज से 2004 का चुनाव हारने के बाद साल 2006 में भागलपुर संसदीय सीट पर उप चुनाव ने फिर से इनका भाग्य का दरवाजा खोला और जीते। 2014 तक भागलपुर के सांसद रहे। यह सीट सुशील कुमार मोदी के इस्तीफे से खाली हुई थी। तब सुशील मोदी बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी एनडीए की पहली सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाए गए थे। 2014 में नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लहर के बावजूद शाहनवाज हुसैन को भागलपुर से पराजय का मुंह देखना पड़ा। तब से ये असहज हैं। भले ही केंद्रीय नेतृत्व इन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता और केंद्रीय चुनाव समिति का सदस्य बनाए हुए है मगर 2014 की हार से ही शाहनवाज चिंतित नजर आ रहे थे। अब टिकट न मिलने से अपने राजनैतिक भविष्य की ही चिंता खड़ी हो गई है।

पार्टी की अंदरूनी बातों के जानकार इनके टिकट कटने की कई वजहें गिनाते है। भागलपुर में इनकी वजह से शाहनवाज और अश्विनी चौबे गुट उभरा। दोनों के बीच छतीस का आंकड़ा सर्वविदित है। बीते चुनाव में अश्विनी चौबे को बक्सर भेजकर और इन्हें भागलपुर से टिकट देकर भाजपा ने गुटबाजी खत्म करने की कोशिश की। बक्सर से चौबे तो जीत गए। मगर शाहनवाज शिकस्त खा गए। इतना ही नहीं 2015 के विधानसभा चुनाव में भागलपुर डिवीजन की बारह विधानसभा सीटों में से एक पर भी भाजपा का कमल नहीं खिला। गुटबाजी ने अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित चौबे को भागलपुर सीट पर डंस लिया। बागी बन विजय साह को खड़ा करवा सारा खेल बिगाड़ दिया। कहा जाता है कि शाहनवाज ने अपनी हार का बदला चौबे के बेटे को हराकर ले लिया।

ये नीतीश कुमार के निशाने पर तब आए जब शाहनवाज को सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग की। इस बात को माना गया कि इन्होंने ही ऐसा करवाया। सृजन घोटाले के आरोपियों से कथित मधुर संबंध भी शाहनवाज के खिलाफ गया बताते हैं। सैकड़ों करोड़ रुपए के सृजन घपले से सत्ता से जुड़े लोगों और बिहार सरकार की साख पर भारी बट्टा लगा। सोच यह भी रही कि टिकट इनको भाजपा देती है तो चुनाव में सृजन का भूत निकलेगा। इससे सुशील मोदी का भी नाम उछलेगा। इनकी बहन भी आरोपों के घेरे में है। हालांकि इन्होंने हमेशा इंकार किया कि बहन से मेरा कोई लेना देना नहीं है। सृजन की बात आती तो नीतीश कुमार पर भी छीटें उछाले जाते। मसलन बहुत मंथन के बाद यह तय हुआ कि सीट जदयू के खाते में डाल दी जाए।

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