ताज़ा खबर
 

2015: वोटरों ने बीजेपी को दिया साफ मैसेज, लेकिन क्‍या पार्टी सुन रही है

साल खत्‍म होने वाला है। ऐसे में इस पूरे साल विभिन्‍न स्‍तरों पर हुए चुनाव और उनमें बीजेपी के प्रदर्शन का आकलन करने का मुनासिब वक्‍त है। 2014 में पार्टी को एकतरफा जीत मिली, जिसका श्रेय बेहतर ढंग से चलाए गए चुनावी कैंपेन को दिया जा सकता है..

अमित शाह, भाजपा, Amit Shah News, BJP leatest news, Hindi news, latest news in Hindi, Narendra Modi, Kolkata, BJP National Executive meeting, Lal Krishna Adwani, Yashwant Sinhaभाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा समर्थन हासिल है।

साल खत्‍म होने वाला है। ऐसे में इस पूरे साल विभिन्‍न स्‍तरों पर हुए चुनाव और उनमें बीजेपी के प्रदर्शन का आकलन करने का मुनासिब वक्‍त है। 2014 में पार्टी को एकतरफा जीत मिली, जिसका श्रेय बेहतर ढंग से चलाए गए चुनावी कैंपेन को दिया जा सकता है। दिल्‍ली और बिहार में हुए विधानसभा चुनाव, राजस्‍थान और यूपी में हुए स्‍थानीय चुनाव, मध्‍य प्रदेश में हुआ लोकसभा का उप चुनाव और हाल ही में गुजरात में हुए निकाय चुनाव में सत्‍ताधारी पार्टी को बुरे नतीजों का सामना करना पड़ा। गौर करने लायक बात यह है कि ये वही राज्‍य हैं, जहां बीजेपी ने आम चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था। बीजेपी को मिली कुल सीटों में 26 फीसदी भागेदारी यूपी की है जबकि 11 पर्सेंट सीटें बिहार से मिलीं। वहीं, गुजरात और राजस्‍थान में तो बीजेपी ने विपक्षी कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर दिया।

केंद्र सरकार के लिए यह कहना बेहद आसान है कि इनमें से अधिकतर चुनाव ‘स्‍थानीय’ थे। वे यही कहेंगे कि इनके नतीजों को केंद्र सरकार के घटते प्रभाव के प्रतिबिंब के तौर पर न देखा जाए। हालांकि, बीजेपी के लिए तो यह चिंता की बात जरूर है कि लोकसभा चुनाव में स्‍पष्‍ट बहुमत हासिल करने के बाद उसे इतनी जल्‍दी जल्‍दी झटके क्‍यों लग रहे हैं। इनके नतीजे बीजेपी के ‘कांग्रेस मुक्‍त भारत’ के वादे के खिलाफ जाते दिखते हैं।

2015 के नतीजों को लेकर कुछ बिंदुओं पर नजर डालते हैं:

पहली, बीजेपी आलाकमान की ओर से इन चुनावों के लिए जो मशीनरी धरातल पर उतारी गई, वो पूरी तरह से केंद्रीकृत था। आलाकमान की सीधी नजर तो इस पर थी ही, साथ में इस पर पीएम नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह के स्‍टाइल की पूरी छाप थी। इसी के बलबूते 2014 के आखिर तक शानदार जीत मिली। बीजेपी का चुनाव जीतने का एक ऐसा मैकेनिज्‍म सामने आया, जिसमें भारी पैमाने पर तकनीक का इस्‍तेमाल, आरएसएस के कार्यकर्ता, बार बार दो तिहाई बहुमत पाने के दावे, विपक्ष को पूरी तरह खारिज करने की रणनीति के अलावा भारी पैमाने पर संसाधनों का इस्‍तेमाल आदि शामिल था। हालांकि, बीजेपी का यह पूरा सिस्‍टम 2015 के किसी भी चुनाव में काम करता नजर नहीं आया।

दूसरी बात। ऐसी कोशिशें की गईं, मानों शासन और संसद चलाने की जिम्‍मेदारी विपक्ष की है।

तीसरी बात। दादरी में हुई घटना के अलावा गोवध विरोधी अभियान जनता के मूड से ठीक उलट निकलीं। सत्‍ताधारी पार्टी के सदस्‍यों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों की ओर से खुद को ‘हिंदू राष्‍ट्रवादी’ के तौर पर प्रोजेक्‍ट करने के लिए विवादास्‍पद बयान देने की घटनाओं ने समाज के एक बड़े हिस्‍से की चिंताएं बढ़ा दीं।

‘हिंदू प्‍लस विकास’ का मैसेज लोकसभा चुनावों में हिंदी भाषी इलाकों में कामयाब रहा। हालांकि, उग्र हिंदुत्‍व की वजह से पैदा हुई सांप्रदायिक अस्‍थ‍िरता ने विदेशी निवेशकों के एक बड़े धड़े और रेटिंग एजेंट की चिंताएं बढ़ा दीं। उन वोटरों की भी, जिन्‍होंने यह सोचा था कि उन्‍होंने विकास के लिए वोट डाला है, आरएसएस के लिए नहीं।

हालांकि, इन सभी चुनाव नतीजों खासकर कि गुजरात निकाय चुनाव से जो बड़ा संदेश मिला वो ये कि महंगाई, किसानों की मुश्‍क‍िलें, नौकरी जैसे जमीनी मुद्दों की वजह से वोटर सरकार से नाराज हैं। बीजेपी ने गुजरात के शहरी इलाकों में अच्‍छा प्रदर्शन किया। यहां वोटरों की तादाद 96 लाख जबकि वोटिंग पर्सेंटेज 47 फीसदी है। राज्‍य के ग्रामीण और कस्‍बाई इलाकों में जहां वोटरों की तादाद कहीं ज्‍यादा (2 करोड़ से अधिक) है, वहां वोटिंग पर्सेंटेज 67 फीसदी रहा और इन लोगों बीजेपी को नकार दिया। खाने पीने की चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि इसे पैदा करने वाले किसान अभी भी दिक्‍कत में हैं। खाने पीने की चीजों की बढ़ती महंगाई से उसे कोई लाभ नहीं हो रहा।

मौसम के खराब हाल और केंद्र सरकार की ओर से समुचित कदम न उठाने की वजह से देश के कुल 640 में से 302 जिलों में सूखे जैसे हालात हैं। इंडिया स्‍पेंड की एक रिपोर्ट ऐसा कहती है। इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण बिल में बीजेपी की ओर से किए गए बदलाव और बाद में विपक्ष के विरोध के बाद कदम पीछे खींचने से यही मैसेज गया कि सरकार को ग्रामीण भारत के जमीनी हकीकत के बारे में कोई अंदाजा नहीं है। निजी उद्योगों को बढ़ावा देना और उनके बल पर नौकरी और संपन्‍नता देने के वादे से जुड़ा जादुई ‘गुजरात मॉडल’ लड़खड़ाता नजर आ रहा है। इस साल हुए पटेल आंदोलन की वजह से बीजेपी ने बिहार चुनाव प्रचार के दौरान ही गुजरात मॉडल को बेचना बंद कर दिया। राजद्रोह के आरोप में जेल में बंद हार्दिक पटेल ने धमकी दी थी कि वे बिहार और झारखंड जाकर गुजरात के आर्थिक हालात से जुड़े स्‍याह पक्ष लोगों के सामने रखेंगे। इसके बाद, आरक्षण की नीतियों को लेकर कुछ बातें हुईं।

2015 एक ऐसा साल है जो सभी पक्षों को इन चुनावी नतीजों पर गौर करने और आने वाले साल के लिए तैयारी करने का मौका देता है। 2016 भी कम रोमांचक नहीं होगा।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 ‘उपराज्यपाल जी, केजरीवाल कर रहे हैं संविधान के खिलाफ काम’
2 दिल्ली ऐसी प्रदूषित कि सांस लेना दूभर
3 वीके सिंह का संसद में बहिष्कार करेगी कांग्रेस
ये पढ़ा क्या?
X