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चार साल में खो गए 2014 के ये जुमले, अब 2019 का इंतजार

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने खुद इन्हें जुमला कहा था यानी ऐसे लोक लुभावन वादे जो सिर्फ चुनाव जीतने के लिए गढ़े जाते हैं।

चार साल पहले केंद्र की सत्ता में आने से पहले नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने चुनावी अभियानों के तहत कई वादे किए जिसका जादू कुछ वक्त तक लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलता रहा।

राजनीति में चार साल लंबा वक्त तो होता है पर इतना भी लंबा नहीं कि किसी सरकार के कार्यकाल में उसी के चुनावी वादों को भुला दिया जाय लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। चार साल पहले केंद्र की सत्ता में आने से पहले नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने चुनावी अभियानों के तहत कई वादे किए जिसका जादू कुछ वक्त तक लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलता रहा। मसलन, विकास, 15 लाख, अच्छे दिन, कालाधन और करप्शन। ये ऐसे मुद्दे हैं जो उस वक्त पक्ष-विपक्ष सभी की जुबां पर चढ़ गया था। हालांकि, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने खुद इन्हें जुमला कहा था यानी ऐसे लोक लुभावन वादे जो सिर्फ चुनाव जीतने के लिए गढ़े जाते हैं। एक नजर बीजेपी के उन वादों पर जो बन गए राजनीतिक जुमले:

हरेक के खाते में 15 लाख: 2015 के शुरुआत में बीजेपी अध्यक्ष ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि कालाधन वापस लाने के बाद हरेक भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपये जमा कराने की बात एक जुमला था। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में कहा था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो विदेशों से कालाधन वापस लाया जाएगा और हरेक के खाते में 15-15 लाख रुपये जमा होंगे। सरकार के सालभर भी नहीं हुए थे कि पार्टी अध्यक्ष ने उन वादों और दावों की हकीकत खोल दी थी।

विकास: जब नरेंद्र मोदी पीएम बने तो ऐसा प्रचारित किया गया कि देश में विकास की गंगा बहेगी लेकिन यह जुमला भी बहुत जल्दी लोगों की जुबान से उतर गया। मोदी ने लगभग सभी चुनावी रैलियों में लोगों से पूछा था कि ‘विकास चाहिए कि नहीं चाहिए।’ पिछले साल गुजरात चुनाव के समय कांग्रेस ने जवाबी हमला करते हुए ‘विकास पागल हो गया’ का अभियान चलाया।

अच्छे दिन आने वाले हैं: 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में इस जुमले के पक्ष में हवा बन गई। हर आम-ओ-खास की जुबां पर यह जुमला चढ़ बैठा। बच्चे-बूढ़े सभी गाने लगे- “मोदी जी आनेवाले हैं, अच्छे दिन लाने वाले हैं।” मोदी सरकार के बनते ही सालभर में ये वादा जब जुमला साबित हुआ तो लोगों की जुबां पर से उतर गया।

कालाधन और करप्शन: सरकार बनते ही 100 दिनों के अंदर विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाएंगे और भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों को जेल भेजेंगे। कुछ ऐसा ही जुमला 2014 के चुनावों से पहले और कुछ दिनों बाद तक लोगों की जेहन में गूंजता रहा था। अमित शाह ने कहा था कि पांच साल में कालाधन वापस नहीं लाया जा सकता है। यह जुमला था।

नए जुमलों का इंतजार: अब 2019 के चुनाव के लिए सियासी रणभूमि सजने लगी है। राजनीतिक दलों की मोर्चेबंदी, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और चुनावी अभियान के लिए नए नारे-जुमले बनने लगे हैं। ऐसे में बीजेपी ने पहले ही इशारा कर दिया है कि वो नए नारों और वादों के साथ चुनाव में उतरेगी। फिलहाल पार्टी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ को छोड़कर एक नया नारा दिया है। सभी विज्ञापनों में मोदी सरकार की ‘साफ नीयत, सही विकास’ का गुणगान किया जा रहा है। हालांकि, पार्टी के सूत्र बताते हैं कि चुनाव आते-आते बीजेपी 2014 की ही तरह एक नहीं, अनेक नारों के साथ अखाड़े में कूदेगी। इन नारों पर फिलहाल काम जारी है। पार्टी की मीडिया सेल नए-नए नारे लिख रही है, उसे पार्टी अध्यक्ष से अप्रूव करा रही है। इसी हफ्ते बीजेपी का एक नया बन रहा नारा सामने आया था, जिसमें कहा गया है “काम अधूरा, एक मौका मोदी सरकार, काम पूरा होने का।”

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