दिल्ली में 1994 में दो साध्वियों की हत्या और लूटपाट के मामले में फरार चल रहे एक आरोपी को पुलिस ने करीब 30 साल बाद गिरफ्तार किया है। आरोपी ललित बिहार के समस्तीपुर में अपनी शादी के चलते पुलिस के रडार पर आया। वह दिल्ली के मंगोलपुरी में एक फैक्ट्री में पैकेजिंग मजदूर के तौर पर काम कर रहा था और अपनी पहचान छिपाकर रह रहा था।
यह मामला पूर्वी दिल्ली के शकरपुर स्थित निर्मल साधना आश्रम का है। पुलिस के मुताबिक, 1994 में बिहार के समस्तीपुर जिले के जनार्दनपुर गांव से पांच युवक काम की तलाश में दिल्ली आए थे। इनमें सुनील कुमार, सुशील, दिलीप, गंगाधर और ललित शामिल थे।
आश्रम में कर चुका है हेल्पर के तौर पर काम
सुनील कुमार पहले आश्रम में हेल्पर और सफाईकर्मी के तौर पर काम कर चुका था। इसी वजह से पांचों युवक दिल्ली आने के बाद दो रातों तक आश्रम में रुके थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि आश्रम की दो साध्वियों को श्रद्धालु नकदी, गहने और अन्य कीमती सामान चढ़ाते थे।
पुलिस के मुताबिक, इसके बाद पांचों ने आश्रम में लूटपाट की योजना बनाई। उन्हें लगा कि इस तरह वे मजदूरी करने के बजाय जल्दी पैसे कमा सकते हैं। दोनों साध्वियों में से एक की उम्र 60 साल से अधिक और दूसरी की उम्र 40 साल के आसपास थी।
लूटपाट के दौरान दोनों साध्वियों की हत्या
जांच के मुताबिक, पांचों आरोपियों ने आश्रम की दोनों साध्वियों पर हमला किया और बिजली के तार से गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद वे आश्रम से नकदी, गहने और अन्य कीमती सामान लेकर फरार हो गए। इस मामले में शकरपुर थाने में हत्या, हत्या के साथ डकैती और साझा मंशा से जुड़े भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत केस दर्ज किया गया था।
दिल्ली पुलिस के स्पेशल सीपी (क्राइम) एचजीएस धालीवाल के मुताबिक, ललित इस मामले के मुख्य आरोपियों में से एक था। उसने दोनों महिलाओं का गला घोंटने में भूमिका निभाई थी और लूट के हिस्से के तौर पर उसे नकदी और गहने मिले थे।
तीन आरोपी गिरफ्तार, ललित और गंगाधर हुए फरार
पुलिस के मुताबिक, वारदात के करीब आठ महीने बाद सुशील, सुनील और दिलीप को गिरफ्तार कर लिया गया था। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई।
वहीं, ललित और गंगाधर पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे। ललित को 26 अक्टूबर 1995 को भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। पुलिस के मुताबिक, गंगाधर को कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका और करीब तीन साल पहले उसकी मौत हो गई।
नाम बदलकर मजदूरी करता रहा ललित
पुलिस के मुताबिक, ललित साल 2000 तक बिहार में रहा और इसके बाद दिल्ली लौट आया। यहां उसने अलग-अलग फैक्ट्रियों में पैकेजिंग मजदूर के तौर पर काम किया और अपनी पहचान छिपाकर रखी।
ललित ने मई 2017 में शादी की थी और उसका पांच साल का एक बेटा भी है। पुलिस के अनुसार, वह अपने गांव बहुत कम जाता था। गांव में लोग उसे ललित के बजाय ‘छोटू’ और ‘भोला’ के नाम से जानते थे। उसका कद करीब पांच फीट था, जिसकी वजह से बचपन में उसे ये उपनाम मिले थे।
बिहार के गांव में हुई शादी से मिला पुलिस को सुराग
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम पिछले महीने बिहार के समस्तीपुर जिले के जनार्दनपुर गांव पहुंची थी। टीम का मकसद 30 साल से फरार ललित का पता लगाना था। पुलिस को गांव में ललित के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल रही थी। उसके परिवार के सदस्य भी यह नहीं बता सके कि वह कहां रह रहा था। हालांकि, पूछताछ के दौरान पुलिस को उसकी शादी के बारे में पता चला।
साल 2017 में ललित ने एक ऐसी महिला से शादी की थी, जिसे मेंटल डिसेबिलिटी थी। गांव के लोगों को उसकी शादी याद थी, भले ही उन्हें ललित के ठिकाने या उसके बीते वर्षों के बारे में जानकारी नहीं थी।
जांच से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, गांव में शादी जैसी घटनाओं की चर्चा लंबे समय तक होती रहती है। इसी जानकारी के आधार पर पुलिस ने ललित की पत्नी का पता और कॉन्टैक्ट डिटेल्स हासिल किया। इसके बाद जांच टीम को पता चला कि ललित दिल्ली में ही रह रहा है और अलग-अलग जगहों पर काम कर रहा है।
मंगोलपुरी की फैक्ट्री से हुई गिरफ्तारी
पुलिस की जांच आखिरकार दिल्ली के मंगोलपुरी फेज-2 स्थित एक फैक्ट्री तक पहुंची। यहां 48 वर्षीय ललित पैकेजिंग मजदूर के तौर पर काम कर रहा था। पुलिस ने उसकी पहचान की पुष्टि करने के बाद पिछले सप्ताह उसे गिरफ्तार कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक, ललित के आधार कार्ड पर उसका असली नाम दर्ज था, लेकिन उसने अपने एम्प्लॉयर्स को कभी अपना असली नाम नहीं बताया था।
क्राइम ब्रांच की टीम ने पुराने मामले की दोबारा जांच की
इस साल की शुरुआत में क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज ने वर्षों से फरार आरोपियों और अनसुलझे पुराने मामलों की दोबारा जांच शुरू की थी। इसी अभियान के दौरान ललित का मामला भी सामने आया।
इस कार्रवाई में इंस्पेक्टर विनय कुमार, सब-इंस्पेक्टर विकास सोलंकी, रितेश कुमार और जय कुमार तथा हेड कांस्टेबल गौरव और बिजेंद्र सिंह शामिल थे। टीम ने एसीपी सतेंद्र मोहन के नेतृत्व और डीसीपी हर्ष इंदोरा की निगरानी में कार्रवाई की।
करीब तीन दशक तक फरार रहे आरोपी की गिरफ्तारी के पीछे किसी नए गवाह या दस्तावेज के बजाय बिहार के एक गांव में हुई शादी की जानकारी अहम साबित हुई। शकरपुर के आश्रम से शुरू हुई जांच समस्तीपुर के गांव होते हुए दिल्ली की एक फैक्ट्री तक पहुंची और आखिरकार पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
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