पंजाब करीब एक दशक से उग्रवाद के दंश से जूझ रहा था। जून, 1991 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ होने थे। बेहद खराब हालात को देखते हुए चुनाव आयोग को लगभग 36 घंटे पहले चुनाव रद्द करने का ऐलान करना पड़ा था। 

इससे पहले 1984 में गोल्डन टेंपल या दरबार साहिब में कब्जा जमाए बैठे उग्रवादियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार किया था। इसके बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर-1 भी हुआ। इसके बाद भी राज्य में हिंसा और उग्रवाद की घटनाएं होती रहीं।

साल 1991 में जब 20 जून को चुनाव प्रचार खत्म हुआ तो लोगों को उम्मीद थी कि वोटिंग के बाद राज्य में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार बनेगी और शांति का माहौल स्थापित होगा। जैसे ही चुनाव को टाले जाने का ऐलान हुआ, शांति की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को इससे करारा झटका लगा।

टीएन शेषन थे मुख्य चुनाव आयुक्त

उस वक्त भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन थे। शेषन ने कहा था कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है बल्कि बीते वक्त में हुई कई घटनाएं इसके लिए जिम्मेदार हैं। हालात ऐसे थे कि उम्मीदवारों को लगातार धमकियां दी जा रही थी, मतदाताओं को डराया जा रहा था और ऐसे में चुनाव आयोग का तर्क था कि लोग डर के माहौल में वोट नहीं डाल पाएंगे।

पंजाब के स्थानीय अखबारों के पहले पन्ने पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से वोट देने की अपील जारी की गई थी लेकिन इसके कुछ देर बाद ही दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर पंजाब में चुनाव के टाले जाने की खबर सुनाई दी।

राज्यपाल ने दे दिया था इस्तीफा

चुनाव टाले जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं के बयान सामने आए थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पंजाब के राज्यपाल ओपी मल्होत्रा ​​ने इस कदम का विरोध किया था। ओपी मल्होत्रा ने चुनाव आयोग के इस फैसले के विरोध में इस्तीफा दे दिया था।

कांग्रेस (आई) ने टीएन शेषन का समर्थन किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने कहा था कि इस हालत में निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते थे। कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम ने भी चुनाव आयोग का समर्थन किया था।

बीजेपी ने किया था विरोध

बीजेपी ने चुनाव आयोग के फैसले का पुरजोर विरोध किया था। 1985 के विधानसभा के चुनाव में उसे छह सीटें मिली थी और उसे उम्मीद थी कि 1991 के विधानसभा चुनाव में वह अच्छा प्रदर्शन करेगी।

पंजाब के कई लोगों को इस बात का डर था कि चुनाव आयोग के फैसले से खालिस्तान बनाने की मांग कर रहे संगठनों को ताकत मिलेगी।

उग्रवादियों ने लगाए थे धमकी भरे पोस्टर

लुधियाना में उग्रवादियों ने धमकी भरे पोस्टर लगाए थे। पोस्टर में चेतावनी दी गई थी कि जिस अंगुली पर वोट डालने के बाद स्याही लगी होगी, उसे काट दिया जाएगा।

सुबोध कांत सहाय पर हुआ था जानलेवा हमला

विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। चुनाव प्रचार के दौरान लगभग 24 उम्मीदवारों की हत्या कर दी गई थी और तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री सुबोध कांत सहाय पर 7 जून, 1991 को लुधियाना में जानलेवा हमला हुआ था। सहाय लुधियाना लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। इसके अलावा 74 रेल यात्रियों की भी हत्या कर दी गई थी।

निशाने पर थी पुलिस

पूरे राज्य में 1.25 लाख सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था। सेना के जवान भी पंजाब में फ्लैग मार्च कर रहे थे लेकिन इसके बाद भी राज्य में हिंसा की घटनाएं जारी थीं।

हालात इस कदर खराब थे कि पुलिस खुद उग्रवादियों के निशाने पर थी और पुलिस के बड़े अधिकारी भी सुरक्षित नहीं थे। उग्रवादी लगातार हमले कर रहे थे और पंजाब पुलिस के जवानों में डर और निराशा का माहौल था।

लुधियाना में हुए ताकतवर बम विस्फोट में राज्य के डीजीपी डीएस मंगत घायल हो गए थे। मंगत पंजाब के दूसरे डीजीपी थे जिन पर उग्रवादियों ने हमला किया था। इससे पहले 1986 में जेएफ रिबेरो पर भी हमला हुआ था। इन घटनाओं की वजह से पंजाब पुलिस का मनोबल बहुत ज्यादा गिर गया था। इससे पहले पंजाब में कई पुलिस कर्मियों की हत्या की जा चुकी थी।

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