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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस पर चीनी पैसे से आंदोलन चलाने का आरोप मढ़ना चाहती थी सरकार, वरिष्ठ पत्रकार का दावा

उन्होंने लिखा है, आपातकाल में शासकों से जुड़े खास लोगों व समर्थकों को छोड़ दें तो बाकी लोगों में सरकार का इतना आतंक था जितना आज कोरोना से भी नहीं है।

george fernandes, 1975 emergency, chinaदावा है कि सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाने के चलते जॉर्ज फर्नांडिस को फंसाना चाहती थी सरकार। (एक्सप्रेस आर्काइव)

साल 1975 में जब देश में आपातकाल लगा था, तब जुलाई में केंद्र की तत्कालीन सरकार समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस पर चीन से पैसे लेकर देश में आंदोलन चलाने का आरोप मढ़ना चाहती थी। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने एक फेसबुक पोस्ट लिखकर इसका खुलासा किया है। उन्होंने लिखा है कि उन दिनों जॉर्ज फर्नांडिस पटना में रहकर भूमिगत होकर आंदोलन चला रहे थे। आंदोलन के लिए वे कानपुर से कुछ पैसे लाया करते थे लेकिन आरोप कुछ और लगाया गया था।

सुरेंद्र किशोर ने लिखा है कि सरकार जॉर्ज और उनके साथियों पर चीन से पैसे लेकर देश में आंदोलन चलाने का आरोप लगाना चाहती थी, ताकि उन्हें चीनी एजेंट करार देकर जेल में बंद किया जा सके। उन्होंने लिखा है, ” आरोप लगा कि जुलाई, 1975 में पटना में चार लोगों ने मिलकर यह षड्यंत्र किया कि इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकना है। वे चार लोग थे-जार्ज फर्नांडिस, रेवतीकांत सिन्हा, महेंद्र नारायण वाजपेयी और सुरेंद्र अकेला।”

रेवतीकांत सिन्हा साप्ताहिक ‘जनता’के संपादक थे और 1966-67 में बिहार की के.बी.सहाय सरकार के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों के ऐतिहासिक आंदोलन के सबसे बड़े अराजपत्रित कर्मचारी नेता थे। यानी सरकार से रेवती बाबू की अदावत पुरानी थी। सुरेंद्र किशोर उसी जनता साप्ताहिक में सहायक संपादक थे। इन लोगों को सरकार बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे में सी.बी.आई.द्वारा तैयार आरोप पत्र में लपेटवाना चाहती थी।

पोस्ट के साथ पुराने अखबार की कॉपी भी लगायी गई है।

बाद में रेवती कांत सिन्हा मुखबिर बन गए। सीबीआई और पुलिस के अधिकारियों ने उन पर पारिवारिक उलझन का दबाव बनाया जिसके बाद वो टूट गए। पत्रकार ने लिखा है, “रेवती बाबू को सी.बी.आई. ने धमकाया था कि यदि मुखबिर नहीं बनिएगा तो आपका पूरा परिवार जेल में होगा।”

उन्होंने लिखा है, आपातकाल में शासकों से जुड़े खास लोगों व समर्थकों को छोड़ दें तो बाकी लोगों में सरकार का इतना आतंक था जितना आज कोरोना से भी नहीं है। उस वक्त सरकार पर कोई खुलकर बात नहीं करता था। प्रतिपक्षी नेताओं -कार्यकर्ताओं से, जो गिरफ्तारी से बचे थे, भूमिगत थे, बात करने से पहले कोई भी आगे-पीछे देख लेता था कि कोई तीसरा देख तो नहीं रहा है।”

किशोर ने लिखा है कि वो भी पुलिस से बचने के लिए मेघालय भाग गए थे। उन दिनों जॉर्ज फर्नांडिस ‘बाबा’ या ‘सुदर्शन’ या किसी अन्य नाम से भूमिगत जीवन के अपने साथियों को पत्र लिखा करते थे। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की फेसबुक पोस्ट का लिंक नीचे दिया गया है।

चीन के पैसों से आपातकाल में हिंसक आंदोलन चलाने का
जार्ज फर्नांडिस पर आरोप मढ़ना चाहती थी…

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