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Union Budget (1947-2021): बंटवारे के दर्द से लेकर कोरोना के कहर तक, बजट के देश का बहीखाता बनने की दास्तान

1947 to 2021 Union Budget at a Glance: 2021 का केन्द्रीय बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आम बजट बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे समय में, जनसत्ता पर हम आपको भारत की आजादी के बाद से लेकर अब तक पेश किए गए बजट की प्रमुख बातें बता रहे हैं। […]

Updated: February 4, 2021 3:48 PM
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में पेश किया आर्थिक सर्वेक्षण।

1947 to 2021 Union Budget at a Glance: 2021 का केन्द्रीय बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा। किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आम बजट बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे समय में, जनसत्ता पर हम आपको भारत की आजादी के बाद से लेकर अब तक पेश किए गए बजट की प्रमुख बातें बता रहे हैं। खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित आजाद भारत के सबसे पहले बजट से लेकर 2020 के कोरोना काल से जूझ रहे मौजूदा एनडीए सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले बजट तक, हर बार किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया गया। लेकिन, चुनौतियां और समस्याएं जस की तस रहीं और उनके प्रस्तावित समाधानों में भी कोई बदलाव नहीं आया। तो आइये महंगाई, विकास, अर्थव्यस्था और पर्यावरण के लिहाज से बीते 73 सालों के बजट निर्माण पर डालते हैं एक नजर।

1948-1949 : आजाद भारत का पहला बजट

भारत का पहला बजट सिर्फ साढ़े सात महीने 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक के लिए पेश किया गया था। पहले बजट की प्रमुख बात बजट को पारित करने का फैसला थी। बंटवारे और उसके परिणामस्वरूप उपजी अस्थिरता बजट के प्रावधानों को निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्व रहे। इसमें खाद्यान्न उत्पादन, रक्षा सेवाओं और सिविल व्यय, इन तीन चीजों पर सबसे ज्यादा खर्च किया गया। खाद्य उत्पादन बहुत कम था, इसलिए खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी गई। इसमें करीब 171 करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें से 15.9 करोड़ रुपये डाक एवं तार विभाग से मिलने की उम्मीद थी।

1950-51: भारतीय गणतंत्र का पहला बजट

संविधान अपनाकर देश को गणतंत्र घोषित करने के बाद यह पहला बजट था। बजट का मुख्य उद्देश्य योजना आयोग की स्थापना करना था, जो देश के संसाधनों का उपयोग करने के जिए प्रभावी योजनाएं तैयार कर सके। 1950 की शुरुआत में भारतीय बजट सार्वजनिक क्षेत्र और वित्त विभाग के इर्द-गिर्द ही सिमटा रहता था। ऐसे में यह करों, मुद्रास्फीति और सार्वजनिक बचत पर ही निर्भर रहा। इस दौर में कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई। रक्षा और सिविल व्यय चरम पर रहे। देश के विभिन्न हिस्सों में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि असम में भकूंप, बिहार की बाढ़ और यूपी व बिहार में सूखा आदि के लिए प्रावधान किए गए। बजट में अधिकतम आयकर की दर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया गया। 121,000 रुपये से अधिक आय पर 8.5 आना प्रति रुपये की दर से सुपर टैक्स लागू किया गया। निजी कर की अधिकतम दर 78 फीसदी थी।

1951-1960: भारतीय विकास का फर्स्ट गेयर

इन वित्तीय वर्षों की खासियत औद्योगिक विकास रहा, जिससे वार्षिक विकास दर 8 प्रतिशत के अहम स्थान पर पहुंच गई। यह रासायनिक उद्योगों के विकास, लघु उद्योगों को मिले प्रोत्साहन और पूंजी व उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में हुई तरक्की के चलते संभव हो सका। शिक्षा के क्षेत्र में आवंटन में वृद्धि हुई। इसमें राज्यों को प्राथमिक, सामाजिक, माध्यमिक और विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए दिए गए अनुदान के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को छात्रवृत्ति की सुविधा भी शामिल रही। वायु सेना व नौसेना के विस्तार कार्यक्रमों के चलते रक्षा खर्चों में बढ़ोतरी हुई। पूंजी की लागत बढ़ी और बचत के लिए प्रोत्साहित किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता को बढ़ाने और बचत के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सतत प्रयास किए गए। घरेलू बचत को बढ़ाने और वाह्य मुद्रा के अंर्तवाह को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रगति हुई, ताकि विदेशी मुद्रा की जरूरतों को पूरा किया जा सके। लोहे, इस्पात और एल्यूमीनियम के उत्पादन में बढ़ोतरी इस साल की एक और उल्लेखनीय विशेषता थी, जिससे औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक में एक तिहाई से अधिक की बढ़त हुई।

1960 से 1970: जब बढ़ने लगा रक्षा बजट

इन वर्षों के दौरान बजट निर्माण में सबसे अधिक जोर देश की रक्षा क्षमता को बेहतर बनाने पर दिया गया। पिछले बजट के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए इस अवधि के बजट में विकास, उत्पादन, रोजगार और निवेश पर खर्च को महत्व दिया गया। एक और महत्वपूर्ण पहलू आम आदमी की बचत दर में और सुधार करना था। निर्यात के प्रोत्साहन और विकास के लिए बजट मुहैया कराया गया। औद्योगिक और निवेश क्षेत्रों में वृद्धि हुई। एक और प्रमुख तथ्य रेलवे और उद्योगों को विदेशी सहायता मुहैया करवाना रहा। बजट में पहली बार नेपाल, भूटान, और अफ्रीकी देशों को आदि को विदेशी सहायता मुहैया कराने के लिए प्रावधान किए गए। 1968-69 के बजट में माल पर आबकारी विभाग के अधिकारियों की स्टैंपिंग और मूल्यांकन करने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया। इस लिहाज से इसे जन-संवेदनशील बजट माना जाता है। सरकार ने सभी उत्पादकों के लिए स्व-मूल्यांकन प्रणाली भी शुरू की।

1970 से 1980: रोजगार बढ़ाने वाले बजट

इस दौरान बजट की खासियत रोजगार के पर्याप्त अवसर मुहैया कराने की रही। शुष्क खेती वाले इलाकों पर अत्यधिक ध्यान दिया गया। छोटे उद्यमों और उद्यमियों पर खासतौर पर ध्यान दिया गया। बजट में खासतौर पर उन योजनाओं, जो समाज कल्याण के साथ भविष्य की विकास संभावनाओं पर केंद्रित थीं, के जरिए प्रावधान बनाए गए। वित्तिय संस्थानों ने उद्योगों और कृषि क्षेत्र को भी लंबे समय तक के लिए रोजगार अवसर पैदा करने के लिए सहयोग दिया। जिन अन्य क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया, वह थे : शहरी एवं ग्रामीण विकास, पेयजल सुविधाएं और पेंशन योजना। बजट में जनरल बीमा कंपनियों, इंडियन कॉपर कॉर्प और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के लिए 56 करोड़ रुपये दिए गए। यह कदम इसलिए उठाए गए ताकि विभिन्न उद्योगों जैसे कि बिजली, सीमेंट और इस्पात आदि में बढ़ती कोयले की मांग को पूरा करने के लिए कोयले की आपूर्ति बिना रुकावट जारी रहे।

1981 से 1990: सामाजिक समानता वाले बजट

इस दौरान अनुसूचित जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार, विकास नीतियों का प्रमुख तत्व बना रहा। राज्यों की योजनाओं, केंद्रशासित प्रदेशों की योजनाओं और पहाड़ों, जनजातीय क्षेत्रों की उप योजनाओं, अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजनाएं, उत्तर पूर्वी काउंसिल की योजनाओं, ग्रामीण विद्युतीकरण निगमों और प्राकृतिक आपदाओं में केंद्रीय सहायता के तौर पर 3,094 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। 20 सूत्रीय आर्थिक कार्यक्रम के तहत भूमिहीन और कमजोर वर्ग के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। जनजातीय उप योजना के तहत आदिवासियों और उनके क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए 70 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। औद्योगिक विकास की दर इस दौरान 4.5 प्रतिशत तक बढ़ गई।

1991 से 2000: आर्थिक उदारीकरण का दौर

1991-92 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई। आयात-निर्यात नीति को संशोधित किया गया और विदेशों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय उद्योग पर से आयात शुल्क घटाए गए। सरकार ने सीमा शुल्क को 220 प्रतिशत से घटाकर 150 प्रतिशत करके कर संरचनाओं को सुसंगतपूर्ण करना शुरू कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि बकाए का भुगतान अनिश्चित था। सरकार ने 1994 के बजट में सेवा कर को पहली बार पेश किया और तीव्र तकनीकी विकास के जरिए विकास पर अपना दांव लगाया। 1997 के बजट में व्यक्तियों और कंपनियों को कर दरों में राहत दी गई। इससे कंपनियों को बाद के वर्षों में कर देनदारी को लेकर पहले के वर्षों में भुगतान किए गए एमएटी को समायोजित करने की सहूलियत मिली। सरकार ने काले धन को लाने के लिए स्वैच्छिक प्रकटीकरण आय योजना यानि VDIS की शुरुआत की और इस तरह लगभग 10,000 करोड़ रुपये जुटाए। करदाताओं द्वारा अधिक संख्या में कर देने से बाजार में मांग उत्पन्न करने में मदद मिली। इस राजस्व का इस्तेमाल सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाने के लिए किया गया।

2000 से 2011: IT क्रांति का बजट

इस अवधि के दौरान सॉफ्टवेयर निर्यातकों के लिए प्रोत्साहन को खत्म कर दिया गया था। 1991 के बजट में सॉफ्टवेयर निर्यात से होने वाली आय को तीन साल के लिए कर-मुक्त कर दिया गया था और फिर 1995 के बजट में कर छूट को बढ़ा दिया गया था। यह जीडीपी के कर अनुपात में सुधार करने और विश्व में भारत को सॉफ्टवेयर विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में बढ़ावा देने के लिए किया गया था। सॉफ्टवेयर निर्यात क्षेत्र में इस कर छूट के बाद भारतीय आईटी उद्योग में असाधारण वृद्धि हुई। 2001-02 में स्थानांतरण मूल्य निर्धारण नियम भी पेश किए गए थे, जो संबंधित उद्यमों के बीच लेनदेन में पारदर्शिता के लिए जरूरी थे। विनियमन ने भारत में कर आधार में गिरावट को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। 2010-11 में अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी 8.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा। अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय रूप से लचीलापन दिखा।

2012 से 2013: UPA के आखिरी बजट

बजट को गरीब हितैषी के रूप में पेश किया गया, जबकि विकास कार्यक्रमों पर खर्च के लिए उधार को न बढ़ाकर गोपनीय तरीके से बाजार में यह खेल खेला गया। सरकार ने आसान क्रेडिट तक पहुंच के साथ स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर की घोषणाओं को बदलने की कोशिश की। सबसे पहले इसने स्पष्ट रूप से गरीब लोगों की क्रेडिट तक पहुंच को बढ़ाया और उसे सुगम बनाया। 2012-13 में कृषि ऋण का लक्ष्य 100,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 575,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। दूसरा, राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 (एफआरबीएम अधिनियम) में संशोधन जैसे विभिन्न राजकोषीय पहलों के माध्यम से बजट ने निजी क्षेत्र को यह संदेश दिया कि कम-से-कम सरकार के प्रत्यक्ष बाजार से उधार लेने जैसी गतिविधियों को प्रभावित करने वाले मामले में सुधार कार्यक्रम पटरी पर हैं। हालांकि, बजट निजी डीजल कारों में रियायती डीजल के उपयोग को रोकने में विफल रहा।

2014- 2019: बजट बना बहीखाता

मोदी आए तो बजट का नाम बदल कर बहीखाता हो गया…वित्तमंत्री अब बजट सूटकेस के बजाय देसी फोल्डर में लेकर संसद आने लगे…एनडीए काल के बजट में ज्यादातर ध्यान सरकारी खर्चों में कमी लाने पर दिया गया…विनिवेश को बढ़ावा दिया गया और सार्वजनिक कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी बेंचकर राजस्व प्राप्ति की गई…कृषि और सिंचाई पर सरकारी खर्च ना बढ़ाकर पीपीपी मॉडल के जरिए निवेश की कोशिश की गई…रेल और आम बजट को मिलाकर एक कर दिया गया…बजट अब 1 फरवरी को पेश होने लगा…2016 में नोट बंदी और 2017 में जीएसटी को लागू करने के लिए बजट का इंतजार भी नहीं किया गया…स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान योजना और मेक इन इंडिया की छाप इस दौरान लाए गये सभी बजटों में साफ तौरपर देखी गई….

2020: बजट पर कोरोना का कहर

कॉरपोरेट टैक्स को युक्ति संगत बनाने और आयकर स्लैब में बहुप्रतिक्षित सुधार की घोषणा तो 2020 के बजट में कई गई…मगर बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने का कोई ठोस मास्टर प्लान नजर नहीं आया…इस बीच मार्च के महीने में कोरोना का कहर बरपा और अर्थव्यवस्था रसातल में गिरती चली गई…विकास से ध्यान हटाकर सरकार को मानवीय और कल्याण योजनाओं के लिए फौरी योजना बनानी पड़ी…ऐसे में 2021 का बजट बनाना वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए आसान नहीं होने वाला… ऐसे में अगर उन्हीं के शब्दों में कहें तो ये एक ऐसा बजट होगा, जो पिछले सौ सालों में देखने को नहीं मिला है…

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