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जब अपने घर में बाप-भाई के बिना सुरक्षित नहीं तो बाहर कैसे देने जाएं बोर्ड एग्जाम? 19 वर्षीय कश्मीरी छात्रा ने सुनाई सेना के खौफ की दास्तां

'कारवां' मैग्जीन ने दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के छंदगाम की स्थिति पर एक रिपोर्ट छापी है, जिसके मुताबिक वहां सेना के जवान अक्सर घर में महिलाओं को अकेला देखकर परेशान करते हैं।

kashmirतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए हुए करीब तीन महीने हो चुके हैं लेकिन अभी भी वहां जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है। हालांकि, सरकार का दावा है कि स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं, अस्पतालें सुचारू रूप से काम कर रही हैं और मोबाइल-टेलीफोन की लाइनें ऐक्टिव हो चुकी हैं। घाटी में अभी भी सुरक्षा बलों की चौकसी बरकरार है। इस बीच घाटी में मीडिया के हवाले से खबरें आई हैं कि वहां स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है और इस वजह से स्कूली छात्राएं बोर्ड एग्जाम देने के लिए भी घरों से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। स्थामीय लोग सेना के जवानों पर जुल्म करने के भी आरोप लगा रहे हैं।

‘कारवां’ मैग्जीन ने दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के छंदगाम की स्थिति पर एक रिपोर्ट छापी है, जिसके मुताबिक वहां सेना के जवान अक्सर घर में महिलाओं को अकेला देखकर परेशान करते हैं। 19 साल की कश्मीरी छात्रा रबिया जान ने कारवां को दिए इंटरव्यू में बताया कि उसके गांव का महिलाएं आर्मी के जवानों के दमन का शिकार हो रही हैं। बतौर रबिया, “सेना हमारे घरों में आती है और पूछती है, ‘इस घर में कितनी महिलाएं हैं, वे क्या करती हैं, वे कितनी पुरानी हैं?” रबिया ने बताया, “अब हमारी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?”

रबिया गांव की दर्जनभर उन महिलाओं में शामिल हैं जो सैना की तैनाती के बावजूद गांव छोड़कर नहीं गईं। उसने बताया की वो शाम में घर से बाहर नहीं निकल पा रही है। रबिया ने कहा, “जब भी हम किसी चीज़ पर चर्चा करते हैं, तो वो बातें सेना तक पहुँच जाती है और अगले दिन सेना के जवान आकर हमसे पूछते हैं, तुमने ऐसा क्यों कहा?”

रबिया 12वीं में पढ़ती है। इस साल उसे बोर्ड एग्जाम में शामिल होना था लेकिन उसने बोर्ड का परीक्षा फॉर्म नहीं भरा क्योंकि उसे भरने के लिए उसे घर से बाहर जाना पड़ता। वो कहती है, “अगर मैं बाहर जाती हूं तो मुझे अपने भाई या पिता को साथ लेकर जाना पड़ता, लेकिन वे भी सुरक्षित नहीं हैं। मैं अपने परिवार का जीवन कैसे दांव पर लगा सकती थी?

रबिया कहती है, “जब हम अपने पिता और भाइयों के बिना अकेले अपने घरों में नहीं बैठ सकते हैं, तो हम कैसे बाहर जा सकते हैं और अपने परीक्षा फॉर्म जमा कर सकते हैं?” उसने कहा कि इलाके की हर महिला की यही कहानी है। विरोध करने पर घर के पुरुष सदस्यों के साथ सेना बुरा बर्ताब करती है। यहां तक कि घरों की छट और गेट पर पत्थर भी बरसाती है। जब इस बारे में कारवां ने सेना से ईमेल के जरिए पक्ष जानना चाहा तो कोई जवाब नहीं मिला।

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