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राज्यों की भी आर्थिक स्थिति खस्ताहाल? 17 राज्यों की एक कहानी- खर्च में भारी कटौती, दवाब में राजकोष, बिहार समेत चार राज्यों में हेल्थ पर फोकस नहीं

पिछले बजट के मुताबिक इन राज्यों के हालिया बजट की तुलना करें तो इन राज्यों के वास्तविक राजस्व में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है। आंकड़े बताते हैं कि इन राज्यों में स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च का लगभग 69 प्रतिशत हिस्सा है।

Author Translated By प्रमोद प्रवीण नई दिल्ली | Updated: March 19, 2020 8:33 AM
कोरोना वायरस की वजह से देश संकट झेल रहा है। (indian express)

– उदित मिश्रा, नुशैबा इकबाल, हरीश दामोदरन

कोरोना वायरस की वजह से देश संकट झेल रहा है। अनगिनत और अज्ञात लोग इसकी चपेट में आए हैं और आ रहे हैं। केंद्र से ज्यादा राज्य सरकारों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त करने का दवाब बढ़ता दिख रहा है। हालांकि, राज्यों द्वारा कितनी अच्छी तरह से इससे निपटने की रणनीति बनाई गई है या तैयारियां की गई हैं, यह काफी हद तक उनकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है। एक्सप्रेस रिसर्च ग्रुप द्वारा 17 राज्यों के बजट के विश्लेषण से पता चलता है कि यह काम आसान नहीं है।

पिछले बजट के मुताबिक इन राज्यों के हालिया बजट की तुलना करें तो इन राज्यों के वास्तविक राजस्व में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है। आंकड़े बताते हैं कि इन राज्यों में स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च का लगभग 69 प्रतिशत हिस्सा है। इन राज्यों के
बजट विश्लेषण से निम्नलिखित प्रमुख ट्रेंड का पता चलता है:

-सभी राज्यों (असम को छोड़कर) में चालू वित्त वर्ष में उनकी राजस्व प्राप्तियां घट गई हैं। उदाहरण के लिए, बिहार ने अपनी राजस्व प्राप्तियों में लगभग 25,500 करोड़ रुपये की कमी देखी है। यह बजट अनुमानों में लगभग 14 प्रतिशत की गिरावट है।

-राज्यों के राजस्व में गिरावट की वजह केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए कुल करों (जिनमें से कुछ हिस्सा राज्यों को दिया जाता है) में गिरावट है। यह धीमी अर्थव्यवस्था का परिणाम है।

-हाथों में कम पैसे होने की वजह से राज्यों ने चालू वित्त वर्ष में अपने कुल खर्चे में कटौती की है। इससे भी बुरी बात यह है कि अधिकांश राज्यों ने अगले वित्तीय वर्ष (2020-21) के लिए खर्च में मामूली वृद्धि की है।

-बिहार, छत्तीसगढ़ और असम जैसे कुछ राज्यों ने तो 2020-21 के बजट में खर्च में कटौती का भी प्रस्ताव दिया है। उदाहरण के तौर पर, अगले साल असम का कुल खर्च 4 फीसदी घट जाएगा, हालांकि उसे उम्मीद है कि उसकी अर्थव्यवस्था 9 फीसदी से ज्यादा बढ़ेगी।

-खर्चों में कटौती करने से पूंजीगत व्यय पर असर पड़ता है, यानी अस्पताल जैसी परिसंपत्तियों के निर्माण पर खर्च होने वाला पैसा कम जाता है। स्वास्थ्य देखभाल के प्रावधान के लिए यह बुरी खबर है क्योंकि औसतन, अधिकांश राज्य अपने कुल धन का लगभग 5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। यह राज्यों में शिक्षा पर 15 से 16 प्रतिशत (औसतन) खर्च करने से काफी दूर है।

-असम, राजस्थान, गुजरात और हिमाचल प्रदेश सामान्य तौर पर स्वास्थ्य पर अच्छा खर्च करते हैं लेकिन बिहार, कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा ऐसे राज्य हैं जो अपने कुल खर्चे के अनुपात में स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्चते हैं।

-जिन राज्यों में अगले 12 महीनों में विधान सभा चुनाव होने हैं, वहां रियायत देनें और मुफ्त में सुविधाएं (मुफ्त बिजली जैसी) देने की हड़बड़ी देखी गई। ऐसे राज्यों में बीजेपी शासित और गैर बीजेपी शासित दोनों तरह के राज्य शामिल हैं। इस कड़ी में एक उल्लेखनीय अपवाद बिहार है, जहां धन की कमी के साथ वित्तीय घाटा सीमा से तीन गुना अधिक हो गया है।

 

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