एनआरसी, पुरानी वोटर लिस्ट, जमीन के कागजात, पैन कार्ड, वोटर आईडी और स्कूल के रिकॉर्ड समेत कई दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश किए थे। लेकिन हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इतने दस्तावेज पर्याप्त नहीं हैं। कानून कहता है कि जिस व्यक्ति पर विदेशी होने का सवाल उठता है, उसे पक्के सबूतों के साथ यह साबित करना होता है कि वह भारतीय नागरिक है।
कोर्ट के मुताबिक, अमीनुल हक अपने परिवार और पूर्वजों से अपना कानूनी संबंध साबित नहीं कर पाए। उनके दस्तावेजों में उम्र, पता और परिवार से जुड़ी जानकारी में भी कई विसंगतियां थीं। जानकारी के लिए बता दें कि याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव की वजह से उनका परिवार अलग-अलग गांवों में रहने लगा था। लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र सबूत कोर्ट के सामने पेश नहीं किया जा सका।
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। ये केवल पहचान और चुनाव से जुड़े दस्तावेज हैं।
अमीनुल हक ने 1951 की एनआरसी की कंप्यूटर जनित कॉपी भी पेश की थी। लेकिन अदालत ने कहा कि उसे कानून के मुताबिक सही तरीके से प्रमाणित नहीं किया गया था। इसलिए उसे सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसी तरह, अमीनुल हक के पिता ने अदालत में उन्हें अपना बेटा बताया। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि केवल मौखिक बयान से रिश्ता साबित नहीं होता। इसके लिए जरूरी दस्तावेजी साक्ष्य भी होने चाहिए।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने 2019 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें अमीनुल हक को विदेशी घोषित किया गया था। हाल ही में विदेश मंत्रालय भी स्पष्ट कर चुका है कि भारतीय पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं।
