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मुंबई से चंद घंटे दूर 8 साल तक आदिवासी बने रहे बंधुआ मजदूर, सुनी गालियां, झेला अत्याचार! अब दर्ज करा पाए FIR

मजदूरों का कहना है कि काम के दौरान उन्हें बेहद ही खराब स्थिति में रहना पड़ता था।

Author Edited By Nishant Nandan Updated: January 11, 2020 10:54 AM
इस मामले में अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। फोटो सोर्स – Indian Express

मुंबई से चंद घंटे की दूरी पर करीब 14 आदिवासी करीब 8 साल तक बंधुआ मजदूर बने रहे और किसी को कुछ भी पता नहीं चल सका। इन 14 आदिवासियों में पुरुष और महिलाओं के अलावा 8 बच्चे भी शामिल थे। यह सभी खेत, गौशाला और राइस मिल में बंधुआ मजूदर के तौर पर करीब 8 साल से काम कर रहे थे। यह सभी मुंबई से करीब 120 किलोमीटर दूर पुणे के धमाने गांव में मजदूर थे। पिछले ही साल जून के महीने में सामाजिक कार्यकर्ताओं औऱ पुलिस की मदद से इन्हें आजाद कराया गया है।

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में Shirgaon-Parandwadi थाने में केस दर्ज कराया गया है। इस मामले में लेबर एक्ट की धारा के तहत केस दर्ज कराया गया है। लेकिन गंभीर बात यह है कि अभी तक किसी की भी गिरफ्तारी इस मामले में नहीं हो पाई है। इस मामले में थाने के वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर कैलाश महेशवाडे का कहना है कि कानून के मुताबिक जब इनका रेसक्यू ऑपरेशन किया गया था तब उसके 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज कराना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। मामले में अब शिकायत दर्ज कराई गई है लेकिन कोई सबूत नहीं दिया गया है। जबकि इस मामले में पहला सबूत होना बहुत जरूरी है। इसी वजह से अब तक किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।

आजाद होने वाले 28 साल के संदीप काले ने बताया कि अहमदनगर के संगमानेर और पार्नर तालुकास के रहने वाले करीब 30 आदिवासियों ने काम के सिलसिले में एक बॉन्ड साइन किया था। साल 2011 में यह बॉन्ड साइन किया गया था। हालांकि उस वक्त यह बॉन्ड सिर्फ 6 महीनों के लिए ही भरा गया था। उस वक्त सभी मजदूरों को कुछ पैसे भी दिये गये थे। लेकिन मुश्किल तब शुरू हुई जब अगले ही साल करीब 15 मजदूर काम छोड़ कर चले गए।

इस मामले में धमाने गांव के रहने वाले हनुमंत गाराडे के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज की गई है लेकिन इनका कहना है कि मजदूरों ने एडवांस पेमेंट ले रखा है। इन आदिवासियों के मुताबिक इन्हें सात सालों तक कोई पेमेंट नहीं मिला। अगर इन्हें पैसों की जरुरत पड़ती थी तो कभी-कभी इन्हें सौ रुपए दिए जाते थे। यह सभी खुली गौशालाओं में रहते थे। सभी परिवार को काम के बदले राशन दिया जाता था। इन्हें राइस मिल को चलाने के अलावा पशुओं की दखरेख, लकड़ी काटने औऱ खेत जोतने के काम में लगाया गया था। इसके अलावा इनसे घरेलू काम भी कराए जाते थें।

मजदूरों का कहना है कि काम के दौरान उन्हें बेहद ही खराब स्थिति में रहना पड़ता था। यहां इनके खाने-पीने का भी ख्याल नहीं रखा जाता था और प्रबंधन उन्हें गालियां भी दिया करता था। यहां तक कि वो जहां रहते थें वहां ट्वायलेट भी नहीं था।

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