चेन्नई की उमस भरी दोपहर में जब दफ्तरों से लौटते मजदूर, रिक्शा चालक, बुजुर्ग महिलाएं और दिहाड़ी कामगार स्टील की थाली लेकर कतार में खड़े दिखाई देते हैं, तब ‘अम्मा कैंटीन’ सिर्फ एक सरकारी भोजन योजना नहीं लगती। यह तमिलनाडु की उस राजनीति का चेहरा है जिसमें कल्याण, जनसंपर्क और राजनीतिक प्रतीकवाद एक साथ चलते हैं। हाल ही में नए सीएम सी. जोसेफ विजय ने जब अम्मा कैंटीन के खाने में सुधार को लेकर समीक्षा की और निर्देश दिए तो ‘अम्मा कैंटीन’ का नाम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया।
एक रुपये की इडली, पांच रुपये का सांभर चावल और बेहद कम कीमत में मिलने वाला भोजन- यह मॉडल भारत में सरकारी सब्सिडी आधारित शहरी फूड सिक्योरिटी का शायद सबसे चर्चित प्रयोग रहा है। अम्मा कैंटीन (Amma Canteen / Amma Unavagam) भारत की सबसे लोकप्रिय और सफल सामाजिक कल्याण योजनाओं में से एक है। तमिलनाडु की जयललिता सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना का मुख्य उद्देश्य गरीब, मजदूर और जरूरतमंद लोगों को बेहद कम कीमत पर स्वच्छ और पौष्टिक भोजन देना है।
कैसे हुई शुरुआत?
अम्मा कैंटीन की शुरुआत 2013 में हुई थी। इसे तत्कालीन तमिलनाडु मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने लॉन्च किया था। जयललिता को उनके समर्थक ‘अम्मा’ यानी मां कहकर पुकारते थे। यही वजह थी कि उनके शासनकाल में शुरू हुई कई जनकल्याण योजनाओं के नाम के आगे ‘अम्मा’ जोड़ा गया- जैसे अम्मा पानी, अम्मा सीमेंट, अम्मा फार्मेसी और अम्मा कैंटीन।
लेकिन अम्मा कैंटीन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई। इसकी वजह थी- सीधे गरीब आदमी की थाली तक पहुंच।
19 मार्च 2013 को चेन्नई में पहली अम्मा कैंटीन शुरू हुई। उस समय सरकार का तर्क था कि महानगरों में बढ़ती महंगाई और पलायन के बीच गरीबों को सस्ता और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना जरूरी है।
एक रुपये की इडली का राजनीतिक अर्थ
भारत में चुनावी राजनीति में मुफ्त योजनाओं को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। लेकिन अम्मा कैंटीन ने इस बहस को नया मोड़ दिया। जयललिता सरकार ने इसे सिर्फ ‘फ्रीबी’ नहीं बल्कि ‘अर्बन फूड सिक्योरिटी’ मॉडल के रूप में पेश किया।
कैंटीन में शुरुआती मेन्यू बेहद सीमित लेकिन प्रभावी था:
-1 रुपये की इडली
-5 रुपये का सांभर चावल
-5 रुपये का दही चावल
-3 रुपये में दो चपाती (दाल के साथ, कुछ चुनिंदा कैंटीन में रात के समय)
-कम कीमत पर लेमन राइस और अन्य स्थानीय व्यंजन
यानी अगर कोई व्यक्ति मात्र 5 रुपये से 7 रुपये खर्च करता है तो उसका पेट आसानी से भर जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इन कैंटीनों का संचालन मुख्यतः महिला स्वयं सहायता समूहों के जरिए किया गया। इससे योजना सिर्फ भोजन वितरण तक सीमित नहीं रही बल्कि महिलाओं को रोजगार देने का माध्यम भी बनी।
कितने सेंटर हैं?
शुरुआत में चेन्नई में कुछ दर्जन कैंटीन खोली गई थीं। लेकिन योजना की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी और बाद में इसे तमिलनाडु के दूसरे शहरों तक विस्तार दिया गया।
कुछ वर्षों के भीतर राज्य में सैकड़ों अम्मा कैंटीन शुरू हो गईं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अभी तमिलनाडु में करीब 620 से अम्मा कैंटीन संचालित हो रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा 383 कैंटीन चेन्नई कॉर्पोरेशन क्षेत्र में थीं। वहीं 237 सेंटर राज्य भर की अन्य नगर पालिकाओं और नगर निकायों द्वारा संचालित किए जाते हैं।
अम्मा कैंटीन क्यों हुई इतनी लोकप्रिय?
अम्मा कैंटीन की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह थी कि इसने ‘गरीब’ की परिभाषा को सरकारी कागजों तक सीमित नहीं रखा। यहां कोई राशन कार्ड नहीं पूछा जाता था। कोई आय प्रमाणपत्र नहीं चाहिए था। कोई पहचान पत्र जरूरी नहीं था। जो भूखा है, वह खाना खा सकता है। निर्माण मजदूर, प्रवासी श्रमिक, बुजुर्ग, रिक्शा चालक, अस्पतालों के बाहर इंतजार कर रहे परिवार- सब इस योजना के उपभोक्ता बने।
कोविड महामारी के दौरान तो अम्मा कैंटीन तमिलनाडु की राहत व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गई। लॉकडाउन में जब हजारों लोग बेरोजगार हो गए, तब इन कैंटीनों ने बेहद कम कीमत पर भोजन उपलब्ध कराया।
मॉडल कैसे काम करता है?
आपके मन में यह सवाल जरूर आ सकता है कि आज के दौर में ₹1 में इडली और ₹5 में चावल देना कैसे मुमकिन है? इसके पीछे सरकार का एक बड़ा सपोर्ट सिस्टम काम करता है।
अम्मा कैंटीन पूरी तरह सरकारी सब्सिडी पर आधारित मॉडल है। भोजन की वास्तविक लागत और उपभोक्ता से ली जाने वाली राशि के बीच का अंतर सरकार वहन करती है। स्थानीय निकाय इसके संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महिला स्वयं सहायता समूह भोजन पकाते और वितरण करते हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार, सरकार भोजन की गुणवत्ता और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने का दावा करती रही है। हालांकि आलोचक हमेशा यह सवाल उठाते रहे कि इतनी भारी सब्सिडी वाला मॉडल लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे रहेगा।
बिजनेस और सब्सिडी मॉडल
भारी सरकारी सब्सिडी: भोजन को बनाने में जो भी असली लागत आती है, उसका एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकार और स्थानीय नगर निगम (जैसे चेन्नई कॉर्पोरेशन) अपनी जेब से भरते हैं। यह पूरी तरह एक ‘नो-प्रॉफिट-नो-लॉस’ (बिना मुनाफे वाली) जन-कल्याण योजना है।
सस्ता कच्चा माल: सरकार इन कैंटीनों के लिए राशन (चावल, दाल आदि) सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) यानी सरकारी कोटे से बहुत कम दामों पर उपलब्ध कराती है।
महिला सशक्तिकरण: इन कैंटीनों को चलाने का जिम्मा महिला स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups – SHGs) को दिया गया है। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिलता है और वे पूरी लगन और घरेलू साफ-सफाई के साथ खाना तैयार करती हैं।
क्या दूसरी सरकारों ने भी अपनाया मॉडल?
अम्मा कैंटीन की सफलता के बाद देश के कई राज्यों में इसी तरह की योजनाएं शुरू हुईं।
-राजस्थान में ‘अन्नपूर्णा रसोई’
-कर्नाटक में ‘इंदिरा कैंटीन’
-ओडिशा में ‘आहार केंद्र’
-दिल्ली और अन्य राज्यों में सस्ती थाली योजनाएं
इन सभी मॉडलों पर कहीं न कहीं अम्मा कैंटीन का प्रभाव दिखाई देता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अम्मा कैंटीन ने भारतीय राजनीति में ‘वेलफेयर पॉपुलिज्म’ को नया चेहरा दिया।
बदलाव और सुधार
जयललिता के निधन के बाद भी अम्मा कैंटीन तमिलनाडु की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही। हालांकि समय-समय पर इसके संचालन और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे। कुछ रिपोर्टों में खराब रखरखाव, सीमित मेन्यू और फंडिंग की समस्याओं का जिक्र किया गया।
2021 में सत्ता परिवर्तन के बाद एम.के. स्टालिन सरकार ने कई कैंटीनों के नवीनीकरण और आधुनिकीकरण की बात कही। कुछ स्थानों पर रसोई व्यवस्था और इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार किए गए। हालांकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि नई सरकार अम्मा ब्रांड को कमजोर करना चाहती है।
राजनीतिक रूप से भी अम्मा कैंटीन सिर्फ भोजन योजना नहीं बल्कि जयललिता की विरासत का प्रतीक बन चुकी है। इसलिए इसे बंद करना किसी भी सरकार के लिए आसान राजनीतिक फैसला नहीं था।
तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने भी अधिकारियों को राज्य में अम्मा कैंटीन के बुनियादी ढांचे में सुधार करने और लोगों को बढ़िया खाना उपलब्ध करने का निर्देश दिया। अम्मा कैंटीन में परोसे जाने वाले खाने की क्वालिटी और स्वाद संतोषजनक नहीं होने की शिकायतें मिलने के बाद मुख्यमंत्री ने शीर्ष अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक की। विजय ने अधिकारियों को अम्मा कैंटीन के बुनियादी ढांचे का नवीनीकरण और सुधार करने और लोगों को बढ़िया खाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
आलोचनाएं भी कम नहीं
अम्मा कैंटीन की आलोचना करने वाले अर्थशास्त्रियों का कहना रहा है कि ऐसी योजनाएं सरकारी खजाने पर भारी बोझ डालती हैं। कुछ लोगों ने यह भी तर्क दिया कि सरकार को सीधे रोजगार और आय बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए ना कि लगातार सब्सिडी आधारित योजनाओं पर।
लेकिन समर्थकों का तर्क बिल्कुल अलग है। उनके मुताबिक, जब शहरों में लाखों लोग रोजाना भोजन असुरक्षा से जूझते हों, तब सस्ता भोजन उपलब्ध कराना कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है।
सिर्फ कैंटीन नहीं, राजनीतिक ब्रांड
अम्मा कैंटीन को समझने के लिए इसे सिर्फ फूड स्कीम की तरह देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह तमिल राजनीति में व्यक्तित्व आधारित ब्रांडिंग का सबसे सफल उदाहरणों में से एक है।
जयललिता ने ‘अम्मा’ को एक भावनात्मक राजनीतिक पहचान में बदल दिया था – एक ऐसी नेता जो ‘मां’ की तरह जनता का ख्याल रखती है।
अम्मा कैंटीन उसी छवि का सबसे मजबूत प्रतीक बनी। आज भी चेन्नई की कई सड़कों पर सुबह-सुबह जब लोग एक रुपये की इडली लेकर खाते दिखाई देते हैं, तब यह सिर्फ भोजन नहीं होता। यह उस राजनीति की कहानी है जिसमें कल्याण और भावनात्मक जुड़ाव साथ-साथ चलते हैं।
