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जानें-समझें: बेरोजगारी के आंकड़े, किस राह में किस मोड़ पर

भारत के आर्थिक विकास की जब भी बात होती है तो इस बात पर जोर दिया जाता है कि भारत की जनसंख्या के 65 फीसद लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। भारत में हर साल करीब एक करोड़ युवा काम करने के योग्य हो जाते हैं। जब यह युवा शक्ति पैसे कमाना और खर्च करने लगती है तो विकास की दर में तेजी आती है और...

Author February 5, 2019 7:09 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव))

केंद्र सरकार के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) ने बेरोजगारी को लेकर सर्वे किया है। हाल में इसकी मसौदा रिपोर्ट का मजमून मीडिया में प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है कि देश में बेरोजगारी दर 2017-18 में 45 साल के उच्च स्तर यानी 6.1 फीसद पर पहुंच गई है। एनएसएसओ द्वारा किए जाने वाले पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के अनुसार, देश में बेरोजगारी की दर 1972-73 के बाद सबसे ऊंची है। साल 2011-12 में बेरोजगारी की दर 2.2 फीसद थी। इन आंकड़ों को लेकर बाद में नीति आयोग ने सरकार की तरफ से सफाई दी कि यह अंतिम रिपोर्ट नहीं है। अभी सर्वे के कई आंकड़ों का विश्लेषण किया जा रहा है। मार्च तक अंतिम रिपोर्ट सामने आने की संभावना है।

रिपोर्ट क्या कहती है: रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत में रोजगार की समस्या है। भारत में बेरोजगारी की दर 6.1 फ़ीसद है, जो कि साल 1972-73 के बाद से सबसे ज्यादा है। साल 2011-12 में ये दर केवल 2.2 फीसद थी। शहरी इलाकों में 15 से 29 साल के लोगों के बीच बेरोजगारी की दर अधिक है। इस उम्र को 18.7 फीसद मर्द और 27.2 फीसद महिलाएं नौकरी की तलाश में हैं। ग्रामीण इलाकों में 17.4 फीसद पुरुष और 13.6 फीसद महिलाएं बेरोजगार हैं।

सर्वे की जरूरत क्यों: भारत के आर्थिक विकास की जब भी बात होती है तो इस बात पर जोर दिया जाता है कि भारत की जनसंख्या के 65 फीसद लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। भारत में हर साल करीब एक करोड़ युवा काम करने के योग्य हो जाते हैं। जब यह युवा शक्ति पैसे कमाना और खर्च करने लगती है तो विकास की दर में तेजी आती है और गरीबी की रेखा का आंकड़ा घटता है। बेरोजगारी बढ़ने पर भारत को युवाओं की बड़ी संख्या होने के कारण जो भौगोलिक लाभ मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता।

सर्वे को किसकी मंजूरी जरूरी: राजग सरकार ने नवंबर 2016 में नोटबंदी का फैसला लिया था। नोटबंदी के बाद देश में बेरोजगारी को लेकर एनएसएसओ का यह पहला सर्वे सामने आया है। भारत के राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की मंजूरी के बाद सर्वे की रिपोर्ट को जारी किया जाना था। लेकिन इसे जारी नहीं किया जा रहा था। इसके विरोध में आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष मोहनन और सदस्य जेवी मीनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया। मोहनन का कहना है कि रोजगार पर एनएससी के आंकड़े जारी नहीं करने के विरोध में उन्होंने इस्तीफा दिया। इसपर सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने बयान में कहा कि सरकार न सिर्फ आयोग के लिए सम्मान रखती है, बल्कि उसके सुझावों को भी तरजीह देती है और उन पर उचित कदम उठाती है।

क्या कहना है नीति आयोग का: केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) पुराने योजना आयोग का हिस्सा था। अब नीति आयोग और एनएसएसओ पूरी तरह से अलग नहीं हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के मुताबिक, इसलिए रिपोर्ट पर मुहर अब नीति आयोग लगाएगा। सर्वे की अभी मसौदा रिपोर्ट तैयार की गई है। तिमाही आंकड़ों के आधार पर सरकार अपनी रोजगार रिपोर्ट मार्च में जारी करेगी। राजीव कुमार ने बेरोजगारी के साथ वृद्धि के दावे को भी खारिज किया। उन्होंने सवाल किया कि बिना रोजगार पैदा किए कैसे कोई देश औसतन सात फीसद की वृद्धि दर हासिल कर सकता है। गणना के तरीकों में कई बदलाव हुए हैं। कई और आंकड़ें शामिल किए जाने बाकी हैं।

बेरोजगार किसे माना गया: लेबर फोर्स सर्वे के तहत जो आंकड़े जमा किए गए हैं, उनमें भारत भर में बड़े और छोटे दोनों कारोबार से जुड़े लोग शामिल किए गए। इस तरह इनमें असंगठित क्षेत्र भी शामिल रहा। इस सर्वे में हर उस व्यक्ति को बेरोजगार माना गया, जो काम की तलाश में है। इसमें वे सारे लोग शामिल हैं, जो चाहे रोजगार एक्सचेंज के जरिए या अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, या सीधे मालिकों से नौकरी की तलाश में हैं।

क्या कहते हैं जानकार: सरकारें आंकड़े जुटाती हैं ताकि लोगों के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराया जा सके। बीते कुछ महीनों से यह महसूस हो रहा था कि सरकार हमारी बातों को गंभीरता से नहीं ले रही है और हमें अनदेखा किया जा रहा है। आयोग के हाल के फैसलों को भी लागू नहीं किया गया।
-पीसी मोहनन, इस्तीफा देने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के प्रमुख

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग एक शीर्ष संस्था है। इसकी स्वायत्तता बनी रहनी चाहिए। आयोग ही नहीं, हर जिम्मेदार संस्था को चाहिए कि वह राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणाली से आने वाले आंकड़ों की विश्वसनीयता को बनाए रखे, क्योंकि इस पर देश की नीतियां निर्भर करती हैं।
-प्रणब सेन, राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व अध्यक्ष

अगर बेरोजगारी बढ़ी होती तो देश की सात फीसदी की आर्थिक विकास दर नहीं होती। अलग विधि से नया सर्वेक्षण तैयार किया जा रहा है और यह तिमाही आधार पर किया जा रहा है। 2011-12 के आंकड़ों से तुलना करना सही नहीं होगा। मेरे विचार से गुणवत्तापूर्ण नौकरी का अभाव बड़ी समस्या है।
-अमिताभ कांत, सीईओ, नीति आयोग

क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) ने हाल में रोजगार पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें बताया गया है कि भारत में बेरोजगारी का स्तर पिछले साल की तुलना में इस साल एक स्तर ऊपर बढ़ गया है। 2017 में भारत में 1.83 मिलियन लोग बेरोजगार थे। 2018 में बेरोजगार लोगों की संख्या बढ़कर 1.86 मिलियन हो गई है। भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। भारत की 11 फीसदी आबादी लगभग 12 करोड़ लोग बेराजगार है। 2015 से अब तक सिर्फ एक लाख 35 हजार नए लोगों को ही नौकरी मिली है। रिपोर्ट के अनुसार हर रोज 550 नौकरियां खत्म हो रही हैं। स्वरोजगार के मौके घटे हैैं और नौकरियां कम हुई हैं।

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