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द्रविड़ को कप्तान पद से हटाना चाहते थे चैपल: तेंदुलकर

नयी दिल्ली: सचिन तेंदुलकर ने एक बड़ा खुलासा किया है कि भारत के तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल ने वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप 2007 से कुछ महीने पहले उन्हें राहुल द्रविड़ के स्थान पर भारतीय टीम की कप्तानी संभालने का सुझाव दिया था। आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान चैपल जब तेंदुलकर के निवास पर गये […]

Author November 4, 2014 13:15 pm

नयी दिल्ली: सचिन तेंदुलकर ने एक बड़ा खुलासा किया है कि भारत के तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल ने वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप 2007 से कुछ महीने पहले उन्हें राहुल द्रविड़ के स्थान पर भारतीय टीम की कप्तानी संभालने का सुझाव दिया था।

आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान चैपल जब तेंदुलकर के निवास पर गये तो उन्होंने कहा, ‘‘हम दोनों मिलकर वर्षों तक भारतीय क्रिकेट को नियंत्रित कर सकते हैं।’’ इस दौरान चैपल ने पेशकश की कि द्रविड़ से कप्तानी लेने में ‘‘वह मेरी मदद कर सकते हैं।’’ इस स्टार बल्लेबाज ने अपनी आत्मकथा ‘प्लेइंग इट माइ वे’ में यह खुलासा किया है जिसका गुरूवार को विमोचन होगा।

तेंदुलकर ने 2005 से 2007 के बीच राष्ट्रीय टीम के कोच रहे चैपल की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें ‘‘रिंगमास्टर’’ करार दिया जो खिलाड़ियों पर अपने विचार थोपता था और कभी इसकी परवाह नहीं करता था कि इससे खिलाड़ी सहज महसूस कर रहे हैं या नहीं।

द्रविड़ की जगह उन्हें कप्तान बनाने की कोच की कोशिश पर तेंदुलकर ने विस्तार से लिखा है, ‘‘विश्व कप से कुछ महीने पहले चैपल मेरे घर आये और सुझाव दिया कि मुझे राहुल द्रविड़ से कप्तानी ले लेनी चाहिए। ’’

उन्होंने लिखा है, ‘‘अंजलि  (तेंदुलकर की पत्नी) भी मेरे साथ बैठी थी और वह भी यह सुनकर हैरान थी कि ‘हम दोनों मिलकर वर्षों तक भारतीय क्रिकेट को नियंत्रित कर सकते हैं’’ और वह टीम की कप्तानी हासिल करने में मेरी मदद करेंगे। ’’

तेंदुलकर ने लिखा है, ‘‘मुझे हैरानी हुई कि कोच कप्तान के प्रति थोड़ा भी सम्मान नहीं दिखा रहा है जबकि क्रिकेट का सबसे बड़ा टूर्नामेंट कुछ महीनों बाद होना है। ’’

इस स्टार बल्लेबाज ने कहा कि उन्होंने चैपल का सुझाव सिरे से खारिज कर दिया। ‘‘वह दो घंटे तक रहे, मुझे मनाने की कोशिश करते रहे और आखिर में चले गये। ’’

चैपल के सुझाव से तेंदुलकर बहुत खफा हो गये थे। उन्होंने लिखा है कि इस घटना के कुछ दिन बाद, ‘‘मैंने बीसीसीआई को सुझाव दिया कि ग्रेग को भारत में रखना और उन्हें टीम के साथ विश्व कप में नहीं भेजना सर्वश्रेष्ठ विकल्प होगा। ’’

तेंदुलकर ने बोर्ड को सुझाव दिया कि सीनियर खिलाड़ी टीम पर नियंत्रण रख सकते हैं और टीम को एकजुट रख सकते हैं। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, ‘‘ऐसा नहीं हुआ और 2007 के अभियान का अंत भयावह हुआ। ’’ इस किताब के अंश इसके प्रकाशक हैचेट इंडिया ने विशेष तौर पर पीटीआई भाषा को उपलब्ध कराये हैं।

भारत का 2007 विश्व कप का अभियान बेहद निराशाजनक रहा। टीम केवल एक मैच बरमुडा के खिलाफ जीत पायी तथा बांग्लादेश और श्रीलंका से हार गयी थी।

चैपल को आड़े हाथों लेते हुए तेंदुलकर ने कहा कि विश्व कप में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन के लिये इस आस्ट्रेलियाई को बहुत अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी। उन्होंने लिखा है, ‘‘मुझे नहीं लगता कि मैं इससे बहुत दूर था जब मैं कहता कि अधिकतर खिलाड़ियों को लगता है कि चैपल के रहते हुए भारतीय क्रिकेट किसी भी दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा था। ’’

तेंदुलकर ने अपनी किताब में लिखा है कि चैपल सार्वजनिक तौर पर ‘‘हमारी प्रतिबद्धता पर सवाल उठा रहे थे और हमें नये सिरे से शुरूआत कराने के बजाय मामला और बिगाड़ रहे थे। ’’ तेंदुलकर के साथ यह किताब मशहूर खेल पत्रकार और इतिहासविद बोरिया मजूमदार ने लिखी है।

इस स्टार बल्लेबाज ने कहा कि कई सीनियर खिलाड़ी चैपल के जाने से राहत महसूस कर रहे थे, ‘‘इससे किसी को हैरानी नहीं हुई क्योंकि जो भी कारण रहा हो, वह उनके साथ सही तरह का बर्ताव नहीं करता था। ’’

तेंदुलकर ने सौरव गांगुली के प्रति कोच के रवैये का जिक्र किया जिसे उन्होंने ‘हैरान करने वाला’ करार दिया। उन्होंने कहा, ‘‘चैपल ने सबके सामने कहा था कि भले ही उन्हें सौरव की वजह से यह पद मिला हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह ताउम्र सौरव का पक्ष लेते रहेंगे। ’’

तेंदुलकर ने लिखा है, ‘‘ईमानदारी से कहें तो सौरव भारत के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों में एक है और उन्हें टीम का हिस्सा बनने के लिये चैपल के समर्थन की जरूरत नहीं थी। ’’

तेंदुलकर ने कहा कि चैपल सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करना चाहते थे।

उन्होंने लिखा है, ‘‘लगता था कि चैपल का इरादा सभी सीनियर खिलाड़ियों को बाहर करने का था और इस प्रक्रिया में टीम के सदभाव का नुकसान पहुंचाया। एक अवसर पर उन्होंने वीवीएस लक्ष्मण से कहा कि वह पारी की शुरूआत करने पर विचार करें। लक्ष्मण ने बड़ी शिष्टता से इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि उन्होंने अपने करियर के शुरूआती भाग में पारी की शुरूआत करने की कोशिश की थी क्योंकि तब वह असंमजस में था, लेकिन अब वह मध्यक्रम में जम चुका था और ग्रेग को मध्यक्रम के बल्लेबाज के रूप में उन पर विचार करना चाहिए था। ’’

तेंदुलकर ने लिखा, ‘‘ग्रेग के जवाब ने हम सभी को हतप्रभ कर दिया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि उसे सतर्क रहना चाहिए क्योंकि 32 साल की उम्र में वापसी करना आसान नहीं होता। ’’

इस दिग्गज बल्लेबाज ने लिखा है, ‘‘असल में मुझे बाद में पता चला कि ग्रेग ने बीसीसीआई से सीनियर खिलाड़ियों को हटाने के बारे में बात की थी। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने यह टीम को नया रूप देने की उम्मीद से किया था। ’’

इस 41 वर्षीय खिलाड़ी ने पूर्व आस्ट्रेलियाई कोच की अच्छे समय में चर्चा में बने रहने और बुरे दौर में खिलाड़ियों को मझधार में छोड़ने की आदत की भी आलोचना की।

तेंदुलकर ने लिखा है, ‘‘मुझे याद है कि जब भारतीय टीम जीत दर्ज करती, ग्रेग को होटल या टीम बस में टीम की अगुवाई करते हुए देखा जा सकता था लेकिन जब भी भारत हारता वह खिलाड़ियों को आगे कर देता था। जान : राइट : और गैरी : कर्स्टन : हमेशा बैकग्राउंड में रहना पसंद करते थे लेकिन ग्रेग को मीडिया में छाये रहना पसंद था। ’’

तेंदुलकर ने याद किया कि विश्व कप 2007 में पहले दौर में बाहर होने के बाद वे कितना निराश थे और तब वह कितने आहते हुए थे जब लोगों ने भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाये थे।

उन्होंने लिखा है, ‘‘जब हम भारत लौटे, तो मीडियाकर्मी मेरे साथ घर तक आये और जब मैंने सुना कि मेरे अपने लोग खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता पर संदेह कर रहे हैं तो इससे दुख हुआ। मीडिया को हमारी असफलता की आलोचना करने का पूरा अधिकार था लेकिन यह कहना कि हमारा ध्यान काम पर नहीं था, सही नहीं था। ’’

तेंदुलकर ने लिखा है, ‘‘हम प्रशंसकों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाये थे लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि हमें देशद्रोही कहा जाना चाहिए। कभी प्रतिक्रियाएं आश्चर्यजनक रूप से बेहद द्वेषपूर्ण होती थी और कुछ खिलाड़ी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। ’’

तेंदुलकर ने कहा कि विश्व कप 2007 की हार के बाद उनके दिमाग में संन्यास लेने का विचार आया लेकिन परिजनों और दोस्तों ने उन्हें बने रहने के लिये कहा।

उन्होंने लिखा, ‘‘एंडुलकर, जैसे शीर्ष बहुत आहत करने वाले थे। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 18 साल बिताने के बाद इस तरह की चीजों को सहन करना मुश्किल था और संन्यास का विचार मेरे दिमाग में आया था। मेरे परिवार और संजय नायक जैसे मित्रों ने मुझे खुश रखने के लिये अपनी तरफ से हर तरह की कोशिश की और एक सप्ताह बाद मैंने इसको लेकर कुछ करने का फैसला किया। मैंने दौड़ना शुरू किया। यह विश्व कप की यादों को दिमाग से निकालने की कोशिश थी। ’’

 

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