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शांतनु महाराज ने संन्यास के सम्मोहन में छोड़ दी थी नौकरी

इस्लामिक शिक्षण केंद्र दारुल उलूम और श्री तिरपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ जैसे धार्मिक स्थलों के रूप में विख्यात कस्बा देवबंद नगर में सिद्ध कुटी पर ध्यान एवं योग और आध्यात्मिक जगत की मशहूर भारतीय हस्ती स्वामी शांतनु जी महाराज तप साधना और गोसेवा पर्यावरण संवर्धन और गरीब और असहाय की सेवाश्रुता में दिन-रात सेवारत हैं।

Author Updated: February 24, 2021 3:52 AM
shantnau Jiशांतनु महाराज। फाइल फोटो।

सुरेंद्र सिंघल

शांतनु जी महाराज ऐसे विलक्षण संन्यासी और योगाचार्य हैं जो आर्य समाज और सनातन धर्म के बीच सेतु के अनूठे कार्य में लगे हुए हैं। उन्होंने 50 वर्ष पूर्व तब संन्यास ले लिया था और घर-परिवार छोड़ दिया था जब ओडिशा में राउरकेला स्टील प्लांट से उन्हें निर्माण और आर्किटेक्टर इंजीनियरिंग के पद की पेशकश हुई थीा।

परिवार के इकलौते पुत्र शांतनु जी ने एमटेक करने के बाद उनके किसान पिता गणेश्वर दास और माता जाहन्वी दास की इच्छा अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने शानदार करिअर बनाने की थी। लेकिन शांतनु दास भारतीय दर्शन और संन्यास के सम्मोहन के वशीभूत होने के कारण हमेशा के लिए घर छोड़कर तप और साधना की सोच रहे थे।

उन्होंने राउरकेला स्टील प्लांट में इंजीनियरिंग की नौकरी करने से पहले ही माता-पिता से अनुमति मांगी की कि वे संन्यास लेना चाहते हैं और साधना तपस्या के लिए जाना चाहते हैं। परिवार के लिए ये मुश्किल लम्हें थे। शांतनु दास के दृढ़संकल्प के सामने माता-पिता का प्यार और स्नेह प्रभाव शून्य रहा। शांतनु दास कई वर्षों विद्वानों धमार्चार्यों के संगत में रहने के बाद हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी में पहुंचे जहां उन्होंने नौ विषयों में आचार्य दो विषयों में एमए वेद विषय में पीएचडी की शिक्षा पूरी की।

उन्होंने ज्योतिषाचार्य आयुर्वेद चिकित्सा और संस्कृत विषयों में भी निपुणता हासिल की। उन्होंने आर्य समाज के धर्मग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया। उनके ऊपर आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती की शिक्षाओं का गहरा असर पड़ा। वे सनातन धर्म के साथ-साथ आर्य समाज धर्म में भी पारंगत हो गए।

ओडिशा के बलांगीर जिले के लोईसिंग्हा नगर में वहां के एक बड़े किसान गणेश्वर दास के यहां जन्मे परिवार में साधु-संतों व आध्यात्मिक शख्सियतों का आना-जाना था। जिनकी सेवा करते-करते शांतनु जी के मन में उनके जैसा ही बनने की ही प्रबल इच्छा जागृत हो गई। शांतनु जी महाराज का कहना है कि सत्संग बिना विवेक ना होए रामकृपा बिनु सुलभ ना सोए सतसुद रही सत्संगति पाई पारस परम कुधातू सुहाई।

वर्ष 2002 से स्वामी शांतनु जी महाराज देवबंद में सिद्ध कुटी पर अपना आश्रम बनाकर निरंतर अध्यात्म की साधना में लीन हैं। वह आसपास के क्षेत्रों और गांवों में लोगों के यहां यज्ञ कराते हैं। सनातन धर्म की शिक्षाओं के साथ-साथ हवन और यज्ञ करने पर भी बल देते हैं। स्वामी शांतनु जी महाराज योग कलाओं में निपुण होने के साथ-साथ आर्य समाज और सनातन धर्म के लिए सेतु का भी काम करते हैं।

आर्य समाज में निष्णात होने के कारण बहुत से सनातनधर्मी उनसे चिढ़ते हैं और खार भी खाते हैं। स्वामी जी के आश्रम में अनेक दूध देने वाली गाएं भी हैं जिनके दूध की आय से वह गऊओं के पालन में अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। जिस कुटी में स्वामी जी का प्रवास है वह पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत अनुकूल है।

स्वामी शांतनु जी महाराज प्रत्येक शनिवार को मौन व्रत धारण करते हैं। उनके जीवन की एक अहम बात यह भी है कि घर छोड़ने और संन्यासी बनने के करीब 50 साल बाद उनके माता-पिता का उनसे देवबंद में इसी कुटिया पर उनका मिलन हुआ। अपने माता-पिता के स्वास्थ्य की जानकारी लेने के लिए अब कभी-कभार शांतनु जी महाराज ओडीशा में अपने माता-पिता के पास चले जाते हैं। स्वामी शांतनु जी महाराज को भौतिक सुखों को त्यागने, घर-गृहस्थी ना बसाने और परिवार का त्याग करने का कोई भी मलाल नहीं है।

वह यहां आश्रम में नीचे जमीन पर ही सोते हैं। गऊ माताओं को स्वयं अपने हाथों चारा-पानी करते हैं। आसपास के परोपकारी दानी परोपकारी किसान स्वामी जी को गऊ माताओं के लिए एवं उनके यहां आने-जाने वालें साधु संतों के लिए और खुद स्वामी जी के लिए दयालुता के साथ अन्न और धन का दान करते हैं।

 

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