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जीवन और योग: संयम से समाधि का सफर है अष्टांग योग

"योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है!

Yogaसांकेतिक फोटो।

कमल वैष्णव

योग: सम भाव में बुद्धि को स्थिर करके सतत आत्मा का दर्शन करना ही योग है। योग के मुख्यत: आठ अंग होने से (1.यम (संयम) 2.नियम 3.आसन 4.प्राणायाम 5.प्रत्याहार 6.धारणा 7.ध्यान 8.समाधि। इसे अष्टांग योग कहा जाता है। जो योग मार्गी मनुष्य द्वारा यम अर्थात संयम से समाधि तक आठ आयाम वाला सफर है ।

‘श्रीमद भगवद्गीता’ में ‘योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण’ ने योग के तीन मार्ग कहे गए हैं…1.कर्म योग 2.भक्ति योग 3.ज्ञान योग।
मनुष्य सारे कर्म देह के ही उपभोग के लिए करता है, जबकि यह देह अपने से पृथक है, तो वह कर्म केवल बंधन के ही हेतु होते हैं। जिस प्रकार मिट्टी के घर को जल और मिट्टी से लिपते-पोतते हैं, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर भी अन्न रूप मृतिका और जल की सहायता से ही स्थिर रहता है।

यदि यह पंचभूतात्मक शरीर पांचभौतिक पदार्थों से पुष्ट होता है तो मनुष्य ने इसमें भोग ही क्या किया। यह जीव अनेक सहस्त्र जन्मों तक सांसारिक भोगों में पड़े रहने से उन्हीं की वासना रूपी धूलि से आच्छादित हो जाने के कारण केवल मोह रूपी श्रम को ही प्राप्त होता है।

जिस समय ज्ञानरूपी जल से उसकी वह धुली धुल जाती है, तब इस संसार पथ के पथिक का मोह रूपी श्रम शांत हो जाता है। तदोपरांत जीव स्वस्थ चित हो जाता है और निरतिशय एवं निर्बाध (निरंतर) परम निर्वाण (शून्य-शांत, समाधि) पद प्राप्त कर लेता है। यह ज्ञानमय निर्मल आत्मा निर्वाण स्वरूप ही है; दुख आदि जो अज्ञानमय जो धर्म है, वह प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं।

1-अविद्या(अज्ञान) से प्राप्त हुए क्लेश व दुखों को नष्ट करने वाला योग के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

2-योग की पराकाष्ठा जिसमें स्थित होकर ब्रह्म में लीन हुए मुनि जन फिर स्वरूप से च्युत नहीं होते, वही श्रेष्ठ योग कहलाता है।

3-साधना: जब साधक मन, बुद्धि, इन्द्रियों को साध कर चित को स्थिर कर लेता है और स्वयं का अनुसंधान करता है, वह साधना कहलाती है।

4-मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण केवल मन ही है, विषय का संग करने से वह बंधनकारी और विषयशून्य होने से मोक्षकारक होता है अत: विवेक ज्ञान संपन्न जीव अपने चित्त को विषयों से हटाकर मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्रह्म स्वरूप परमात्मा का चिंतन करें।

जिस प्रकार लोह चुंबक अपनी शक्ति से लोह कणों को खींच कर अपने में संयुक्त कर लेता है, उसी प्रकार धर्म चिंतन करने वाले जीव को परमात्मा स्वभाव से ही अपने स्वरूप में लीन कर लेता है। अपने प्रयत्न की अपेक्षा रखने वाली जो मन की विशिष्ट गति है, उसका ब्रह्म के साथ संयोग होना ही ‘योग’ कहलाता है। जिसका योग इस प्रकार के विशिष्ट धर्म से युक्त होता है वह मुमुक्षु योगी कहा जाता है।

5-योग साधना करने वाले जीव को चाहिए कि अपने चित को ब्रह्म चिंतन के योग्य बनाता हुआ ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का निष्कामभाव से सेवन करे।

6-संयत चित हुआ स्वाध्याय, शौच, संतोष और तप का आचरण करे । *मन को निरंतर परब्रह्म में लगाता रहे यह पाँच- पाँच यम और नियम बताए गए हैं इनका सकाम आचरण करने पर पृथक पृथक फल मिलते हैं और निष्काम भाव से सेवन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

7- प्राणायाम: योग का अभिन्न अंग है जिसमे जीव प्राणवायु को वश में करके शब्दादि विषयों में अनुरक्त अपने इंद्रियों को रोक कर अपने चित्त की अनुगामिनी बनाता है। इंद्रियों को वश में किए बिना कोई योगी योग साधना नहीं कर सकता इस प्रकार प्राणायाम से वायु और प्रत्याहार से इंद्रियों को वशीभूत करके चित्त को शुभ आश्रय में स्थित करें।

8-अष्टांग योग के वैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य के कल्याणार्थ अनेकों लाभ बताए गए हैं जैसे : योग मार्गी मनुष्य शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत होते हैं तथा चिंता, तनाव और अवसाद जैसे विकारों से मुक्त रहते हैं। योगाभ्यास से मनुष्य में शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के साथ आत्म विश्वास, आत्मबल भी बढ़ता है। आत्म विश्वास से परिपूर्ण व निरोगी मनुष्य सदेव प्रसन्नचित्त रहते हैं। योगी स्वभाव से शांत संतोष से युक्त तथा तन मन और बुद्धि से संतुलित होते हैं यह संतुलन ही जीवन में सुख आनंद का कारक होता है।

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