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जब महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में किसान आंदोलन से दहशत में आ गए थे अफ़सर और मंत्री, झुक गई थी सरकार

किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख चेहरों में से एक भारतीय़ किसान यूनियन (अराजनैतिक) के प्रवक्ता राकेश टिकैत भी हैं।

rakesh tikait, rakesh tikait net worth, rakesh tikait wiki, mahendra singh tikaitमहेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने गन्ने का रेट, फसलों का उचित मूल्य और बिजली बिल कम करने जैसी अपनी 35 सूत्रीय मांगों को लेकर राजधानी को घेर लिया

देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर डटे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अमल पर अस्थाई तौर पर रोक लगा दी है, इसके बावजूद किसान कानून की वापसी की मांग पर अड़े हैं। उनके आंदोलन को 55 दिन हो गए हैं। इस बीच किसान संगठनों और सरकार के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकल सका है।

किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख चेहरों में से एक भारतीय़ किसान यूनियन (अराजनैतिक) के प्रवक्ता राकेश टिकैत भी हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि जब तक कृषि कानून वापस नहीं होता है, तब तक वे अपने घर नहीं लौटेंगे।

आपको बता दें कि राकेश टिकैत के पिता और भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत भी किसानों के बड़े नेता रहे हैं। महेंद्र सिंह टिकैत की किसानों में ऐसी पैठ थी कि उनकी एक आवाज पर हजारों की तादाद में किसान जुट जाते थे। उन्हें किसानों का मसीहा भी कहा गया। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बहाने दिवंगत महेंद्र सिंह टिकैत की उस रैली का भी जिक्र किया जा रहा है, जब उनकी एक आवाज पर देश के 14 राज्यों के करीब 5 लाख किसानों ने दिल्ली कूच कर दिया था।

यह वाकया साल 1988 का है। महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने गन्ने का रेट, फसलों का उचित मूल्य और बिजली बिल कम करने जैसी अपनी 35 सूत्रीय मांगों को लेकर राजधानी को घेर लिया। विजय चौक, इंडिया गेट से लेकर बोट क्लब तक किसानों का जमावड़ा लग गया था। दूर-दूर तक केवल किसान ही दिखाई दे रहे थे। बैलगाड़ी और ट्रैक्टरों से दिल्ली को पूरी तरह से जाम कर दिया था। किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने फायरिंग कर दी थी। जिसमें दो किसानों की मौत हो गई।

इसी दौरान एक और घटना हुई। ठीक उसी वक्त बोट क्लब के नजदीक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के लिए मंच तैयार किया गया था। किसानों ने उस मंच को कब्जा लिया। किसानों के आक्रोश से मंत्री से लेकर अधिकारी तक हैरान हो गए थे। उनके चेहरे पर दहशत का आलम था। बाद में सरकार को किसानों की मांग के आगे झुकना पड़ा था।

बता दें कि मई 2011 में लंबी बीमारी के बाद चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो गया था। उनके निधन के बाद बड़े बेटे नरेश टिकैत को भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई और राकेश टिकैत इसके प्रवक्ता बने। हालांकि एक तरीके से राकेश ही BKU के ‘चेहरा’ हैं और तमाम किसान आंदोलनों में आगे नजर आते हैं। दिल्ली पुलिस की नौकरी छोड़ किसानों की लड़ाई का बीड़ा उठाने वाले राकेश टिकैत अब तक 40 से ज्यादा बार जेल जा चुके हैं।

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