अगर कोई माता-पिता अपने बच्चों की हर गतिविधियों पर नजर रखे, उनके फैसलों में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करे तो आप इस आदत को क्या कहेंगे। आज के समय में इस आदत को हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग नाम दिया गया है। इसका मतलब है ऐसी परवरिश, जिसमें माता-पिता का अपने बच्चों की जिंदगी में जरूरत से ज्यादा दखल देना। कुछ माता-पिता अपने बड़े हो चुके बच्चों की नौकरी और करियर में भी जरूरत से ज्यादा दखल देते हैं। वे बच्चों की नौकरी के लिए आवेदन करने, नेटवर्किंग करने और करियर से जुड़ी दूसरी चीजों में मदद करने के साथ-साथ कभी-कभी भर्ती करने वालों से खुद बात भी करते हैं। कुछ मामलों में तो वे नौकरी के इंटरव्यू में भी शामिल हो जाते हैं और काम की जगह पर बच्चों को परेशानी होने पर उनके लिए खुद बात करने लगते हैं।

क्या कहती है रिपोर्ट

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि माता-पिता की यह दखलंदाजी कितनी आगे तक जा सकती है। इस रिपोर्ट के अनुसार अलास्का के फेयरबैंक्स में एक स्टाफिंग कंपनी के COO स्टीवन क्लार्क ने बताया कि उन्हें एक 24 वर्षीय कर्मचारी को दो बार नौकरी से निकालने की स्थिति का सामना करना पड़ा। पहली बार उन्होंने कर्मचारी को नौकरी से निकालते हुए बताया कि नौकरी के पहले ही हफ्ते में वह कई बार देर से आया और कई बार काम पर आया ही नहीं था। इसके बाद उस कर्मचारी की मां ने क्लार्क को फोन किया और अपने बेटे को एक और मौका देने की बात कही। जब क्लार्क ने मना कर दिया तो बातचीत काफी तनावपूर्ण हो गई। क्लार्क ने कहा, “मैंने उनसे कहा, देखिए, यह मेरे और आपके बेटे के बीच की बात है। वह कर्मचारी है।”

किस हद तक माता-पिता अपने बच्चों की जिंदगी में दखल दे रहे

इस घटना का चलन ऐसे समय में बढ़ रहा है, जब जेन जी की संख्या काम करने वाले युवाओं की आबादी में लगभग पांचवां हिस्सा है। रिपोर्ट में करियर कोच जैस्मिन एस्केलेरा ने इस बदलाव को करियर में ‘सह-पायलटिंग’ बताया है। इसका मतलब है कि कुछ माता-पिता अब सिर्फ अपने बच्चों को नौकरी के इंटरव्यू तक छोड़ने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके करियर में सीधे तौर पर शामिल होने लगे हैं। कुछ माता-पिता अपने बच्चों की ओर से हायरिंग मैनेजर को फोन करना, नौकरी के लिए आवेदन करना और यहां तक कि मुश्किल बातचीत या नौकरी से जुड़े लाभों पर होने वाली जूम कॉल के दौरान भी मौजूद रहे। कुछ माता-पिता तो कैमरे के सामने नजर आए और कुछ कैमरे की नजर से दूर रहकर बातचीत सुनते रहे। क्लार्क का कहना है कि उन्हें ऐसे माता-पिता के फोन भी आए हैं, जिन्होंने पूछा कि उनके बच्चे को नौकरी क्यों नहीं मिली।

कितना सही है ये दखलअंदाजी

वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, माता-पिता की हर तरह की दखलअंदाजी को अनुचित नहीं माना जाता। कुछ माता-पिता का कहना है कि मौजूदा नौकरी का बाजार युवाओं के लिए काफी मुश्किल है। उनका कहना है कि वे तभी हस्तक्षेप करेंगे, जब उनका बच्चा सामाजिक घबराहट, किसी खराब बॉस या किसी तरह की अनुचित स्थिति का सामना कर रहा हो। इसके अलावा माता-पिता की जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी देने और लंबे समय से चली आ रही उस परंपरा के बीच भी एक अंतर है, जिसमें माता-पिता अपने बच्चों को सलाह देते हैं, सही लोगों से मिलवाते हैं और नौकरी के लिए संपर्क बनाने में मदद करते हैं।

भर्ती करने वाले विशेषज्ञों और HR प्रोफेशनल्स का कहना है कि समस्या सिर्फ माता-पिता के एक बार फोन करने की नहीं है। बार-बार माता-पिता का हस्तक्षेप इस बात का संकेत दे सकता है कि युवा कर्मचारी कार्यस्थल की समस्याओं को खुद संभालने में सक्षम नहीं है। वहीं, कंपनियों को यह चिंता भी रहती है कि नौकरी मिलने के बाद भी माता-पिता अपने बच्चे के काम में दखल देते रहेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, HR का कहना है कि इस तरह की दखलअंदाजी से शायद ही कभी कोई फायदा होता है।

अब इसपर यह सवाल उठता है कि बच्चों का साथ देने वाले माता-पिता और जरूरत से ज्यादा दखल देने वाले पैरेंट्स के बीच अंतर कहां से शुरू होता है। क्या किसी बड़े हो चुके बच्चे की पेशेवर जिंदगी को आसान बनाने के लिए बार-बार हस्तक्षेप करना आखिरकार उसे वह आत्मविश्वास और जरूरी कौशल विकसित करने से रोक सकता है, जिनकी मदद से वह अपने करियर की चुनौतियों का सामना खुद कर सके।

जब बड़े हो चुके बच्चे नौकरी करने लगते हैं, तो माता-पिता उनके कामकाजी जीवन से पीछे हटने में क्यों इतनी मुश्किल महसूस करते हैं।

माहौल हो सकता है वजह

इस पर इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने द कल्चर थिंग की ऑर्गनाइजेशनल साइकोलॉजिस्ट गुरलीन बरुआ से बातचीत की तो उन्होंने बताया, “माता-पिता, खासकर वे बड़े मिलेनियल्स, जिनके बच्चे अब नौकरी की शुरुआत कर रहे हैं, कई बार यह समझने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं कि उनका बच्चा अब बड़ा हो चुका है। हालांकि, इसे सभी माता-पिता पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन इसमें एक पीढ़ीगत में बदलाव जरूर देखने को मिल रहा है। कई मिलेनियल माता-पिता खुद ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं, जहां उन पर ज्यादा नियंत्रण रखा जाता था या उनकी आलोचना की जाती थी। इसलिए वे अपने बच्चों की जिंदगी में भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा शामिल हो गए हैं और कई बार ऐसे माता-पिता बन जाते हैं, जिन्हें हम ‘हेलिकॉप्टर पैरेंट्स’ कहते हैं।”

वह आगे बताती हैं कि कई बार माता-पिता अपने बच्चों के जरिए अपनी जिंदगी भी जीने लगते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चों को उन मुश्किलों का सामना न करना पड़े, जिनसे वे खुद गुजर चुके हैं। “आमतौर पर इसके पीछे प्यार और सुरक्षा की भावना होती है। माता-पिता अपने बच्चों को तकलीफ से बचाना और उनकी समस्याएं खुद हल करना चाहते हैं। लेकिन जब बड़े हो चुके बच्चे को इन चुनौतियों का खुद सामना करने, उन्हें हल करने और उनसे सीखने का मौका नहीं मिलता, तो यह तरीका नुकसानदायक हो सकता है।”

क्या पड़ता है प्रभाव

जरूरत से ज्यादा माता-पिता की दखलअंदाजी बड़े हो चुके बच्चों के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को कैसे प्रभावित कर सकती है।
बरुआ बताती हैं कि आखिरकार माता-पिता की जिम्मेदारी बच्चे को एक ऐसा स्वतंत्र व्यक्ति बनाना है, जो दुनिया में आत्मविश्वास के साथ अपनी जिंदगी जी सके। अगर माता-पिता बार-बार अपने बड़े हो चुके बच्चे की ओर से फैसले लेते हैं, उसकी समस्याएं खुद हल करते हैं या उसके मामलों में दखल देते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चे में दूसरों पर निर्भर रहने की आदत विकसित हो सकती है। बच्चा मुश्किल परिस्थितियों को खुद संभालने की अपनी क्षमता पर शक करने लग सकता है।

बरुआ बताती हैं, “यह वैसा ही अंतर है, जैसे किसी को मछली पकड़ना सिखाने और हर बार उसके भूखे होने पर उसे मछली देने में होता है। संघर्ष, गलतियां और यहां तक कि असफलताएं भी भावनात्मक रूप से परिपक्व होने और समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करने के लिए जरूरी हैं। अगर कोई दूसरा व्यक्ति लगातार इन अनुभवों से बचाता है, तो उस व्यक्ति के लिए अपनी पेशेवर पहचान और मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता विकसित करना कठिन हो सकता है। अच्छी परवरिश का मतलब यह समझना भी है कि कब पीछे हटना चाहिए और व्यक्ति को अपने फैसलों के नतीजों का सामना खुद करने देना चाहिए।”

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