लोग सोने-चांदी के साथ डायमंड के भी गहने खरीदते हैं। अंगूठी, नेकलेस, चोकर, इयररिंग्स, पेंडेंट और मंगलसूत्र जैसे डायमंड के गहने पहने जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या लैब-ग्रोन डायमंड खरीदने में आती है। क्योंकि, काफी लोगों को समझ ही नहीं आता कि खरीदते वक्त किन बातों को ध्यान रखना चाहिए। अक्सर कैरेट, क्लैरिटी, कट VVS, VS और फ्लोरेसेंस जैसे शब्द कई बार उलझन में डाल देते हैं। ऐसा तब होता है जब दो डायमंड दिखने में तो एक जैसे लगते हैं लेकिन इनकी कीमत में काफी अंतर होते हैं। हालांकि, कुछ तरीके हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए आप सही डायमंड खरीद सकते हैं।
डायमंड को लेकर कुछ ऐसे जरूरी शब्द हैं जिन्हें समझना जरूरी होता है। साथ ही, डायमंड की ग्रेडिंग रिपोर्ट में दी गई जानकारी को ध्यान में रखकर भी ज्वेलर से सवाल पूछ सकते हैं। DiAI डिजाइन्स की फाउंडर दिशा शाह से इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने बात की तो उन्होंने पहली बार लैब-ग्रोन डायमंड खरीदने वालों को कुछ बातें ध्यान में रखने की सलाह दी।
सिर्फ आकार के आधार पर न करें चुनाव
कैरेट डायमंड के वजन को बताता है। आमतौर पर ज्यादा कैरेट मतलब बड़ा डायमंड, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वह डायमंड ज्यादा अच्छी क्वालिटी का हो। दिशा शाह के अनुसार, डायमंड खरीदते समय बड़ा पत्थर चुनने के बजाय उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी होता है। वह सलाह देती हैं कि डायमंड की क्लैरिटी VVS यानी वैरी-वैरी स्लाइटली इंक्लूडेड से VS वैरी स्लाइटली इंक्लूडेड के बीच होनी चाहिए। लैब-ग्रोन डायमंड के मामले में VS से नीचे की क्लैरिटी चुनने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि माइन किए गए डायमंड की तुलना में लैब-ग्रोन डायमंड आसानी से उपलब्ध हैं। VVS और VS डायमंड की क्लैरिटी को दर्शाते हैं। इसका मतलब हुआ डायमंड के अंदर या उसकी सतह पर कितने छोटे दाग या खामियां मौजूद हैं।
फ्लोरेसेंस क्या है
दिशा शाह फ्लोरेसेंस पर भी ध्यान देने की सलाह देती हैं। इसका मतलब है कि अल्ट्रावायलेट (UV) रोशनी पड़ने पर डायमंड किस तरह प्रतिक्रिया करता है। इसके अलावा, यह भी जरूर देखें कि डायमंड में काला, हरा या दूधिया रंग तो नहीं दिख रहा है। अलग-अलग तरह की रोशनी में ये रंग डायमंड की चमक और उसके लुक को प्रभावित कर सकते हैं। वह कहती हैं कि ऐसे ज्वेलर से डायमंड खरीदें जो आपकी पसंद और जरूरत के हिसाब से अलग-अलग पत्थर दिखाने और आपके लिए सही डायमंड चुनने में मदद करे, न कि केवल वही डायमंड दिखाए जो पहले से उसके स्टॉक में मौजूद है।
डायमंड ग्रेडिंग रिपोर्ट क्या होती है
डायमंड ग्रेडिंग रिपोर्ट को उस पत्थर की रिपोर्ट कार्ड की तरह समझा जा सकता है। इसमें डायमंड से जुड़ी जरूरी जानकारी दी जाती है, जिससे खरीदार को यह समझने में आसानी हो कि वह क्या खरीद रहा है। खरीदार को ग्रेडिंग रिपोर्ट में कैरेट वजन, रंग, क्लैरिटी, कट और फ्लोरेसेंस जैसी जानकारी जरूर देखनी चाहिए।
डायमंड एक्सपर्ट के मुताबिक, रिपोर्ट में यह साफ तौर पर लिखा होना चाहिए कि डायमंड लैब-ग्रोन है। साथ ही, इसमें डायमंड को तैयार करने की ग्रोथ मेथड यानी उसे किस तरीके से बनाया गया है और ग्रेडिंग लैब ने अगर किसी पोस्ट-ग्रोथ ट्रीटमेंट की जानकारी दी है, तो उसका भी उल्लेख होना चाहिए। हालांकि, केवल ग्रेडिंग रिपोर्ट देखकर यह पूरी तरह पता नहीं लगाया जा सकता है कि कोई खास डायमंड आंखों को कैसे दिखाई देगा। कागज पर एक जैसी जानकारी वाले दो डायमंड असल में देखने पर अलग लग सकते हैं। ऐसा खासकर उनके कट और पॉलिश में अंतर के कारण हो सकता है।
लैब-ग्रोन डायमंड सस्ते क्यों होते हैं
लैब-ग्रोन और माइन किए गए डायमंड की तुलना करते समय सबसे पहले लोगों का ध्यान कीमत पर जाता है। दिशा शाह कहती हैं कि इसकी वजह दोनों तरह के डायमंड को तैयार करने का तरीका है। माइन किए गए डायमंड को धरती से निकालने में काफी लागत आती है। साथ ही यह एक प्राकृतिक और सीमित संसाधन है, जिसकी उपलब्धता को मांग के हिसाब से तुरंत बढ़ाया नहीं जा सकता। वहीं, लैब-ग्रोन डायमंड को एक नियंत्रित वातावरण में तैयार किया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता को जरूरत के अनुसार बढ़ाया जा सकता है।
जैसे-जैसे इस क्षेत्र की तकनीक और उत्पादन क्षमता बेहतर हुई है, लैब-ग्रोन डायमंड की कीमत भी लोगों के लिए अधिक किफायती होती गई। इसलिए लैब-ग्रोन डायमंड की कम कीमत का संबंध उसकी उत्पत्ति के तरीके, उपलब्धता और उत्पादन प्रक्रिया से है। हालांकि, कम कीमत का मतलब यह नहीं है कि लैब-ग्रोन डायमंड नकली या सिर्फ दिखावटी डायमंड है।
एक ही कैरेट के दो डायमंड की कीमत अलग-अलग क्यों
दिशा शाह के अनुसार, कैरेट डायमंड की पूरी गुणवत्ता बनाने वाला सिर्फ एक पहलू है। दो डायमंड का वजन एक जैसा हो सकता है, लेकिन उनके रंग, क्लैरिटी, कट या फ्लोरेसेंस में अंतर हो सकता है। कट का मतलब है कि डायमंड को किस तरह आकार दिया गया है और उसे कितनी अच्छी तरह पॉलिश किया गया है। लगभग एक जैसी जानकारी वाले दो डायमंड भी रोशनी में अलग दिखाई दे सकते हैं। इसका कारण उनके कट और पॉलिश में मामूली अंतर हो सकता है, जिससे दोनों की चमक और रोशनी को पकड़ने की क्षमता अलग हो जाती है। इसलिए दो डायमंड की तुलना केवल कैरेट के आधार पर नहीं करनी चाहिए। अगर संभव हो, तो दोनों डायमंड को एक साथ रखकर देखें और उनकी चमक, लुक और रोशनी में उनकी प्रतिक्रिया की तुलना करें।
क्या लैब-ग्रोन डायमंड को दोबारा बेच सकते हैं
दिशा शाह कहती हैं, डायमंड ज्वेलरी को निवेश के बजाए ऐसी चीज समझें, जिसे आप पहनें और पसंद करें। लैब-ग्रोन डायमंड का बाजार तेजी से बदल रहा है। दुनियाभर में इसका उत्पादन बढ़ने के साथ इसकी कीमतों में भी बदलाव आया है। इसलिए डायमंड खरीदने से पहले ज्वेलर की एक्सचेंज, बायबैक और अपग्रेड पॉलिसी जरूर देख लें। डायमंड की ग्रेडिंग रिपोर्ट और खरीद की रसीद संभालकर रखना चाहिए। आगे चलकर डायमंड को एक्सचेंज या दोबारा बेचते समय इन दोनों की जरूरत पड़ सकती है।
खरीदने से पहले ज्वेलर से क्या पूछें
हीरा खरीदते वक्त कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए। दिशा के अनुसार, अगर कोई ज्वेलर विश्वसनीय ग्रेडिंग रिपोर्ट नहीं देता, डायमंड के लैब-ग्रोन होने की जानकारी साफ तौर पर नहीं बताता या रिपोर्ट की जानकारी खुद जांचने नहीं देता, तो ऐसे दुकान से डायमंड खरीदने से बचना चाहिए। अगर ज्वेलर की एक्सचेंज और रिटर्न पॉलिसी साफ नहीं है, तो भी पहले पूरी जानकारी लें। इसके अलावा, अगर आपसे डायमंड को खुद देखने या अलग-अलग डायमंड की तुलना करने का मौका दिए बिना खरीदारी के लिए दबाव बनाया जा रहा है, तो भी हीरा खरीदने से बचना चाहिए।
दिशा शाह सलाह देती हैं कि खरीदारी करने से पहले यह जरूर पूछें कि बताई गई कीमत में क्या-क्या शामिल है। क्योंकि डायमंड की जो कीमत विज्ञापन में दिखाई जाती है, जरूरी नहीं कि आखिर में आपको उतनी ही रकम चुकानी पड़े।
कीमत के अलावा बिल में और क्या जुड़ सकता है
तैयार डायमंड ज्वेलरी में सिर्फ हीरा और उसका कैरेट वजन ही कीमत का हिस्सा नहीं होता। बिल में धातु की कीमत, ज्वेलरी बनाने का खर्च, डायमंड को जोड़ने का खर्च और लागू टैक्स भी शामिल हो सकता है। इसी वजह से एक ही कैरेट वजन वाले दो डायमंड की कीमत में काफी अंतर हो सकता है। दोनों के रंग, क्लैरिटी, कट, फ्लोरेसेंस और पॉलिश में अंतर होने पर उनकी कीमत भी अलग हो सकती है। ये खर्च जरूरी नहीं कि छिपे हुए हों, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना आसान होता है। खासकर तब, जब खरीदार केवल विज्ञापन में बताई गई डायमंड की कीमत की तुलना कर रहे हों तब।
हीरा खरीदते वक्त यह भी जांच करना चाहिए कि ज्वेलरी की साइज बदलने (रीसाइजिंग), मरम्मत या भविष्य में एक्सचेंज की सुविधा कीमत में शामिल है या इसके लिए अलग से पैसे देने होंगे। अगर ज्वेलर आपको ऐसा स्पष्ट कोटेशन देता है, जिसमें हर खर्च को अलग-अलग बताया गया हो, तो दो ज्वेलरी पीस की तुलना करना और यह समझना आसान हो जाता है कि आप वास्तव में किस चीज के लिए कितने पैसे दे रहे हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और इंडियन एक्सप्रेस द्वारा विशेषज्ञों से बातचीत करने पर मिली जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।
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