भारत में कई ऐसे शहर और कस्बे हैं जो अपनी अनोखी पहचान के लिए जाने जाते हैं। तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले में स्थित ‘उथुकुली’ भी ऐसा ही एक छोटा सा शहर है, जिसने अपने खास मक्खन की बदौलत देशभर में पहचान बनाई है। भले ही यह जगह आम पर्यटकों की सूची में शामिल न हो, लेकिन यहां बनने वाला ‘उथुकुली वेन्नै’ (उथुकुली बटर) दक्षिण भारत में काफी लोकप्रिय है। इसकी खासियत को देखते हुए वर्ष 2024 में इसे जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI Tag) भी प्रदान किया गया।
क्यों खास है उथुकुली का मक्खन?
उथुकुली का मक्खन अपनी मलाईदार बनावट, हल्के खट्टे स्वाद और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता के लिए जाना जाता है। इसकी गुणवत्ता का मुख्य कारण स्थानीय भैंसों का दूध और पारंपरिक तरीके से की जाने वाली मथनी प्रक्रिया है। पीढ़ियों से यहां के परिवार मक्खन बनाने की इस कला को संजोए हुए हैं, जिससे इसका असली स्वाद और पहचान आज भी बरकरार है।
रेलवे ने बदली शहर की किस्मत
उथुकुली में मक्खन उद्योग का विकास 1930 के दशक में शुरू हुआ। उस समय रेलवे के आगमन ने इस छोटे से कस्बे को बड़े बाजारों से जोड़ दिया। यहां आने-जाने वाले व्यापारियों ने स्थानीय दही, छाछ और मक्खन की गुणवत्ता को पहचाना और धीरे-धीरे इसका व्यापार तमिलनाडु से लेकर केरल और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों तक फैल गया।
स्थानीय जलवायु का भी है बड़ा योगदान
उथुकुली शुष्क क्षेत्र में स्थित है। यहां पाली जाने वाली भैंसें सूखा सहने वाली घास और ज्वार के भूसे पर निर्भर रहती हैं। इस स्पेशल डाइट के कारण उनके दूध में वसा की मात्रा अधिक होती है, जिससे बनने वाला मक्खन सामान्य कमर्शियल मक्खन की तुलना में अधिक गाढ़ा और स्वादिष्ट होता है।
परंपरा से जुड़ा है मक्खन निर्माण
उथुकुली में मक्खन बनाना सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है। आज भी कई परिवार और छोटे डेयरी प्रोड्यूसर ट्रेडिशनल तरीकों से हाथों से मक्खन तैयार करते हैं। आधुनिक तकनीकों के दौर में भी यह ट्रेडिशनल प्रोसेस यहां की पहचान बनी हुई है।
ग्रामीण सौंदर्य का अनुभव
तिरुप्पुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित उथुकुली, इंडस्ट्रियल एक्टिविटीज से भरे शहरों के मुकाबले शांत और ग्रामीण वातावरण प्रदान करता है। यहां आने वाले लोग तमिलनाडु के ग्रामीण जीवन, एग्रीकल्चरल ट्रेडिशन्स और स्थानीय संस्कृति की झलक देख सकते हैं।
चुनौतियों का सामना कर रहा है उद्योग
बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते क्लोदिंग इंडस्ट्री के कारण कई परिवार अब पशुपालन और मक्खन उत्पादन से दूर हो रहे हैं। ऐसे में GI टैग उथुकुली के मक्खन की विरासत को संरक्षित करने और स्थानीय लोगों की आजीविका को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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