चाय का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। समय के साथ चाय बनाने की प्रक्रिया भी बदलती रही। शुरुआत में चाय का इस्तेमाल औषधीय के रूप में किया जाता था। धीरे-धीरे यह लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन गई। हालांकि, आयुर्वेद आज भी कई समस्याओं में इसका इस्तेमाल औषधीय के रूप में करता है। वर्तमान समय में भारत में सबसे अधिक दूध की चाय लोग पीना पसंद करते हैं। इसके बाद ग्रीन टी, काली चाय और अन्य कई तरह की चाय पी जाती है। लेकिन एक जगह ऐसा है जो ‘सेवन लेयर टी’ के लिए मशहूर है। एक ही ग्लास में सात रंग नजर आते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आप आसमान में इंद्रधनुष को देखते हैं। आइए जानते हैं इस सतरंगी चाय के बारे में और कैसे बनाई जाती है:
यहां बनती है सात रंगों वाली चाय (Seven Layer Tea)
दरअसल, सात रंगों वाली चाय की जड़ें बांग्लादेश से जुड़ी हुई हैं। यहां पर श्रीमंगल नामक एक जगह है जिसे ‘टी कैपिटल ऑफ बांग्लादेश’ भी कहा जाता है। यह इलाका चाय के बागानों, घने पेड़ और झीलों के लिए मशहूर है। पर्यटकों को यहां की प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही सेवन लेयर टी भी अपनी ओर आकर्षित करती है।
किसने की थी शुरुआत
visit-bangladesh वेबसाइट के अनुसार इस अनोखी चाय की शुरुआत रोमेश राम गौर ने की थी, जो श्रीमंगल के पास रामनगर गांव में एक चाय की दुकान चलाते थे। सन् 2000 की शुरुआत में उन्होंने अलग-अलग प्रकार की चाय की पत्तियों और मसालों का इस्तेमाल करना शुरू किया। उनका उद्देश्य था कि एक ही ग्लास में अलग-अलग रंग की चाय की परतों को बिना मिलाए कैसे जमाया जाए और इनका स्वाद भी अलग हो। हालांकि, यह इतना आसान नहीं था।
दुनियाभर में है मशहूर
इस चाय को बनाने से पहले वह कई बार असफल हुए। जब वह अपने हुनर में कामयाब हुए तो एक ग्लास में एक ग्लास में चाय की सात परत, हर का रंग, स्वाद और खुशबू भी अलग था। धीरे-धीरे उनके इस हुनर की चर्चा होनी शुरू हो गई। फिर ब्लॉगर्स, स्थानीय लोग और पर्यटकों के बीच यह चाय इतनी लोकप्रिय हो गई कि दुनियाभर में इसका नाम लिया जाने लगा। आज जो भी श्रीमंगल आता वह चाय का स्वाद जरूर चखता है
इस्तेमाल की जाने वाली चीजें
पहली परत
इसकी सबसे ऊपरी परत काली चाय की होती है।
दूसरी परत
दूसरी परत ग्रीन टी की होती है जो हल्की और ताजगी भरी होती है।
तीसरी परत
तीसरी परत नींबू की होती है जिसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है।
चौथी परत
चौथी परत मसाला चाय की होती है जिसमें दालचीनी, लौंग और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है।
पांचवी परत
इसमें दूध डाला जाता है जिसका स्वाद मीठा और क्रीमी होता है।
छठवीं परत
छठवीं परत शहद की होती है जिसमें हल्की मिठास होती है।
सातवीं परत
सातवीं परत भुनी या स्मोकी चाय की होती है जिसकी खुशबू गहरी होती है।
कैसे बनती है
हर प्रकार की चाय को अलग रंग देना एक कला है। इसे अलग-अलग, सही मात्रा और समय के साथ उबाला जाता है। सबसे भारी और गाढ़ी चाय (मीठी दूध वाली) ग्लास में सबसे पहले डाली जाती है। फिर चम्मच के पिछले हिस्से की मदद से हल्की चाय को धीरे-धीरे ऊपर डाला जाता है, ताकि परतें आपस में न मिलें। इस तरह एक ग्लास में गहरे भूरे से लेकर सुनहरे और हरे रंग तक की परतें बन जाती हैं।
स्वाद
इन सातों परतों का स्वाद अलग-अलग होता है। एक ही ग्लास में मीठा, कड़वा, मसालेदार और खट्टा स्वाद एक साथ महसूस होता है। हालांकि, अब सात परतों वाली चाय श्रीमंगल के साथ ही अन्य कई जगह पर भी मिलती है। समय के साथ लोगों ने इसमें और भी प्रयोग किए। visit-bangladesh. के अनुसार अब बांग्लादेश में कई जगह पर यह चाय आठ से दस परतों में भी मिलती है। लेकिन सबसे मशहूर सात परतों वाली ही चाय है।
सात रंग चाय केवल स्वाद नहीं बल्कि एक कला है। वर्तमान समय में सेवन लेयर टी केवल एक पेय नहीं बल्कि श्रीमंगल इलाके की पहचान बन चुकी है। यह चाय नेशनल ज्योग्राफिक चैनल पर भी दिखाई जा चुकी है।
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