भारत में कपड़ों का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है और यह देश की संस्कृति, परंपराओं और शिल्पकला से गहराई से जुड़ा हुआ है। समय के साथ जिस तरह हर चीज का विकास हुआ उसी तरह परिधानों पर भी तरह-तरह के बदलाव हुए। शानदार कारीगरी के चलते कई कपड़ों को विशेष पहचान मिली। भारत में वस्त्रों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता (इंडस वैली सिविलाइजेशन) से शुरू होता है। पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि उस समय लोग कपास के बने कपड़े पहनते थे। आज भी कई ऐतिहासिक मूर्तियों और मुहरों में पुरुषों और महिलाओं को साधारण लपेटकर पहने जाने वाले कपड़ों का साक्ष्य देखने को मिल सकता है।
राजघरानों की शान रही है पश्मीना
जयपुर की प्रसिद्ध मीनाकरी, अध्यात्मिक नगरी वाराणसी की बनारसी साड़ी व जरी के काम, बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कच्छ की कढ़ाई व अजरख प्रिंट, तमिलनाडु की कांचीपुरम, मद्रास की रेशमी साड़ियों से लेकर जम्मू कश्मीर की पश्मीना शॉल जैसी हस्तकलाएं आज दुनिया भर में विशेष स्थान रखती हैं। जम्मू कश्मीर की पश्मीना शॉल राजघरानों और नवाबों की शान रही है। हिमालय की ऊंची पहाड़ियों से दुनिया तक पहुंचने वाली इस पश्मीना शॉल की बेहद ही दिलचस्प कहानी है। आइए जानते हैं:
दुनिया के बेहतरीन मुलायम ऊनी कपड़ों में से एक
पश्मीना दुनिया के सबसे बेहतरीन और मुलायम ऊनी कपड़ों में गिना जाता है। यह केवल शॉल या स्टोल ही नहीं, बल्कि सदियों से शाही ठाठ-बाट, बेहतरीन कारीगरी और हिमालयी संस्कृति का प्रतीक रहा है। राजाओं, महाराजाओं, नवाबों और विदेशी शासकों की यह पहली पसंद हुआ करता था। आज भी असली पश्मीना अपनी बारीक बुनाई, हल्के वजन और बेहतरीन गर्माहट के कारण दुनियाभर में खास माना जाता है।
किस जानवर के बाल से बनता है पश्मीना शॉल
ज्यादातर ऊनी कपड़े भेड़ के बालों से बनाए जाते हैं, लेकिन पश्मीना शॉल किसी और जानवर के बालों से बनाई जाती है। दरअसल, यह चांगथांगी या पश्मीना बकरी के बालों से बनाए जाते हैं। ये बकरियां लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र और समुद्र तल से लगभग 12,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई वाले बेहद ठंडे इलाकों में पाई जाती हैं। सर्दियों में यहां का तापमान कई बार -30 से -40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी कड़ाके की ठंड से बचने के लिए इन बकरियों के शरीर पर अंदर की ओर बेहद मुलायम और महीन रेशों की एक परत विकसित होती है, जिसे प्राकृतिक रेशा पश्मीना कहा जाता है। बकरियां गर्मियों के मौसम में बाल छोड़ती हैं, इस दौरान कंघी करके उनके बालों को इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद इन्हें साफ किया जाता है, फिर छटाई, कताई और हाथ से बुनाई की लंबी प्रक्रिया शुरू होती है।
कश्मीरी बुनकरों ने दिलाई विशेष पहचान
पश्मीना ऊन भले ही लद्दाख में मिलती है, लेकिन इसे असली पहचान कश्मीरी बुनकरों ने दिलाई। कश्मीरी बुनकर लद्दाख से कश्मीर ऊन लाते थे, जहां कारीगर इसे हाथ से कतरकर बेहद महीन धागे बनाते थे। इसके बाद इसे शॉल का आकार दिया जाता है। एक असली पश्मीनी शॉल को बनाने में कई सप्ताह या महीने लग जाते हैं।
मुगल से ब्रिटिशर्स तक की रही फेवरेट
माना जाता है कि मुगल काल में राजाओं और नवाबों के दरबारों में पश्मीना परिधान का विशेष स्थान रहा है। उसके बाद जब ब्रिटिश भारत आए तो उनके शासन के दौरान व्यापार के माध्यम से पश्मीना यूरोप पहुंची और फिर धीरे-धीरे इसकी खासियत के बारे पूरी दुनिया को पता चला। पश्मीना का रेशा बेहद हल्का होता है और गर्म रखने में काफी प्रभावी है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने के बाद भी इसकी गुणवत्ता बनी रहती है।
कब मिली लोकप्रियता
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार 19वीं शताब्दी की शुरुआत में कश्मीरी पश्मीना शॉल को सबसे अधिक लोकप्रियता मिली। इस दौरान इंग्लैंड, फ्रांस और स्कॉटलैंड के पैस्ले शहर में भी कश्मीर की शॉल की नकल करके वैसी ही शॉल बनाने लगे।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार पश्मीना बकरी के शरीर पर दो तरह के बाल होते हैं। बाहरी परत मोटे और लंबे बालों की होती है, जो लगभग4 से 20 सेंटिमीटर लंबी होती है। यह बकरी को बाहरी मौसम से बचाती है। अंदरूनी परत बहुत महीन, मुलायम और गर्म रखने वाले रेशों की होती है, जो असली पश्मीना कहलाती है। इसकी लंबाई लगभग 2.5 से 9 सेंटीमीटर होती है।
एक बकरी से कितना निकलता है पश्मीना
एक बकरी से सालभर में केवल कुछ ग्राम से लेकर लगभग 500 ग्राम तक ही पश्मीना मिलता है। एक पश्मीना स्वेटर बनाने के लिए लगभग 4 से 6 बकरियों का ऊन लगता है। वहीं, ओवरकोट तैयार करने में 30 से 40 बकरियों का ऊन इस्तेमाल हो सकता है।
कैसे तैयार होता है
रेशों को इकट्ठा करने के बाद उनमें मौजूद धूल, चिकनाई और घास-फूस जैसी चीजों को साफ किया जाता है। इसके बाद मशीनों की मदद से मोटे बालों को अलग किया जाता है। यह प्रक्रिया सुनने में जितनी आसान लग रही है, इसकी प्रक्रिया उतनी ही कठिन होती है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लगभग 50 प्रतिशत रेशा कम हो जाता है। ऐसे में जितना कच्चा पश्मीना मिलता है, उसका केवल आधा हिस्सा ही इस्तेमाल के लिए बच पाता है। यही वजह है कि इसकी कीमत काफी अधिक होती है।
आज के समय में पश्मीना की मदद से सिर्फ शॉल ही नहीं बल्कि कोट, सूट, ड्रेस, स्वेटर, मफलर और स्टोल जैसे परिधान भी बनाए जाते हैं।
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