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अंग्रेज प्रोफेसर की एक गलती जिसने सुभाष चंद्र बोस को बना दिया था क्रांतिकारी, पढ़िए दिलचस्प किस्सा

1916 में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भारतीयों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी के बाद एक ब्रिटिश प्रोफेसर के साथ धक्कामुक्की हुई जिसके लिए सुभाष चंद्र को भी भुगतना पड़ा था। आइये पढ़ते हैं दिलचस्प किस्सा-

subhash chandra bose
सुभाष चंद्र बोस जयंती 2022: बोस एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। (Designed by Gargi Singh/Express Archive)

भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस का पूरा जीवन राष्ट्र प्रेम को समर्पित रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, ओडिशा में जानकीनाथ बोस और प्रभावती देवी के घर हुआ था। आज सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती है। सुभाष चंद्र बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उनके तेज दिमाग को देखकर उनके पिता जानकीनाथ बोस उन्हें ICS (इंडियन सिविल सर्विस) का ऑफिसर बनाना चाहते थे।

सुभाष ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल से प्राप्त की। नेता जी के जीवन में कुछ घटनाएं घटी हैं जो देशभक्ति की प्रेरणा देती हैं। ऐसी ही एक घटना उनके कॉलेज के दिनों की है जिस घटना ने उन्हें क्रांतिकारी बना दिया। आइए उनकी शिक्षा और जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।

जब सुभाष चंद्र बोस ने माफी की मांग की: 1916 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। सुभाष प्रेसीडेंसी कॉलेज से दर्शनशास्त्र में बीए कर रहे थे। एक बार सुभाष चंद्र बोस कॉलेज के पुस्तकालय में पढ़ रहे थे। तब उन्हें पता चला कि एक अंग्रेज प्रोफेसर ने उनके कुछ साथियों को धक्का दे दिया है। चूंकि सुभाष चंद्र बोस कक्षा के प्रतिनिधि थे, इस घटना के तुरंत बाद वह सीधे प्राचार्य के पास गए। इसी बात को लेकर उन्होंने प्रधानचार्य से इसकी शिकायत की और इस पर उन्होंने चर्चा भी की, लेकिन प्रोफेसर का रवैया काफी बेकार था। इस घटना के बाद सुभाष चंद्र बोस ने प्रिंसिपल से कहा कि वह प्रोफेसर को छात्रों से माफी मांगने के लिए कहें। लेकिन प्राचार्य ने ऐसा करने से मना कर दिया।

जब सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ समिति का गठन हुआ: दूसरे दिन इसको लेकर नेता जी सभी छात्रों के साथ हड़ताल पर बैठ गए। यह बात हवा की तरह तेजी से पूरे शहर में फैल गई। जिसके बाद उन्हें कई लोगों का समर्थन भी मिलने लगा। फलस्वरूप प्रोफेसर को छात्रों के आगे झुकना पड़ा। हालांकि कुछ दिनों बाद ऐसे मामले फिर से देखने को मिले, जिसके बाद छात्रों ने उग्र रूप धारण कर बल प्रयोग करने लगे, मामला इतना बढ़ चुका था कि इन छात्रों के खिलाफ एक जांच समिति बनाई गयी।

जब बोस ने आजादी को बनाया मूल मंत्र: समिति में सुभाष चंद्र बोस ने इन घटनाओं के बारे में तर्कसंगत अपनी बात रखी। उन्होंने समिति को बताया कि उन सभी के द्वारा उठाया गया यह कदम जायज था। समिति ने भी माना कि कार्रवाई जायज थी लेकिन बाद में कॉलेज के प्राचार्य ने सुभाष चंद्र बोस और उनके कुछ साथियों का नाम ब्लैक लिस्ट में डाल दिया। इस घटना से सुभाष चंद्र बोस को एहसास हुआ कि अंग्रेज भारतीयों के साथ कितना बुरा व्यवहार कर रहे हैं। इस घटना के बाद बोस गुस्से से भर गए और उन्होंने अंग्रेजों से आजादी पाने का रास्ता चुन लिया।

लौट आये भारत: जलियांवाला बाग हत्याकांड और अपनी सिविल सेवा परिवीक्षा को बीच में ही छोड़ कर भारत लौट आए। लौटने के बाद, सुभाष चंद्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए, और देशबंधु चित्तरंजन दास के अधीन काम करना शुरू कर दिया, जिनका वे हमेशा अपने राजनीतिक गुरु के रूप में सम्मान करते थे। उन दिनों नेताजी और अन्य युवा नेता पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में थे, लेकिन अन्य नेता “ब्रिटिश शासन के भीतर भारत के लिए प्रभुत्व की स्थिति” के पक्ष में थे और यह अंतर कांग्रेस के 1928 के गौहाटी (अब गुवाहाटी) अधिवेशन में तेजी से सामने आया।

आजाद हिंद फौज का गठन: हमेशा पढ़ाई में डूबे सुभाष चंद्र बोस ने 49वीं बंगाल रेजिमेंट में भर्ती होने के लिए परीक्षा दी, लेकिन कमजोर दृष्टि के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। 1920 में सुभाष को आईसीएस परीक्षा में चौथा स्थान मिला, लेकिन उन्होंने कभी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की और उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजों से मुकाबला करने का फैसला किया।

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