रॉनी स्क्रूवाला की कहानी: कभी खुद की डिबेट सुन हो गए थे शर्मिंदा, घंटों शीशे के सामने खड़े होकर करते थे बोलने की प्रैक्टिस

डिबेट की एक प्रैक्टिस के दौरान किसी ने कहा, ‘एक मिनट रुको… एक मिनट रुको। मुझे तुम्हारी बातें रिकॉर्ड करनी है, ताकि मैं वो तुमको सुना सकूँ’। जब पहली बार मैंने ख़ुद को सुना तब मैंने सोचा कि ‘हे भगवान! क्या मैं ऐसे बोलता हूँ?

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रॉनी स्क्रूवाला शीशे के सामने खड़े होकर बोलने की प्रैक्टिस करते थे। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मैं एक निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में पला-बढ़ा था, इसलिए अंग्रेज़ी मेरी पहली भाषा नहीं थी। हालाँकि मैं किस्मत वाला था कि मुझे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ने का मौका मिला, लेकिन हमारे घर में ज़्यादातर समय अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि गुजराती बोली जाती थी। दरअसल मेरे माता-पिता ने बचपन में ही भाषाई कौशल सीखने के मेरे शुरुआती संघर्षों से निबटने के लिए मुझे आवाज़ और उच्चारण सिखाने वाले क्लास में भेज दिया था। हालाँकि वो सस्ता नहीं था, लेकिन वे जानते थे कि इस सॉफ्ट स्किल में पैसा खर्च करना स्कूल में फीस भरने से भी मूल्यवान है। ये कहना अतिशय विनम्रता की बात होगी कि मैं लोगों के सामने ठीक से बोल नहीं पाता था।

लेकिन धीरे-धीरे एक किशोर के रूप में मुझे संवाद कौशल के महत्व का एहसास होना शुरू हो गया था। मैं ये जानने लगा था कि एक आत्मविश्वास से भरा बच्चा मज़ेदार कहानियाँ और चुटकुले सुना सकता है। मैं ये भी जानने लगा था कि क्लास के अग्रणी छात्र प्रेरक भाषण दे सकते हैं और वे आसानी से दोस्त बना सकते हैं और डिबेट में लोगों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए मैंने अपने ख़राब कम्युनिकेशन स्किल को ठीक करने का फ़ैसला किया। मैंने डिबेट, एलोक्युशन क्लासेज़ और बाद में थिएटर में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। शुरुआत में मैं इन तीनों में बहुत ख़राब था। लेकिन फिर मैंने इन सबका सबसे महत्वपूर्ण कम्युनिकेशन स्किल सीखा: अभ्यास, तैयारी और फिर अपने दिल की सुनना। चलिए मैं आपको अपनी कहानी विस्तार से बताता हूँ।

डिबेट की एक प्रैक्टिस के दौरान किसी ने कहा, ‘एक मिनट रुको… एक मिनट रुको। मुझे तुम्हारी बातें रिकॉर्ड करनी है, ताकि मैं वो तुमको सुना सकूँ’। जब पहली बार मैंने ख़ुद को सुना तब मैंने सोचा कि ‘हे भगवान! क्या मैं ऐसे बोलता हूँ?! ये तो बहुत घटिया है’! लेकिन फिर मैंने प्रैक्टिस की, थोड़ी और तैयारी की और फिर से रिकॉर्ड करके अपने प्रदर्शन की समीक्षा की। धीरे ही सही, लेकिन पक्के तौर पर मैं अपने कम्युनिकेशन स्किल की समस्याओं को तब तक सहज बनाने में लगा रहा जब तक वह स्पष्ट , साफ़ और बेहतर नहीं हो गया।

यह आसान नहीं था, लेकिन जितना ही मैं अपनी आवाज़ की रिकॉर्डिंग सुनता गया, उतना ही मुझे उसमें सुधार की गुंजाइश दिखने लगी, भले ही उसके लिए मुझे शीशे के सामने घंटों व्याकुलता से खड़ा क्यों न रहना पड़ा हो। फिर मैंने उसमें धीरे-धीरे सुधार देखा। उसके बाद यह सिर्फ अभ्यास और इस बात को न भूलने का मामला था कि मेरा स्तर कितना नीचे था।

कॉलेज में मैंने यही रवैया थिएटर और ऐक्टिंग में भी अपनाया। उसकी प्रैक्टिस पूरे दिन के काम के बाद शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक होती थी। मैं बहुत बुरी तरह से थका हुआ होता था, लेकिन यह सब मज़ेदार था। नाटक में हम एक ही दृश्य का अभ्यास तब तक करते रहते थे, जबतक कि वह पूरी तरह से अच्छा नहीं हो जाता था। और फिर निर्देशक कहता था कि ‘ठीक है, बहुत अच्छा। चलो इसे दोबारा करते हैं’, जिसका मतलब होता था उसे शुरू से शुरू करना और दोबारा पूरा नाटक करना। इस अनभुव ने मुझे एक ऐसी सीख दी जो मैं कभी नही भूल पाऊँगा:

जब बात संवाद की आती है तो बहुत अधिक तैयारी जैसी कोई चीज़ नहीं होती। संवाद किसी भी मकसद के लिए पहला कौशल है अगर आप इसके बारे में विचार करेंगे, तो संवाद ही सब कुछ है। बेशक बोलने, संदेश भेजने या ईमेल लिखने जैसी गतिविधियां भी उसमें शामिल हैं। लेकिन जब आप शांत बैठे होते हैं, तब भी आप संवाद कर रहे होते हैं। दरअसल कभी-कभी जब आप शांत रहते हैं, तब आप अपने मुँह से निकले शब्दों की तुलना में बहुत अधिक कह रहे होते हैं । जब आप किसी पर ग़ुस्सा होते हैं और उस व्यक्ति को ‘साइलेंट ट्रीटमेंट’ देते हैं, तब आप जानते हैं कि मेरे कहने का क्या मतलब है।

यह सामान्य सी बात है कि: इंसानों के बीच संवाद अनिवार्य है। यह पेशेवर जीवन के हर आयाम से जुड़ा हुआ है। नौकरी के लिए इंटरव्यू, रेज़ूमे राइटिंग, काम से जुड़ा प्रजेंटेशन, ईमेल, भाषण, सेल्स के लिए तैयार संवाद सामग्री, उपभोक्ता सेवा, सहकर्मियों के साथ बातचीत, टीम को तैयार करना- सच में संवाद सब कुछ है, क्योंकि सब कुछ संवाद का ही स्वरूप है। इस मामले में मैंने कलारी कैपिटल की वाणी कोला से उनका विचार पूछा: ‘मेरे लिए संवाद अपनी बातों को दूसरों तक पहुँचाना, उन्हें प्रभावित करना और अपने साथ लेकर चलना है’।

वह सही हैं और यही कारण है हर इम्प्लॉयर नौकरी देते समय उम्मीदवार के संवाद कौशल की जाँच को सबसे ऊपर रखता है। जैसा कि भारत के नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने मुझसे कहा: ‘किसी के भी करियर को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी है कि उसे लोगों के साथ बातचीत करने दिया जाए, अपने विचारों को सबके सामने व्यक्त करने दिया जाए, रिश्ते विकसित करने दिया जाए’।

लेकिन सवाल यह है कि कैसे? यह संभव है कि आप विश्व-स्तरीय वक्ता या लेखक न हों । अगर ऐसा मामला है, फिर राहत की साँस लीजिए । आप अच्छी संगत में हैं । दरअसल, इस धरती पर 7.8 अरब लोगों में से 99.9 % लोग प्रेरक वक़्ता या पुरस्कार विजेता लेखक नहीं हैं। संवाद का कौशल जन्मजात नहीं होता, इसे ख़ुद से विकसित किया जाता है । इस विषय में मुझे हिंदुस्तान लिवर (HUL) के सीएमडी संजीव मेहता की बात अच्छी लगती है। ‘हर आदमी जन्मजात वक्ता नहीं होता, लेकिन उसकी मेहनत उसे एक शानदार कम्युनिकेटर बना सकती है’। यह कितनी प्रेरक सोच है।

(पेंगुइन से प्रकाशित रॉनी स्क्रूवाला की किताब ‘आपकी स्किल-आपका उड़ान: अप योर गेम’ का अंश)

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