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रुका हुआ पायलट प्रोजेक्ट कर्नाटक न्यूट्रिशन अभियान फायदेमंद हो सकता है

इस प्रोजेक्ट ने कुपोषण और एनीमिया के संकट पर ध्यान केंद्रित किया था, खासतौर पर बच्चों और महिलाओं में

प्रतीकात्मक तस्वीर

कर्नाटक सरकार ने हालांकि करीब दो साल पहले राज्य के दो पिछड़े इलाकों में न्यूट्रिशन सप्लीमेंट प्रोग्राम को रोक दिया था, इसके आशाजनक परिणाम के बावजूद, अब ऐसा लग रहा है कि राज्य ने अभी तक इस प्रोजेक्ट को बंद करने का अंतिम निर्णय नहीं लिया है। मल्टी सेक्टरल न्यूट्रिशन प्रोजेक्ट 2015 में कलबुरगी जिले के चिंचोली और रायचूर जिले के देवदुर्गा में पायलट आधार पर शुरू किया गया था और 2018 के आखिर में इसे रोक दिया गया।

इस प्रोजेक्ट को विश्व बैंक और जापान सोशल डेवलपमेंट फंड (JSDF) द्वारा फंडिंग मिलती थी, इसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरों के बीच कुपोषण को कम करना और कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ना था। सरकार की ओर से गर्भवती महिलाओं को शक्ति वीटा नामक एक फोर्टिफाइड मिश्रण प्रदान किया जाता था, जिसमें स्थानीय रूप से उगाई गई रागी, मक्का, सोया, गेहूं, हरा चना और मूंगफली शामिल थी।

प्रोजेक्ट से करीब से जुड़े एक अधिकारी ने indianexpress.com को बताया कि पायलट प्रोजेक्ट का परिणाम सकारात्मक रहा। उन्होंने कहा, ‘सितंबर 2018 में पायलट प्रोजेक्ट को रोक दिया गया था। इस प्रोग्राम को राज्य के अन्य हिस्सों में ले जाने के बारे में विचार-विमर्श किया गया, लेकिन बाद में इस विचार को भी छोड़ दिया गया।’

indianexpress.com द्वारा प्राप्त कर्नाटक मल्टीसेक्टरल न्यूट्रिशन पायलट प्रोजेक्ट की इम्पैक्ट इवैलुएशन रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष के मुताबिक, “न्यूट्रिशनल स्थिति में कंट्रोल ब्लॉक्स की तुलना में इंटरवेंशन ब्लॉक्स में महत्वपूर्ण अंतर था, क्योंकि कंट्रोल ग्रुप की तुलना में इंटरवेंशन ग्रुप में बच्चों की कम स्टंटिंग और किशोर लड़कियों में कम एनीमिया का संकेत मिलता है।” यह पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता से संबंधित मुद्दों और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के उपयोग के बारे में जागरूकता को लेकर भी समान सुधार को नोट करता है। क्वालिटेटिव मेथड्स से प्राप्त रिपोर्ट नोट्स के मुताबिक, इंटरवेंशन ग्रुप में बच्चों और किशोर लड़कियों के संपूर्ण स्वास्थ्य में सुधार देखा गया।

इस प्रोजेक्ट ने स्थायी तरीके से कुपोषण और एनीमिया के संकट पर ध्यान केंद्रित किया था, खासतौर पर बच्चों और महिलाओं के बीच और सभी कमजोर समूहों को पोषण सुरक्षा प्रदान करने के लिए। एक अधिकारी के मुताबिक, “कलबुरगी जिले के चिंचोली ब्लॉक और रायचूर जिले के देवगुर्गा ब्लॉक में 3 साल से कम उम्र के बच्चे, 11-18 साल की किशोर लड़कियां, गरीब परिवारों की गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं इस प्रोजेक्ट की प्राथमिक लाभार्थी थीं।”

तीन सालों में, यह कोशिश की गई कि पौष्टिक खाद्य पदार्थों की खपत बढ़े और गरीब व कमज़ोर तबके की गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के बीच पोषण संबंधी ज्ञान और व्यवहार में सुधार हो। इससे इलाके में शिशु मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, बच्चों, किशोर लड़कियों और महिलाओं में एनीमिया और माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी को दूर करने में मदद मिलने की उम्मीद थी। सरकार ने बच्चों की सही देखभाल, बालिकाओं की देखभाल उसके पूरे जीवन चक्र में, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पारिवारिक बजट के भीतर उचित आहार संबंधी व्यवहार में बदलाव के लिए जागरुकता कार्यक्रम भी बनाया। उसी समय फंडिंग बंद हो गई।

राज्य के एक अधिकारी ने कहा, ‘जब विश्व बैंक ने फंडिंग रोक दी, तब हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्रीय विकास बोर्ड (एचकेआरडीबी), जिसे अब कल्याण कर्नाटक क्षेत्र विकास बोर्ड कहा जाता है, 2018 में 2.5 करोड़ रुपये जारी करने को मजबूर हुआ।’ जल्द ही, प्रोजेक्ट से जुड़ी सभी चीज़ों को बंद कर दिया गया और 1 करोड़ रुपये की लागत से फॉर्मूलेटेड फूड बनाने के लिए पायलट प्रोजेक्ट क्षेत्र में स्थापित यूनिट को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया।

हालांकि, प्रोजेक्ट को लेकर अब भी उम्मीद बाकी है। महिला और बाल विकास मंत्री शशिकला जोले ने Indianexpress.com से बातचीत में कहा, “मेरी जानकारी के अनुसार, फंड की कमी की वजह से प्रोजेक्ट रोक दिया गया था। पहले विश्व बैंक द्वारा फंडिंग की गई मल्टी सेक्टर न्यूट्रिशन प्रोजेक्ट को लेकर हमें अभी एक ज़िम्मेदारी उठानी है।”

पायलट प्रोजेक्ट हालांकि अब भी अटका हुआ है, लेकिन ऐसा लगता है कि इससे मिले सबक को व्यापक पैमाने पर उपयोग में लाया जा रहा है। महिला सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन प्रोडक्शन और ट्रेनिंग वेंटर्स (MSPTC) कार्यक्रम के एक भाग के रूप में जोले ने कहा, राज्य अब कुपोषण की चुनौतियों से निपटने के लिए आंगनवाड़ी को न्यूट्रिशन सप्लीमेंट्स प्रदान करने के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करेगा।

प्रस्ताव के अनुसार, मंत्री, इनमें से प्रत्येक केंद्र में 22 और 32 साल की महिलाएं होंगी जो समाज के सबसे कमजोर तबके और स्त्री शक्ति सेल्फ हेल्प ग्रुप की सदस्य हैं। मंत्री के अनुसार, ‘केंद्र इंटग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम के लाभार्थियों को सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन प्रोग्राम के तहत खाद्य पदार्थों का निर्माण और आपूर्ति करता है।’

जोले ने कहा कि कर्नाटक में कुपोषण से निपटने के लिए माथ्रूपूर्णा, क्षीर भाग्य और सृष्टि जैसी योजनाएं हैं। 2017 में शुरू हुई माथ्रूपूर्णा योजना का उद्देशय राज्य में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करना है। क्षीर भाग्य योजना के तहत राज्य सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले छात्रों को मुफ्त दूध मुहैया कराती है, जबकि सृष्टि के तहत छात्रों को अंडे दिए जाते हैं। लेकिन ये प्रोजेक्टएं बाधित हो गईं, क्योंकि महामारी के कारण राज्य भर के स्कूल बंद हैं।

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