उतार-चढ़ाव जीवन का वह हिस्सा होता है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसमें बस फर्क चुनौतियों और परिस्थितियों की होती है। किसी की बड़ी समस्या है तो कोई छोटी समस्या में उलझा हुआ है, लेकिन उलझे सब हैं। आज के दौर में यह स्थिति और जटिल हो गई है। दरअसल, अक्सर लोग थोड़ी सी परेशानी होने पर भीतर से टूट जाते हैं। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि कोई व्यक्ति कठिनाइयों का सामान करने के लिए कितना सक्षम है। कठिन चुनौतियों और परिस्थितियों में टूटने के बजाए उसे स्वीकार कर हल का करने का रास्ता अपनाया जाए। लेकिन यह गुण एक दिन में विकसित नहीं होती, बल्कि इसके लिए बचपन से ही मेहनत करनी पड़ती है।
आप अपने बच्चों को भीतर शुरू से ही कुछ ऐसे कौशल को विकसित करने पर ध्यान दें, जो आगे चलकर उनकी कठिन राह को आसान बना सकें। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों को स्वतंत्र रूप से समस्याओं का समाधान खोजने के तरीके सिखाए जाएं और उन्हें विफलताओं से सीखने के लिए प्रेरित किया जाए। जब वे किसी खेल या परीक्षा में पिछड़ जाते हैं, तो निराश या हताश होने की बजाय अगर उससे प्रेरणा ली जाए, तो वे आगे और बेहतर कर सकते हैं। जरूरत खुद के भीतर विश्वास पैदा करने और परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेने की होती है।
समस्या में समाधान खोजना
कई बार बच्चे किसी खेल, पढ़ाई या किसी चीज में उलझने पर उससे वहीं छोड़ देते हैं। अभिभावक का असल काम यहीं से शुरू होता है। बच्चे सामने कोई भी समस्या आए तो तुरंत उसका समाधान बताने के बाज आप उससे पूछें कि वह इसे कैसे हल कर सकता है। इससे उसकी प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स विकसित होगी। छोटी-छोटी समस्याओं पर खुद निर्णय लेने का मौका मिलने से बच्चे में आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
हार से सीख
चुनौतियों से मुकाबला करने की क्षमता विकसित करने के लिए सबसे बेहतर तरीका है खेल। खेल की मदद से आप बच्चे को हार और जीत का असल मूल अर्थ समझा सकते हैं। खेल में कभी जीत होती है, तो कभी हार, लेकिन बच्चों को इस बात का एहसास करवाएं की दोनों ही स्थितियों में क्या-क्या सीखने को मिलता है। सबसे जरूरी है हार में उसे सिखाना, उसे प्रोत्साहित करें कि हार का मतलब निराशा या सम्मान खोना नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों को दूर करने का सबसे बेहतर तरीका है। जब आपकी कमजोरियां दूर हो जाएंगी, तो जीत की राह सरल बन जाती है। इससे बच्चों में संघर्ष करने प्रवृत्ति पैदा होती है, जो उन्हें मुश्किल समय में डटे रहने का साहस और जज्बा पैदा करेगी। ऐसे में आप बचपन से ही अपने बच्चे के हार से उसे मुश्किल समय में घबराने के बजाए डटे रहने की सीख दे सकते हैं।
धैर्य की जरूरत
बदलते समय में बच्चों से लेकर युवाओं तर हर किसी को तुरंत रिजल्ट चाहिए होता है। जब वह इसमें सफल नहीं होते हैं, यह उन्हें भीतर से निराश करने लग जाती है, जिससे वे हतोस्साहित होने लगते हैं। ऐसे में बच्चों में धैर्य विकसित करना जरूरी है। बच्चे को सिखाएं कि सफलता के लिए सबसे जरूरी धैर्य है। इसके लिए अगर बच्चा किसी चीज की मांग करता है, तो उसे तुरंत न दें। कुछ समय या दिन बाद उसे दें और उसे बताएं कि इसके लिए इंतजार करना क्यों जरूरी है। धैर्य बच्चे मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, जो आगे चलकर भविष्य में आने वाली समस्याओं को बेहतर तरीके से हल कर सकता है।
भावनाओं को संभालना और समझना
हम अपने आस-पास ऐसी कई खबरें सुनते हैं और लोगों को देखते हैं कि कई बार अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाते और टूट जाते हैं। यह गुण बच्चों में बचपन से विकसित की जा सकती है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि गुस्सा, दुख, डर और निराशा जैसी भावनाएं सामान्य हैं। उन्हें अपनी भावनाओं को दबाने के बजाए उन्हें पहचानना और सही तरीके से व्यक्त करना सिखाएं। इससे मुश्किल परिस्थितियों में घबराने के बजाए शांत रहकर सोचने में मदद मिल सकती है।
जिम्मेदारी का एहसास
बच्चों में जिम्मेदारी का एहसास भी बचपन से ही विकसित करना चाहिए। इसके लिए आप उसे छोटे-छोटे काम सौंप दें। जब वे खुद काम करेंगे और गलतियां होने पर वह इसमें सुधार करेंगे। बच्चे को सिखाएं की गलती सबसे होती है, लेकिन जरूरी यह कि गलती दोबारा न हो और यह तभी संभव होगा, जब आप उसे जिम्मेदारी का एहसास करवाएं। बच्चे को उसकी गलतियों को बताने के बजाय उसे खुद अहसास करने दें। जिम्मेदारी उसे आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाती है।
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