शशि थरूर अपनी पसंदीदा इडली को लेकर चर्चा में हैं। इससे पहले भी उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इडली की जमकर तारीफ करते हुए इसे दक्षिण भारतीय खानपान की पहचान बताया था। अब उन्होंने लोगों का ध्यान रामास्सेरी इडली की ओर खींचा है। जो दिखने में डोसे जैसी लगती है लेकिन स्वाद में इडली जैसी होती है।
शशि थरूर ने एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि रामास्सेरी इडली बहुत खास होती है। यह इडली दिखने में डोसे जैसी है, लेकिन स्वाद में इडली जैसी होती है। हालांकि यह आम इडली जैसी नहीं है।
रामास्सेरी इडली क्यों है इतनी खास?
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान शेफ और द गॉरमेट किचन एंड स्टूडियो के संस्थापक हर्ष शोधन ने बताया कि रामास्सेरी इडली केरल के पलक्कड़ जिले के रामास्सेरी गांव की पारंपरिक डिश है। इसका आकार चपटा और गोल होता है, जिसकी वजह से यह डोसे जैसी लगती है। लेकिन खाने पर इसका मुलायम टेक्सचर और स्वाद इडली जैसा होता है।
इसी विषय पर सेलिब्रिटी शेफ अनन्या बनर्जी बताती हैं कि करीब 200 साल पुरानी इस खास डिश को तमिलनाडु से आए मुदलियार समुदाय अपने साथ लेकर आए थे। पीढ़ी दर पीढ़ी इसे पारंपरिक स्टीमिंग तकनीक से तैयार किया जाता रहा है, जिससे इसकी पहचान आज भी बरकरार है।

हर्ष शोधन के अनुसार स्थानीय परिवारों द्वारा पीढ़ियों से अपनाई जा रही पारंपरिक स्टीमिंग तकनीक ही रामास्सेरी इडली को इसकी अलग पहचान देती है। जिसकी वजह से यह सामान्य इडली से अलग पहचान रखती है।
इसे खाने के फायदे
शोधन ने बताया कि पारंपरिक इडली की तरह ही रामास्सेरी इडली को फर्मेंट किए हुए चावल और दाल से बनाया जाता है। इसी वजह से यह आसानी से पच जाती है। इसे तलने के बजाय भाप से पकाया जाता है। यह पेट के लिए हल्की होती है और इसे संतुलित आहार में शामिल किया जा सकता है।
कोम्पनी अस्पताल और कल्पने के सह-संस्थापक शेफ सोमबीर चौधरी का कहना है कि रीजनल ट्रेडिशनल डिशेज में उन समुदायों की समझ झलकती है, जिन्होंने पोषण और स्वाद के महत्व को बहुत पहले ही पहचान लिया था।
उन्होंने बताया कि रामास्सेरी इडली जैसी फर्मेंटेड और भाप में पकी डिश पाचन तंत्र के लिए हल्की मानी जाती है। इसमें प्राकृतिक प्रोबायोटिक्स पाए जाते हैं। साथ ही इसे बनाने में तेल या अतिरिक्त फैट की जरूरत नहीं पड़ती। यही वजह है कि इसे नाश्ते के लिए एक हेल्दी विकल्प माना जा सकता है।
