sanitary napkins is possible in one rupee if government and companies would attempt - उड़ान: बात कर की नहीं, कीमत की है - Jansatta
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उड़ान: बात कर की नहीं, कीमत की है

देश में सैनिटरी नैपकिन को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दायरे से मुक्त कर दिया गया है, यह अच्छी बात है। लेकिन महिलाओं की यह लड़ाई अभी यहीं खत्म नहीं होती है।

Author August 2, 2018 5:19 AM
सबसे निचले पायदान की अंतिम लड़की तक उपलब्ध हो सैनिटरी नैपकिन

सुमन केशव सिंह

देश में सैनिटरी नैपकिन को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दायरे से मुक्त कर दिया गया है, यह अच्छी बात है। लेकिन महिलाओं की यह लड़ाई अभी यहीं खत्म नहीं होती है। यह तो बस एक कदम है, जो जीएसटी के बाद महिलाओं ने अपनी आजादी के लिए बढ़ाया है। अब संघर्ष तो कर के आगे कीमत तक ले जाने का है। यानी कम कीमत की मुहिम छेड़ने का।

यह तो अभी शुरुआत है : जरमीना इसरार

जरमीना इसरार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा हैं। उन्होंने एक साल के अदालती संघर्ष के बाद सैनिटरी पैड को जीएसटी के दायरे से बाहर करवाने में सफलता हासिल की। जरमीना कहती हैं कि ये तो अभी शुरुआत है। जेएनयू से विमेन इम्पावरमेंट की शोधार्थी का कहना है कि आज भी देश में महिलाओं का बहुत बड़ा वर्ग है जो सैनिटरी नैपकिन का उपयोग कई कारणों से नहीं कर पाता है। जरमीना ने बताया कि वे पीलीभीत के एक छोटे से इलाके से आती हैं और बतौर सामाजिक कार्यकर्ता उन्होंने महिलाओं के बीच रह कर उनकी दिक्कतों को गहराई से समझा है। उन्होंने बताया कि डिजिटल इंडिया और विकसित भारत की अवधारणा वाले दौर में भी लड़कियां सैनिटरी नैपकिन का देसी विकल्प राख, कपड़ा और दूसरी चीजें उपयोग करने को मजबूर हैं।

यह आधारभूत जरूरत है, कर लगना ही नहीं था

2017 जुलाई में पीआइएल दाखिल की गई थी। पहली ही सुनवाई में कोर्ट ने माना केवल महिलाओं को केंद्रित करके जो कर वसूला जा रहा है, वह गलत है। हमारी पीआइएल दाखिल करने के बाद नैपकिन को कर मुक्त करने के लिए भी एक पीआइएल बॉम्बे हाई कोर्ट में भी दाखिल की गई थी। केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह एक अपील की गई कि यह कर कम नहीं किया जा सकता है। केंद्र ने सुझाव दिया था कि दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट में चल रहे दोनों मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होनी चाहिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों हाई कोर्ट के मामलों की एक साथ सुनवाई शुरू की। इसके बाद सुनवाई पर कुछ दिनों के लिए रोक लग गई थी। सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई होती और उस पर कोई फैसला आता, उससे पहले ही केंद्र सरकार ने सैनिटरी नैपकिन को कर मुक्त कर दिया। – अमित जॉर्ज, जरमीना के वकील

अब कम कीमत में नैपकिन उपलब्ध कराना हो प्राथमिकता

दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में लड़कियों को पहले सैनिटरी नैपकिन बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर ये छात्राएं कॉलेज में ही इनका उत्पादन भी करती हैं। नैपकिन की उपलब्धता के लिए कॉलेज में कई जगह वेंडिंग मशीन लगाई गई हैं, जिनमें पांच रुपए का सिक्का डालकर एक नैपकिन मिलती है। कॉलेज की प्राचार्या डॉक्टर प्रत्यूषा वत्सला कहती हैं कि सैनिटरी नैपकिन पर कर लगाया ही क्यों गया था? इससे भी ज्यादा जरूरी है कि लड़कियों को न्यूनतम राशि में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं। प्राचार्या का मानना है कि न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर भी नैपकिन की पहुंच हर लड़की तक सुनिश्चित की जाए। डॉक्टर वत्सला ने बताया कि भारत की बहुत बड़ी आबादी आज भी कपड़े का उपयोग करती है, इसलिए सरकार इसे कुटीर उद्योग की तरह विकसित करे ताकि हर वर्ग की लड़कियों को यह सस्ती दर पर उपलब्ध हो। यह एक कोशिश है कि बेहतर नैपकिन सस्ती दर पर हर लड़की की पहुंच में आए।

सरकार-कंपनियां चाहें तो एक रुपए में संभव है नैपकिन

कॉलेज में सैनिटरी नैपकिन बनाने के प्रोजेक्ट को संभाल रही डॉक्टर अमृता शिल्पी कहती हैं कि तत्कालीन डीयू कुलपति प्रोफेसर दिनेश कुमार ने 2015 में लक्ष्मीबाई कॉलेज में इनोवेशन प्रोजेक्ट के तहत नैपकिन बनाने की योजना शुरू की थी। डॉक्टर शिल्पी का मानना है कि सरकार और बड़ी कंपनियां चाहें तो नैपकिन एक से डेढ़ रुपए में भी उपलब्ध हो सकते हैं। सरकार और निजी कंपनियां स्कूलों को गोद लेकर, उन्हें नैपकिन बनाने की मशीनें उपलब्ध करा सकती हैं। यही काम गांवों में भी हो सकता है। उन्होंने बताया कि छात्राओं की ओर से बनाए गए नैपकिन की कीमत डेढ़ रुपए से भी कम है। यदि सरकार और बड़ी कंपनियों की मदद मिले तो यह और भी कम व बेहतर गुणवत्ता वाली हो सकती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यहां बात सिर्फ 12 फीसद कर लगाने की नहीं है, बात नैपकिन को हर लड़की तब पहुंचाने की है। नैपकिन को कर मुक्त करने का लाभ तभी मिलेगा जब सबसे निचले पायदान में इसकी पहुंच हो। डॉक्टर शिल्पी की मानें तो भारत में आज भी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान एक तरह से अलग-थलग कर देने की प्रथा है। लेकिन सेनेटरी नैपकिन जैसे सुरक्षित, सुविधाजनक और बेहतर विकल्प उपलब्ध होने के बाद इसमें बदलाव देखा जा रहा है।

देश की राजधानी में लड़कियां हैं वंचित

उन्होंने कहा कि जब बात होती है विकसित होने की तब हम गांवों और कस्बों की बात करते हैं। लेकिन 21वीं सदी में दिल्ली के कस्बों की स्थिति में भी बहुत सुधार नहीं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में आज भी यह आलम है कि लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं आतीं। ऐसा नहीं है कि उन्हें नैपकिन के बारे में जानकारी नहीं है। डॉक्टर शिल्पी कहतीं हैं कि अब हम ऐसे नैपकिन तैयार करने की कोशिश में है जिसे बिना अंतर्वस्त्र के उपयोग किया जा सकता है।

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