एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु अपना प्रेग्नेंसी फेज एन्जॉय कर रही हैं। हाल ही में उन्होंने प्रेग्नेंसी जर्नल से जुड़ी स्टोरी इंस्टाग्राम पर शेयर की। जिसमें उन्होंने लिखा कि क्या मैंने कभी सोचा था कि मैं ऐसी हो जाऊंगी? कभी नहीं। इस स्टोरी को उनके पति राज निदिमोरु ने भी इंस्टाग्राम पर रिपोस्ट किया। जिसके बाद प्रेग्नेंसी जर्नल को लेकर चर्चा काफी बढ़ गई है। प्रेग्नेंट महिलाओं के बीच आजकल प्रेग्नेंसी जर्नल लिखने का ट्रेंड बढ़ रहा है।

क्या है प्रेग्नेंसी जर्नल

प्रेग्नेंसी जर्नल एक ऐसी डायरी या बुक होती है, जिसमें मां बनने वाली महिलाएं अपने 9 महीने के सफर के दौरान महसूस होने वाली भावनाओं, शारीरिक बदलावों और बच्चे से जुड़ी यादों को लिखकर सुरक्षित रख सकती हैं।

मां बनने वाली महिलाओं को किस तरह मदद करता है प्रेग्रेंसी जर्नल

साइकोथेरेपिस्ट और रिलेशनशिप ब्रेकथ्रू कोच डेल्ना राजेश ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि कई लोग प्रेग्रेंसी जर्नल को सिर्फ एक ऐसी डायरी मानते हैं, जिसमें बच्चे का फर्स्ट किक, खाने की क्रेविंग, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट और हर हफ्ते होने वाले बदलावों को नोट किया जाता है। लेकिन यह इससे कहीं ज्यादा है। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखा जाए, तो प्रेग्नेंसी जर्नल एक मां के लिए बहुत ही पावरफूल टूल है, जिसकी मदद से वह न सिर्फ बच्चे के जन्म बल्कि मां बनने के बाद के अनुभव के लिए भी खुद को तैयार करती है।

डेल्ना के अनुसार प्रेग्नेंसी कई महिलाओं के लिए टर्निंग पॉइंट (बदलाव का दौर) होता है। वह कहती हैं कि अक्सर यह पहली बार होता है जब वे दुनिया में एक नए इंसान का स्वागत करने से पहले सोच-समझकर तय करती हैं कि वे कैसी इंसान बनना चाहती हैं। कुछ महिलाएं सोचती हैं कि वह ज्यादा सब्र (Patience) रखेंगी। तो कुछ गुस्से पर काबू पाने, सीमाओं को तय करने, अपनी शादी को मजबूत करने, अपनी सेहत को प्रायोरिटी देने या ज्यादा इमोशनल स्टेबिलिटी लाने पर काम करती हैं। उनके इन्हीं अंदरूनी बदलावों का गवाह जर्नल बनता है।

प्रेग्नेंसी जर्नल के इमोशनल फायदे

प्रेग्नेंसी के दौरान जर्नल लिखने का सबसे बड़ा फायदा इमोशनल तौर पर होता है। जहां महिलाएं अपनी भावनाओं को खुलकर लिखने और समझने का अवसर देती हैं। डेल्ना के अनुसार प्रेग्नेंसी में अक्सर दबी हुई भावनाएं सामने आ जाती हैं। बचपन की यादें, पुराना दुख, पेरेंटिंग को लेकर डर, रिश्तों की चिंता, शरीर को लेकर मन में उलझन, बच्चे के जन्म की घबराहट, करियर में बदलाव या कुछ अच्छा न होने की चिंता अचानक उभर सकती है। भावनाओं को दबाने की बजाय लिखकर उन्हें सही तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

डेल्ना ने इस बात पर जोर दिया है कि जर्नलिंग सभी समस्याओं को नहीं सुलझाता बल्कि यह हमारे इमोशन को बाहर निकालने में मदद कर सकता है। आज की पीढ़ी के पेरेंट्स पिछली पीढ़ी के पेरेंट्स से ज्यादा जागरूक हैं। कई पेरेंट्स थेरिपी ले रहे हैं, प्रेरेंटिंग प्रोग्राम में शामिल होते हैं, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे तौर तरीकों को समझ रहे हैं। वे समझते हैं कि बच्चे उन्हें दी जाने वाली सलाह के बजाय उस इमोशनल माहौल से कहीं ज्यादा सीखते हैं जिसमें वे बड़े होते हैं।

प्रेग्नेंसी के दौरान जर्नल मुश्किलों का सामना करने की क्षमताओं को रिकॉर्ड करती है। डेल्ना के अनुसार मां अक्सर न सिर्फ खुशी के पलों को बल्कि मेडिकल अपॉइंटमेंट, बिना सोए गुजारी रातें, आंसुओं, आभार और चुपचाप मिली जीतों को भी लिखती हैं। जब सालों बाद इन पेजों को खोलकर देखेंगे, तो ये यादों से कहीं ज्यादा होंगी, जो हिम्मत, साहस और ग्रोथ को सबूत बन सकते हैं।

पार्टनर भी बन सकते हैं प्रेग्रेंसी जर्नल का हिस्सा

पार्टनर भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं। बच्चे को लेटर लिखना, भविष्य की उम्मीदों को रिकॉर्ड करना, मेडिकल अपॉइंटमेंट के बाद उन पर सोचना या खुद के बारे में जो कुछ भी सीख रहे हैं उसे लिखना। इन सब चीजों की वजह से अक्सर बच्चे के आने से पहले ही परिवार के बीच इमोशनल जुड़ाव और गहरा हो जाता है। प्रेग्नेंसी जर्नल सिर्फ अच्छा लिखने तक सीमित नहीं है। प्रेग्नेंसी के दौरान महसूस होने वाली भावनाओं को सच्चाई से लिखना। कुछ पेज उत्साह तो कुछ डर, कंफ्यूजन या आंसू से जुड़े हो सकते हैं। हर एक पेज बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जिंदगी के सबसे बड़े बदलाव का सफर सच्चाई से लिखा गया होता है।