ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु एक प्रसिद्ध भारतीय योगी, लेखक और आध्यात्मिक गुरु हैं। महादेव के उपासक जग्गी वासुदेव के अनुयायी और प्रशंसक भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में हैं। वह आंतरिक शांति के लिए ध्यान यानी मेडिटेशन को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। हिंदू धर्म और योग दर्शन में ‘समाधि’ का जिक्र गहराई से मिलता है। इसे मन की एकाग्रता का वह अंतिम और सर्वोच्च अवस्था बताया गया है, जहां साधक का व्यक्तिगत अहंकार मिट जाता है और उसकी चेतना परमात्मा या ब्रह्मांडीय चेतना के साथ पूरी तरह लीन हो जाती है। समाधि पर सद्गुरु ने विस्तार से जानकारी साझा की है।

समाधि सिर्फ मृत्यु जैसी अवस्था नहीं है

अपने एक यूट्यूब वीडियो में सद्गुरु समाधि का सरल अर्थ समझाते हुए कहते हैं कि कई लोग इसे मृत्यु जैसी अवस्था समझते हैं, जबकि असल में इसका वास्तविक अर्थ बिल्कुल अलग है। सद्गुरु के अनुसार ‘समाधि’ शब्द ‘सम’ और ‘धी’ से मिलकर बना है। सम का अर्थ है संतुलन या समभाव और धी का मतलब है बुद्धि। जब किसी व्यक्ति की बुद्धि पूरी तरह संतुलित और शांत हो जाती है, तो उस अवस्था को समाधि कहा जाता है।

समाधि से देख सकते हैं जीवन का वास्तविक स्वरूप

इसके आगे वह कहते हैं कि, “मेरे अनुसार समाधि की सभी अवस्थाएं बिना किसी बाहरी नशे या रसायन के चेतना के एक अलग और ऊंचे अनुभव तक पहुंचने का माध्यम हैं। इन अवस्थाओं में जाने से आपके लिए जीवन का एक नया आयाम खुलता है, लेकिन इससे हमेशा कोई बड़ा या स्थायी बदलाव हो, ऐसा जरूरी नहीं है।” इसके आगे वह सरल शब्दों में समझाते हुए कहते हैं कि, “समाधि की अवस्था में आपकी बुद्धि पूरी तरह सक्रिय और संतुलित रहती है, लेकिन आप उससे भी आगे निकल जाते हैं। उस समय आप चीजों में भेद नहीं करते, बल्कि जीवन को उसके वास्तविक स्वरूप में देखते और अनुभव करते हैं।” इसके आगे सद्गुरु कहते हैं कि, “समाधि वह अवस्था है, जिसमें बुद्धि अपनी सामान्य भेदभाव करने की क्षमता से आगे बढ़ जाती है। इससे व्यक्ति का अपने शरीर से जुड़ाव कुछ हद तक ढीला पड़ने लगता है और उसे अपने वास्तविक अस्तित्व तथा शरीर के बीच एक अलग सा अंतर महसूस होने लगता है।”

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इसपर इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने मुंबई स्थित सेंटियर वेलनेस की संस्थापक और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. रिम्पा सरकार से बात की तो वह बताती हैं, समाधि योग दर्शन से जुड़ी एक आध्यात्मिक अवस्था है, जबकि ध्यान (मेडिटेशन) एक अभ्यास है। बातचीत में उन्होंने बताया है कि, “मनोविज्ञान के अनुसार, मेडिटेशन ऐसी कई तकनीकों का समूह है, जो व्यक्ति का ध्यान जागरूकता और भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता बेहतर बनाती है। वहीं, योग परंपरा और सद्गुरु के अनुसार, समाधि ऐसी अवस्था है, जहां व्यक्ति गहरे संतुलन और जीवन को देखने के एक अलग दृष्टिकोण का अनुभव करता है। यह केवल ध्यान करने से कहीं आगे की अवस्था मानी जाती है।”

समाधि और मेडिटेशन में अंतर

डॉ. रिम्पा सरकार के अनुसार, मनोविज्ञान मेडिटेशन के फायदों को वैज्ञानिक रूप से स्वीकार करता है, जैसे कि ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ना, तनाव कम होना, भावनाओं पर बेहतर नियंत्रण और आत्म-जागरूकता का विकास। हालांकि, समाधि को विज्ञान मेडिटेशन की तरह अलग मानसिक अवस्था के रूप में माप या प्रमाणित नहीं कर सकता, क्योंकि यह मुख्य रूप से आध्यात्मिक और योग परंपराओं से जुड़ी अवधारणा है, न कि आधुनिक मनोविज्ञान का हिस्सा। इसके आगे वह कहती हैं कि इसे आसान भाषा में समझें तो मेडिटेशन एक प्रक्रिया है, जबकि समाधि उस लंबे आध्यात्मिक अभ्यास का एक संभावित परिणाम या अवस्था मानी जाती है।

उनका कहना है कि हर व्यक्ति जो मेडिटेशन करता है, उसका उद्देश्य समाधि प्राप्त करना नहीं होता और न ही हर किसी को इसका अनुभव होता है। मेडिटेशन अपने आप में कई मानसिक और शारीरिक लाभ देता है, चाहे व्यक्ति आध्यात्मिक लक्ष्य रखे या नहीं।

मेडिटेशन को नियमित जीवन का हिस्सा क्यों बनाना चाहिए

डॉ. रिम्पा सरकार के अनुसार, लोगों को किसी असाधारण आध्यात्मिक अनुभव की चाह में मेडिटेशन नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे नियमित जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। इससे भावनात्मक संतुलन, मानसिक मजबूती और आत्म-जागरूकता विकसित होती है। “अगर किसी की रुचि समाधि जैसी अवधारणाओं में है, तो उसे धैर्य रखना चाहिए और किसी अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में अभ्यास करना चाहिए। इसे जल्दी हासिल करने वाली उपलब्धि या आसान रिलैक्सेशन तकनीक नहीं समझना चाहिए। पारंपरिक योग शिक्षा भी यही बताती है कि समाधि लंबे समय तक निरंतर अभ्यास से विकसित होने वाली गहरी आध्यात्मिक अवस्था है।”

इसके साथ ही डॉ. सरकार इस बात पर भी जोर देती हैं कि आध्यात्मिक अनुभवों और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में अंतर समझना जरूरी है। उनके अनुसार, सही तरीके और संतुलित वातावरण में किया गया गहरा ध्यान या आध्यात्मिक अनुभव मानसिक बीमारी नहीं होता। हालांकि, यदि आध्यात्मिक अभ्यास के दौरान किसी व्यक्ति को भ्रम, अत्यधिक परेशानी या वास्तविकता से जुड़ाव कम होने जैसी समस्याएं महसूस हों, तो उसे तुरंत किसी अनुभवी आध्यात्मिक शिक्षक और योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, ताकि यदि कोई मानसिक समस्या हो तो उसका समय रहते उचित इलाज किया जा सके।

डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों द्वारा साझा की गई बातों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी प्रदान करना है।

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